छत्तीसगढ़

कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय बनेगा देश का अग्रणी संस्थान 

कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय बनेगा देश का अग्रणी संस्थान 

पंचवार्षिक समीक्षा दल के सदस्यों ने विश्वविद्यालय द्वारा संचालित अनुसंधान कार्याें की सराहना करते हुए जतायी उम्मीद

रायपुर : इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत संचालित पोस्ट हार्वेस्ट इंजिनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी कार्यक्रम के मूल्यांकन हेतु आये पंचवार्षिक समीक्षा दल (क्यू.आर.टी.) ने विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे कृषि अनुसंधान कार्याें की सराहना करते हुए उम्मीद जतायी कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय जल्द ही कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में देश का सबसे अग्रणी संस्थान बनेगा।

उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय देश का एकमात्र अनुसंधान केन्द्र है जो लघु वनोपज तथा लघु धान्य  फसलों पर अनुसंधान कर रहा है। इन अनुसंधान कार्याें का लाभ छत्तीसगढ़ के साथ-साथ देश को भी मिलेगा। 

पंचवार्षिक समीक्षा दल के अध्यक्ष डॉ. नवाब अली, सदस्य पद्मश्री डॉ. ब्रम्हा सिंह और डॉ. पी.के. श्रीवास्तव ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा संचालित अनुसंधान एवं विकास कार्याें का अवलोकन करने के बाद कहा कि कुलपति डॉ. एस.के. पाटील के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय द्वारा पिछले पांच सालों में कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय कार्य किये गये हैं जिनमें संरक्षित खेती, वनौषधि फसलों का उत्पादन तथा फसलों का प्रसंस्करण एवं मूल्य संर्वधन प्रमुख हैं।

डॉ. नवाब अली ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय में अनुसंधान कार्य हेतु आवश्यक अधोसंरचनाओं का तेजी से विकास हुआ है। अनेक नयी फसल प्रजातियां विकसित की गयी है तथा फसलों की पोस्ट हार्वेस्ट टेक्नोलॉजी पर अच्छा काम हुआ है। उन्होंने कहा कि इन अनुसंधान कार्याें को भारत सरकार द्वारा संचालित योजनाओं से जोड़ने के प्रयास किये जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि पंचायत स्तर पर कृषि प्रसंस्करण केन्द्र खोले जाने चाहिए जिससे गांवों में अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न किया जा सके। 

पद्मश्री डॉ. ब्रम्हा सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं – धान, वनौषधि पौधे तथा आदिवासी समुदाय। छत्तीसगढ़ को अपनी इन तीनों विशेषताओं को संरक्षित करते हुए अनुसंधान एवं विकास कार्य किये जाने चाहिए और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय इस दिशा में काफी अच्छा कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा धान की परंपरागत किस्मों के संरक्षण के लिये सराहनीय प्रयास किये गये हैं।

इसी प्रकार वनौषधि पौधों पर अनुसंधान कर इनके गुणों को संरक्षित एवं संवर्धित किया जा रहा है। डॉ. सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ के जनजातीय समुदाय द्वारा की जाने वाली खेती वास्तव में जैविक खेती ही है जिसे संरक्षित करते हुए उसमें वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मूल्य संवर्धन किया जाना चाहिए।

डॉ. पी.के. श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ की परंपरागत विशिष्ट फसल प्रजातियांे के उत्पादन, प्रसंस्करण तथा मूल्य संवर्धन पर जोर दिया जिससे राज्य के किसानों को अधिक से अधिक फायदा हो सके।  

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