विचारसंपादकीय

ईरानः भारत पहल क्यों न करे ?

- डॉ. वेद प्रताप वैदिक

फ्रांस के राष्ट्रपति इम्नेयुअल मेकरों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते पर पानी फेरने की घोषणा कर दी है। 2015 में हुए इस समझौते के कारण ईरान ने अपने परमाणु बम बनाने के कार्यक्रम को स्थगित कर दिया था। इस समझौते पर अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रुस, चीन और यूरोपीय संघ ने दस्तखत किए थे।

इस समझौते को अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति की असाधारण विजय माना जा रहा था। इसके कारण ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी उठा लिये गए थे। ईरान की डांवाडोल अर्थव्यवस्था में भी काफी सुधार हो गया था लेकिन अब मेकरों ने वाशिंगटन जाकर ट्रंप के राग में अपना राग मिलाया और इस परमाणु समझौते में 4 सुधार करने की घोषणा कर दी।

एक तो जेसीपोआ नामक इस समझौते को कायम रखा जाएगा। दूसरा, ईरान के परमाणु बम बनाने पर 2025 के बाद भी प्रतिबंध रखा जाएगा। तीसरा, ईरान के युद्धक प्रक्षेपास्त्रों पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। चौथा, यमन, सीरिया, इराक, लेबनान आदि राष्ट्रों में ईरान की दखलंदाजी बंद की जाएगी। मेकरों की इस घोषणा को ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी ने कूड़े की टोकरी में फेंक दिया है। उन्होंने कहा है कि ट्रंप को विदेश नीति और परमाणु मामलों की कोई समझ नहीं है। वे व्यापारी हैं, दुकानदार हैं, उन्हें इन गहरे मसलों का क्या पता ? यदि कोई समझौता ईरान मानेगा तो वही मानेगा, जो 2015 में हुआ है।

रुहानी की इस घोषणा के पीछे रुस और चीन का समर्थन है जबकि ट्रंप को उकसाने में इजराइल और सऊदी अरब के अलावा उनके नए विदेश मंत्री और सुरक्षा सलाहकार हैं। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन तो अमेरिका के दबाव में आकर ईरान पर फिर से प्रतिबंध थोप सकते हैं लेकिन हताश ईरान ने यदि अपना परमाणु बम बनाना शुरु कर दिया तो सभी देशों के लिए काफी बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है। मैं सोचता हूं कि ईरान के मामले में ट्रंप को वही करना चाहिए, जो उन्होंने उत्तर कोरिया के मामले में किया है। बातचीत के जरिए मध्य मार्ग निकाल लेना चाहिए। भारत का नेतृत्व बहुत बौना है। अगर उसमें जरा भी समझ हो तो इस मामले में उसे पहल करनी चाहिए। इस मामले से भारत के राष्ट्रहित गहरे जुड़े हुए हैं।

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