छत्तीसगढ़

लॉकडाउन क्या अघोषित आपातकाल जैसा नहीं है…!

अब नहीं बढ़ेगा छत्तीसगढ़ में लॉकडाऊन!

हिमालय मुखर्जी ब्यूरो चीफ रायगढ़

कोरोना के नाम से सजाया गया भय का बाजार बीते 5 महीने से पूरा देश कोरोना का दंश झेल रहा है। कोरोना महामारी के समय पूरे देश में एक तरीके से अघोषित आपातकाल लगा है। लोग डरे हुए हैं, सहमे हैं, कई जगह भूखो मरने की स्थिति है। लोगों की नौकरी लगातार छीनी जा रही है लेकिन अघोषित आपातकाल के चादर के नीचे के सभी मुद्दे दफन होते जा रहे हैं।

इस महामारी से लड़ने का सिर्फ एक ही साधन सरकार जुटा पाई है लॉकडाउन। इस लॉकडाउन ने आमजन का जीना दुश्वार किया है। भेड़-बकरियों की तरह लोगों को बताया जा रहा है कि कब निकलना है, कब नहीं। क्या लेना है, क्या नहीं। कहीं किसी काम से निकले तो चालान कटेगा, जेल होगी इत्यादि। आम नागरिक के सारे मौलिक अधिकार लगभग समाप्त हो गए हैं। कुल जमा एक भय का माहौल बना हुआ है और भय के इस माहौल में आम जन शासन-प्रशासन के नितनए बदलते निर्देशों को लेकर हालाकान हैं। कोरोना से मुक्ति कब मिलेगी इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। कोरोना से मुक्ति जब मिलेगी तब मिलेगी लेकिन इस बीच पूरा जनजीवन तरह-तरह की त्रासदियों को झेल रहा है।

संवेदना शून्य प्रशासनिक अमला

ताजा मिसाल रायगढ़ शहरी क्षेत्र में लगाया गया एक हफ्ते का लॉकडाउन है, इस लॉकडाउन के लिए प्रशासन की ओर से जो दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं उससे लोगों का भय बढ़ सा गया है। जबकि प्रशासन की सख्ती और अधिक बढ़ गई है। लॉकडाउन की इसी अवधि में जिले का प्रशासनिक अमला मानवीय संवदेना के लिहाज से संवेदन शून्य दिखलाई पड़ रहा है और करोना के प्रसार को बढ़ने से रोकने के लिए निर्मम तरीके अख्तियार किये जा रहे हैं। वहीं जिले अन्य प्रशासनिक अमले में सामान्य दिनों की तरह ही भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के खेल चल रहे हैं जिसकी पूरी अनदेखी की जा रही है।

एक हफ्ते का लॉकडाउन लगाने से पहले यह भी नहीं सोचा गया कि इस एक हफ्ते की अवधि के दौरान रोज कमाकर रोज खाने वाले मजदूर परिवारों पर क्या बीतेगी? जबकि ऐसे मजदूरों की संख्या रायगढ़ शहर में 50 हजार के आसपास होगी। टोटल लॉकडाउन की अवधि में अगर दिहाड़ी मजदूर परिवारों के सामने भूखो मरने की नौबत आ गई होगी तो अचरज जैसी बात नहीं होगी।

वस्तुत: कोरोना महामारी के नाम पर निर्मित किए गए भय के माहौल का मकसद ही यही है कि प्रशासन के कार्यों और गतिविधियों को लेकर कहीं से भी कोई सवाल नहीं उठे। यहां तक कि मीडिया पर भी अघोषित सेंशरशिप थोप दी गई है। नतीजे में कोरोना को लेकर मीडिया भी प्रशासनिक मेडिकल बुलेटिन का हिस्सा बन गया है। ज्यादतियों और बदइंतजामी को लेकर सवाल उठाने का मतलब आपदा अधिनियम के तहत कार्यवाही होगी।

अब नहीं बढ़ेगा छत्तीसगढ़ में लॉकडाऊन

मुनाफे लिए सजा डर का बाजार

बहरहाल नए रिपोर्ट से पता चला है कि कोरोना वायरस अब ज्यादा प्राणघातक नहीं रहा। शरीर दर शरीर वायरस के फैलने से अब उसकी क्षमता कम होती जा रही है। वायरस पहले जैसा शक्तिशाली नहीं रहा। लेकिन उसका डर लोगों में ऐसा बैठा है जैसे दुनिया खत्म होने वाली है। दरअसल लोगों के दिलो-दिमाग में बैठाए गए इस डर के पीछे एक बड़ी साजिश की बात की जा रही है जिसमें बताया जा रहा है कि इस साजिश के तार विश्व स्वास्थ्य संगठन और बिल गेट्स फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं। फिलवक्त बिल गेट्स का फाउंडेश डब्ल्यूएचओ का सबसे बड़ा डोनर है और डब्ल्यूएचओ का इस्तेमल कठपुतली की तरह कर रहा है। पूरी दुनिया में बिल गेट्स की फंडिग से चलने वाले मेडिकल इंडस्ट्रीज, सत्ता प्रष्ठान और मीडिया संस्थानों की संख्या हजारों में है जिनके मुनाफे के लिए पूरी दुनिया में भय का बाजार सजाया गया है।

मिसाल के तौर पर मास्क को ही लिया जा सकता है पिछले 6 महीनों में खरबों रुपये के मास्क की खपत हो चुकी है। और तो और हमारे अपने शहर रायगढ़ में ही पुलिस प्रशासन के आह्वान पर अगर एक दिन में 14 लाख मास्क बांटे जा सकते हैं तो मास्क के कारोबार में लगे कारोबारियों ने सिर्फ मास्क के धंधे में ही कितना मुनाफा पीटा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

जाहिर सी बात है भय के इस माहौल का सच मीडिया ही उजागर कर सकता है लेकिन बिल गेट्स के फंडिग से चलने वाले मीडिया संस्थानों से क्या ऐसी अपेक्षा की जा सकती है।

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