राष्ट्रीय

बापू के सपनों को पूरा करने के लिये एकजुट हुआ भारत -नरेंद्र मोदी

बापू ने भविष्य का आकलन किया और स्थितियों को व्यापक संदर्भ में समझा

नई दिल्ली:

आज हम अपने प्यारे बापू की 150वीं जयंती के आयोजनों का शुभारंभ कर रहे हैं। बापू आज भी विश्व में उन लाखों-करोड़ों लोगों के लिये आशा की एक किरण हैं जो समानता, सम्मान, समावेश और सशक्तीकरण से भरपूर जीवन जीना चाहते हैं। विरले ही लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने मानव समाज पर उनके जैसा गहरा प्रभाव छोड़ा हो।

महात्मा गांधी ने भारत को सही अर्थों में सिद्धांत और व्‍यवहार से जोड़ा था। सरदार पटेल ने ठीक ही कहा था, “भारत विविधताओं से भरा देश है। इतनी विविधताओं वाला कोई अन्‍य देश धरती पर नहीं है। यदि कोई ऐसा व्‍यक्ति था,

जिसने उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के लिये सभी को एकजुट किया, जिसने लोगों को मतभेदों से ऊपर उठाया और विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया, तो वे केवल महात्मा गांधी ही थे। और, उन्होंने इसकी शुरुआत भारत से नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका से की थी। बापू ने भविष्य का आकलन किया और स्थितियों को व्यापक संदर्भ में समझा। वे अपने सिद्धान्तों के प्रति अपनी अंतिम सांस तक प्रतिबद्ध रहे।”

इक्कीसवीं सदी में भी महात्मा गांधी के विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे और वे ऐसी अनेक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, जिनका सामना आज विश्व कर रहा है। एक ऐसे विश्व में जहां आतंकवाद, कट्टरपंथ, उग्रवाद और विचारहीन नफरत देशों और समुदायों को विभाजित कर रही है, वहां शांति और अहिंसा के महात्मा गांधी के स्पष्‍ट आह्वान में मानवता को एकजुट करने की शक्ति है।

ऐसे युग में जहां असमानताएं होना स्‍वाभाविक है, बापू का समानता और समावेशी विकास का सिद्धांत विकास की आखिरी पायदान पर रह रहे लाखों लोगों के लिये समृद्धि के एक नये युग का सूत्रपात कर सकता है।

एक ऐसे समय में, जब जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण की रक्षा का विषय चर्चा के केन्‍द्र बिंदु में है, दुनिया को गांधी जी के विचारों से सहारा मिल सकता है। उन्होंने एक सदी से भी अधिक समय पहले, सन् 1909 में मनुष्‍य की आवश्यकता और उसके लालच के बीच अंतर स्पष्ट किया था।

उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय संयम और करुणा- दोनों के अनुपालन करने की सलाह दी, और स्वयं इनका पालन करके मिसाल कायम करते हुए नेतृत्व प्रदान किया। वे यह सुनिश्चित करते थे कि पानी कम से कम बर्बाद हो और अहमदाबाद में उन्‍होंने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि दूषित जल साबरमती के जल में ना मिले।

कुछ ही समय पहले महात्मा गांधी द्वारा लिखित एक सारगर्भित, समग्र और संक्षिप्त लेख ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। सन 1941 में बापू ने ‘रचनात्मक कार्यक्रम: उसका अर्थ और स्थान’ नाम से एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने 1945 में उस समय बदलाव भी किये थे जब स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर एक नया उत्साह था। महिलाओं का सशक्तीकरण और आर्थिक समानता सहित अनेक विषय शामिल थे।

मैं अपने प्रिय भारतवासियों से अनुरोध करूंगा कि वे गांधी जी के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ को पढ़ें (इसका मुद्रित संस्करण और इंटरनेट पर भी यह आसानी से उपलब्ध है) यह ऑन लाइन एवं ऑफ लाइन उपलब्ध है। हम कैसे गांधी जी के सपनों का भारत बना सकते हैं- इस कार्य के लिये इसे पथ प्रदर्शक बनायें।

गांधी जी के व्यक्तित्व के सबसे खूबसूरत आयामों में से एक बात यह थी कि उन्होंने प्रत्येक भारतीय को इस बात का अहसास दिलाया था कि वे भारत की स्वतंत्रता के लिये काम कर रहे हैं। उन्होंने एक अध्यापक, वकील, चिकित्सक, किसान, मजदूर, उद्यमी, सभी में आत्म-विश्वास की भावना भर दी थी कि जो कुछ भी वे कर रहे हैं उसी से वे भारत के स्वाधीनता संग्राम में योगदान दे रहे हैं।

उसी संदर्भ में, आइये आज हम उन कामों को अपनायें जिनके लिये हमें लगता है कि गांधी जी के सपनों को पूरा करने के लिये हम इन्हें कर सकते हैं। भोजन की बर्बादी को पूरी तरह बंद करने जैसी साधारण सी चीज से लेकर अहिंसा और अपनेपन की भावना को अपनाकर इसकी शुरुआत की जा सकती है।

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