जया एकादशी व्रत कथा: इन्द्र ने दिया था श्राप, व्रत के प्रभाव ने दिलाई मुक्ति

हिंदू पंचांग के अनुसार कुछ स्थानों पर इस बार जया एकादशी का व्रत 15 फरवरी और अन्य गणनाओं के मुताबिक किसी-किसी स्थान पर इसे 16 फरवरी को मनाया जाएगा

हिंदू पंचांग के अनुसार पूरे साल में कुल 24 एकादशियां आती है लेकिन मलमास या अधिक मास आने की वजह से इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। व्यक्ति को हर महीने में आने वाली एकादशी यानि कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी दोनों का पालन करना चाहिए।

तो चलिए आज हम बात करेंगे जया एकादशी के बारे में। हिंदू पंचांग के अनुसार कुछ स्थानों पर इस बार जया एकादशी का व्रत 15 फरवरी और अन्य गणनाओं के मुताबिक किसी-किसी स्थान पर इसे 16 फरवरी को मनाया जाएगा।

शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति इस व्रत का पालन सच्चे मन से करता है वे व्यक्ति नीच योनि जैसे कि भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है। आज हम आपको शास्त्रों में वर्णित इस व्रत की कथा के बारे में बताएंगे।

श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को जया एकादशी के बारे में एक कथा भी सुनाई, जिसमें उन्होंने कहा कि एक बार नंदन वन में उत्सव चल रहा था। इस उत्सव में सभी देवता, सिद्ध संत और दिव्य पुरूष आए थे।

इसी दौरान एक कार्यक्रम में गंधर्व गायन कर रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थी। इसी सभा में गायन कर रहे माल्यवान नाम के गंधर्व पर नृत्यांगना पुष्पवती मोहित हो गई।

सुध बुध खोना माल्यवान को पड़ा था भारी

अपने प्रबल आर्कषण के चलते वो सभा की मर्यादा को भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी कि माल्यवान उसकी ओर आकर्षित हो जाए और ऐसा ही हुआ कुछ समय बाद माल्यवान अपनी सुध बुध खो बैठा और गायन की मर्यादा से भटक कर सुर ताल भूल गया।

इन दोनों की भूल पर इन्द्र क्रोधित हो गए और दोनों को श्राप दे दिया कि वे स्वर्ग से वंचित हो जाएं और पृथ्वी पर अति नीच पिशाच योनि को प्राप्त हो। श्राप के प्रभाव से दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर अत्यंत कष्ट भोगते हुए रहने लगे।

पिशाच योनि से मिली थी दोनों को मुक्ति

एक बार माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दु:खी थे जिसके चलते उन्होंने सिर्फ फलाहार किया और उसी रात्रि ठंड के कारण उन दोनों की मृत्यु हो गई। इस तरह अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो जाने के कारण दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई।

व्रत के प्रभाव से वे पहले से भी सुन्दर हो गए और पुन: स्वर्ग लोक में स्थान भी मिल गया। जब देवराज इंद्र ने दोनों को वहां देखा तो चकित होकर उन्हें मुक्ति कैसे मिली इस बारे में पूछा। तब उन्होंने बताया कि ये जया एकादशी के प्रभाव की वजह से हुआ है।

इन्द्र इससे प्रसन्न हुए और कहा कि वे जगदीश्वर के भक्त हैं इसलिए अब से उनके लिए आदरणीय हैं अत: स्वर्ग में आनन्द पूर्वक विहार करें। इस व्रत को करने से व्यक्ति नीच योनि जैसे कि भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है।

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