मोदी के ख़िलाफ़ क्या विपक्ष की ‘एकजुटता’ केवल फोटो-ऑप है?

कभी ट्रैक्टर, कभी साइकिल, कभी नाश्ता, तो कभी चाय पर चर्चा. इन दिनों कांग्रेस नेता राहुल गांधी राजनीति में पहले से ज़्यादा सक्रिय नज़र आ रहे हैं.

मंगलवार को उन्होंने विपक्षी दलों के सांसदों के साथ नाश्ते पर राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की.

बढ़ती महँगाई पर हल्ला बोल के लिए विपक्षी सांसदों के साथ साइकिल से संसद भवन तक भी गए.

कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से जब विपक्ष के साथ नाश्ता करने की तस्वीर पोस्ट की गई तो कैप्शन दिया गया, “हमारा देश, हमारी जनता, हमारी प्राथमिकता. कांग्रेस पार्टी और विपक्ष, भारत को आगे रखने के लिए एकजुट हैं.”

राहुल गांधी ने जब ट्विटर पर महँगाई के ख़िलाफ़ साइकिल यात्रा की तस्वीर पोस्ट की तो साथ में लिखा, ” ना हमारे चेहरे ज़रूरी हैं, ना हमारे नाम . बस ये ज़रूरी है कि हम जन प्रतिनिधि हैं- हर एक चेहरे में देश की जनता के करोड़ों चेहरे हैं जो महंगाई से परेशान हैं. यही हैं अच्छे दिन?”

दोनों ट्वीट में सत्ता पक्ष और जनता के लिए दो संदेश साफ़ हैं – एक तो विपक्ष एकजुट है और दूसरा चेहरा ज़रूरी नहीं है ना ही नाम ज़रूरी है.

राजनीतिक गलियारों में इस पर खूब चर्चा चल रही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष तैयारी में तीन साल पहले ही जुट गया है.

लेकिन क्या सभी विपक्षी पार्टियों को चाय- नाश्ते पर एक साथ बुला लेना, फोटो खिंचवाना, साइकिल से संसद जाना – इन सबसे विपक्ष एकजुट हो जाएगा?

क्या ये इतना आसान है? और अगर मुश्किल है तो रास्ते की अड़चनें क्या हैं?
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नेतृत्व किसका?

नीरज चौधरी पिछले चार दशक से पत्रकारिता में है. उन्होंने कई सरकारों को अपने सामने बनते और गिरते देखा है.

उनका कहना है, “साथ नाश्ता करना, साइकिल चलाना, नए आइडिया हैं. लेकिन विपक्ष को ‘एकजुट’ होने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है. सबसे अहम सवाल नेतृत्व (लीडरशिप) का होने वाला है. आख़िर वो किसके नेतृत्व में एकजुट होंगे. वो चेहरा कौन होगा? क्या राहुल वो चेहरा होंगे? और क्या राहुल का नेतृत्व क्षेत्रीय पार्टियों को स्वीकार होगा?”

यहाँ कुछ तथ्य और भी हैं जिन पर ग़ौर करने की ज़रूरत है.

ममता बनर्जी भी हाल में दिल्ली दौरे पर थी. उन्होंने भी राहुल और सोनिया से मुलाक़ात की है. विपक्ष का नेतृत्व वो करेंगी या नहीं, इस पर उनसे स्पष्ट सवाल किया गया, लेकिन उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया.

विपक्षी दलों को साथ लाने की एक कोशिश शरद पवार भी करते दिख रहे हैं. उनके घर पर भी एक बैठक हो चुकी है, जिसमें बहुत ज़्यादा नेता नहीं पहुँचे थे.

ओम प्रकाश चौटाला ने भी तीसरे मोर्चे का राग छेड़ा है. हाल ही में उनकी नीतीश कुमार से लंच पर मुलाक़ात हुई जिसने खूब सुर्खियां बटोरी है.

राहुल गांधी ने भी नाश्ते का निमंत्रण 16 विपक्षी दलों को भेजा था, लेकिन बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी उसमें शामिल नहीं हुए.

ममता बनर्जी, शरद पवार की पार्टियों के साथ शिवसेना, डीएमके, सीपीआई-एम, सीपीआई, आरजेडी, समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, आईयूएमएल, आरएसपी जैसे 14 दलों ने उनका न्योता स्वीकार किया.

नीरजा कहती हैं, “पूरा विपक्ष एक साथ हो जाए 2024 के चुनाव के पहले ये थोड़ा मुश्किल लगता है. कुछ पार्टियाँ ख़ुद को न्यूट्रल कहलाना पसंद करती हैं. जो मुद्दों पर आधारित समर्थन बीजेपी को देती है, लेकिन पूरी तरह से किसी के साथ नहीं है. जैसे नवीन पटनायक, जगन रेड्डी, केसीआर.”

यही वजहें हैं कि विपक्ष की एकजुटता में नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. बीजेपी भी इसी सवाल पर विपक्ष पर वार कर रही है.

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