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हम सभी को सिस्टर निवेदिता के जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए: पीएम मोदी

नई दिल्ली: पीएम नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 37वीं एपिसोड में देशवासियों को संबोधित करते हुए सिस्टर भगिनी निवेदिता के 150 वीं जयंती पर उनके कार्यों का जिक्र करते हुए उन्हें याद किया.

पीएम ने कहा कि 28 अक्टूबर को पूरे देश ने भगिनी निवेदिता का 150 वीं जयंती मनाई. सभी को भगिनी निवेदिता के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए, पूरा देश उनके कार्यों से अभिभूत हैं. सभी को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए.

पीएम मोदी ने कहा कि हमारी पुण्य भूमि में तमाम ऐसे लोग हुए है, जिनका जीवन मानवता में लगा रहा.निवेदिता ने अपना सारा जीवन गरीबों की सेवा में समर्पित कर दिया. उनके जीवन का एक ही लक्ष्य सेवा भाव रहा है.

पीएम ने कहा कि विवेकानंद ने उन्हें एक नया नाम निवेदिता दिया था. सुब्रह्मण्यम भारती की प्रेरणा सिस्टर निवेदिता ही थीं. हमें सिस्टर निवेदिता के जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए.

पीएम ने कहा कि निवेदिता का मतलब पूर्ण रुप से समर्पण. निवेदिता ने अपने नाम के भांति पूरे जीवन को समाज सेवा में लगा दिया.

स्वामी विवेकानन्द की शिष्या भगिनी निवेदिता का जन्म 28 अक्टूबर, 1867 को आयरलैंड में हुआ था. वे एक अंग्रेज-आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक एवं एक महान शिक्षिका थीं. उनका मूल नाम मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल था.

भारत के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम के चलते वे आज भी प्रत्येक भारतवासी के लिए देशभक्ति की महान प्रेरणा का स्रोत है. भगिनी निवेदिता का भारत से परिचय स्वामी विवेकानन्द के जरिए हुआ.

स्वामी विवेकानन्द के आकर्षक व्यक्तित्व, निरहंकारी स्वभाव और भाषण शैली से वह इतना प्रभावित हुईं कि उन्होंने न केवल रामकृष्ण परमहंस के इस महान शिष्य को अपना आध्यात्मिक गुरु बना लिया बल्कि भारत को अपनी कर्मभूमि भी बनाया.

भगिनी निवेदिता ने अपने जीवन में महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. 25 मार्च 1898 को निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद के सानिध्य में ब्रह्मचर्य अपना लिया.

जिसके बाद मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल से विवेकानंद ने उन्हें एक नया नाम निवेदिता दिया. इस प्रकार भगिनी निवेदिता किसी भी भारतीय पंथ को अपनाने वाली पहली पश्चिमी महिला बनीं.

भगिनी निवेदिता ने विवेकानंद के साथ अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए अपनी पुस्तक द मास्टर ऐज आई सॉ हिम में लिखा है कि वे अक्सर स्वामी विवेकानंद को राजा और अपने आप को उनकी आध्यात्मिक पुत्री का नाम देती थी.

भगिनी निवेदिता ने कलकत्ता में भीषण प्लेग के दौरान भारतीय बस्तियों में जाकर जिस तरह काम किया वह अत्यंत ही प्रशंसनीय था.

इस काम के बाद उनके कामों के सरहना पूरे देश में होने लगी. महिलाओं को पढ़ाने के लिए उन्होंने उत्तरी कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की.

जिससे जुड़कर तमाम महिलाओं ने अपने जीवन में एक अलग राह चुनी. भगिनी निवेदिता भारत की स्वतंत्रता की जोरदार समर्थक थीं और अरविंदो घोष जैसे राष्ट्रवादियों से उनका घनिष्ठ सम्पर्क था.

भगिनी निवेदिता की मृत्यु 13 अक्टूबर 1911 को दार्जीलिंग स्थित रॉय विला में हुई. उनका स्मारक रेलवे स्टेशन के नीचे विक्टोरिया फाल्स (दार्जीलिंग) के रास्ते में स्थित है.

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