कैदियों को गुलाम नहीं समझ सकते: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में खुली जेलों की संख्या बढ़ाने के साथ ही कैदियों के साथ अधिक मानवीय व्यवहार करने पर जोर दिया है।

कोर्ट का कहना है कि विशेष तौर पर ऐसे विचाराधीन कैदियों के साथ व्यवहार अच्छा होना चाहिए जो कानूनी मामले में देरी के कारण लंबे समय से जेल में बंद हैं।

इसके साथ ही कोर्ट ने जेल के अंदर कैदी की अप्राकृतिक मृत्यु होने पर उसके परिवार को मुआवजा देने का भी पक्ष लिया है।

कोर्ट ने हिरासत में होने वाली मृत्यु की संख्या में कमी न आने पर भी नाराजगी जताई। मुंबई विस्फोट मामले में हथियार रखने के दोषी साबित हुए बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त ने महाराष्ट्र की एक जेल में 5 वर्ष की सजा काटने के बाद हाल ही में कहा था कि जेल प्रशासन में सुधारों की जरूरत है।

दत्त ने भारतीय जेलों को कैदियों को सुधारने के लिए एक यूनिवर्सिटी के जैसा बताया था। इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट की ओर से ये निर्देश आए हैं।

जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से अपने संबंधित कोर्ट में खुद जनहित याचिका दायर कर जेलों में सुधार करने के लिए कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कैदियों के मूलभूत अधिकारों को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों से जेल के कैदियों के साथ जितना अधिक संभव हो, मानवीय व्यवहार करने के लिए कर्मचारियों को जागरूक करने के लिए कहा है।

कोर्ट का कहना था कि राज्य सरकारों को जमानत के प्रत्येक आवेदन का विरोध करने या जांच बाकी होने तक प्रत्येक संदिग्ध की रिमांड मांगने की जरूरत नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि अगर संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार वास्तविक अर्थ में दिया जाना है तो केंद्र और राज्य सरकारों को वास्तविकता स्वीकार करनी होगी और इस आधार पर नहीं चलना होगा कि कैदियों के साथ गुलाम जैसा व्यवहार किया जा सकता है।

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से जेलों के अंदर मानवीय व्यवहार और सम्मान, जेलों के अंदर अप्राकृतिक मृत्यु वाले कैदियों के परिवार को मुआवजा देने और अकेलेपन और कैद से निपटने के लिए काउंसलिंग पर भी विचार करने को कहा गया है।

कोर्ट ने परिवार से मुलाकात, फोन के जरिए संपर्क को भी बढ़ाने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही अकेलेपन को कम करने और मानसिक स्थिरता में सुधार के लिए समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के जरिए बाहरी दुनिया से जोड़ने की जरूरत भी बताई है।

कोर्ट ने कैदियों के साथ व्यवहार के न्यूनतम स्तर के बारे में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से अपनाए गए मैन डेला रूल्स का भी जिक्र किया।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि परिवार और मित्रों से कटे हुए कैदियों के जेल से बाहर रहने वाले लोगों की तुलना में आत्महत्या करने के 50 पर्सेंट अधिक अवसर होते हैं। देश में अभी केवल 54 खुली जेल हैं।

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