राष्ट्रीय

किसान आंदोलन के नेताओं से बातचीत, मोदी सरकार की रणनीति या आशंका

दिल्ली के बॉर्डर पर नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों के प्रदर्शन का आज छठा दिन है.

किसान संगठनों की माने तो भारत के अलग-अलग राज्यों से और किसान इस आंदोलन से जुड़ने वाले हैं. यानी आंदोलन धीरे-धीरे और बढ़ेगा.

इन छह दिनों में केंद्र सरकार की तरफ़ से बड़े मंत्रियों ने तीन बार बातचीत की पेशकश भी की.

पहले नरेंद्र सिंह तोमर फिर गृह मंत्री अमित शाह और बीती रात केंद्रीय गृह सचिव ने किसान संगठनों को बातचीत के लिए निमंत्रण भेजा.

किसान संगठन मंगलवार को केंद्र सरकार से बातचीत के लिए तैयार भी हैं.

इतनी ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ‘मन की बात’ में और फिर सोमवार को वाराणसी से किसानों को संबोधित किया.
सरकार की छवि

नतीजा ये कि 3 दिसंबर की बातचीत समय से दो दिन पहले 1 दिसंबर को ही बिना किसी शर्त बातचीत के लिए निमंत्रण गया.

हालांकि सरकार की तरफ़ से कहा जा रहा है कि ‘कोरोना और ठंड’ की वजह से सरकार ने बातचीत की तारीख़ आगे बढ़ाई है.

लेकिन ये दोनों वजहें पिछले साल दिंसबर में भी थी, जब भारत की राजधानी दिल्ली में सीएए के ख़िलाफ़ धरना प्रदर्शन चल रहा था.

केंद्र सरकार की तरफ़ से ऐसी पेशकश उस वक़्त देखने को नहीं मिली थी. वो वक़्त दिल्ली में विधानसभा चुनाव का भी था.

इसलिए सवाल उठने लगे हैं कि सरकार इस बार किसानों आंदोलन में क्या लाचार और बेबस है?

क्या इस आंदोलन से सरकार की छवि को नुक़सान पहुँचने का उन्हें डर सता रहा है? या फिर ये क़दम उनकी रणनीति का हिस्सा भर है?

सरकार को डर है पार्टी की किसान विरोधी छवि ना बन जाए?

संजय कुमार सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) में प्रोफ़ेसर हैं.

आँकड़ो के आधार पर विश्लेषण करते हुए वो कहते हैं, “किसान आंदोलन जो पिछले कुछ समय से चल रहा है, उसको लेकर सरकार में ‘किसान विरोधी छवि’ बनने का डर सता रहा था. किसानों की माँग को माना जाए या नहीं, वो अलग बात है और बातचीत के लिए बैठने को तैयार होना अलग बात है.”

उनका मानना है कि 2019 लोकसभा चुनाव तक एनडीए की छवि किसानों के बीच अच्छी थी. इस वजह से किसानों ने उन्हें लोकसभा चुनाव में अच्छा समर्थन भी दिया है.

अपने बयान के साथ वो आँकड़े भी गिनाते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में किसानों का वोट एनडीए को बाक़ी दूसरे व्यवसाय करने वालों के मुक़ाबले ज़्यादा मिला था.

2019 में एनडीए का कुल वोट 44 फीसद था, जिसमें से किसानों का 47 फीसद वोट मिला था और दूसरे व्यवसाय वाले 44 फीसद लोगों ने एनडीए के लिए वोट किया था.

यानी किसानों का झुकाव एनडीए के लिए 2-3 फीसद ज़्यादा रहा है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य

राज्यों की बात करें तो पंजाब में एनडीए गठबंधन को किसानों ने दूसरे व्यवसाय वालों की तुलना में 4 फीसद भले ही कम वोट दिए लेकिन हरियाणा में किसान और दूसरे व्यवसाय वालों ने लगभग एक जैसा वोट एनडीए के लिए किया. वहीं उत्तर प्रदेश में किसानों ने एनडीए को ज़्यादा वोट दिया.

संजय कुमार आगे कहते हैं, “हाल ही में प्रधानमंत्री तीन राज्यों में कोरोना वैक्सीन बनने का जायज़ा लेने गए, वाराणसी गए और गृह मंत्री अमित शाह हैदराबाद में चुनावी रैली को संबोधित करने गए. इससे आम जनता और किसानों के बीच केंद्र सरकार की एक छवि बनने लगी कि केंद्र सरकार किसानों को लेकर लापरवाह है. भले ही प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का ये दौरे पहले से ही तय रहा हो, लेकिन परसेप्शन में वो किसान विरोधी दिख रहे थे.”

इसलिए सरकार समय से पहले बातचीत के लिए राजी हो गई. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह को नहीं लगता की बीजेपी के अंदर इस तरह का कोई डर है.

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