नहीं रहे झारखंड के गांधी बागुन सुंबरुई

जमशेदपुर.

पांच बार सांसद, चार बार विधायक, पांच बार मुखिया रहने वाले पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बागुन सुंबरुई का निधन हो गया है। वो 94 साल के थे। जमशेदपुर के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में शुक्रवार शाम उन्होंने आखिरी सांस ली। उन्हें ब्रेन स्ट्रोक और पैरालिलिस अटैक के बाद उन्हें 2 मई को भर्ती कराया गया था। बागुन सुंबरुई झारखंड के गांधी कहलाते थे।

उन्होंने पूरी जिंदगी आधे शरीर पर कपड़ा पहना और आधे पर नहीं। वो एक धोती से ही काम चला लेते थे। सादा जीवन उच्च विचार को ही जीवन दर्शन बनाकर जीने वाले सुंबरुई का जन्म 24 फरवरी 1924 को चाईबासा के एक आदिवासी परिवार में हुआ था। उन्होंने झारखंड राज्य के निर्माण के लिए बड़ा आंदोलन छेड़ा था। वैसे उनका राजनीतिक सफर झारखंड पार्टी से 1967 से शुरू होता है लेकिन उससे पहले ही उन्होंने डायन प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ कई सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत की थी।

तत्कालीन बिहार में दारोगा प्रसाद राय की सरकार थी जो झारखंड पार्टी के 11 विधायकों की बैसाखी पर चल रही थी। दारोगा राय 16 फरवरी 1970 को सीएम बने थे।

सरकार अच्छे से चल रही थी लेकिन बिहार राज्य पथ परिवहन में काम करनेवाले एक आदिवासी कर्मचारी को निलंबित कर दिया गया था। जब सुंबरुई को इसकी जानकारी मिली तो वो सीधे मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय से इसकी पैरवी करने पहुंच गए। दो बार सीएम से अनुरोध करने पर भी जब उन्होंने अनसुना कर दिया तब बागुन सुंबरुई ने दारोगा प्रसाद राय की सरकार से अपना समर्थन वापस खींच लिया था।

इसके बाद 22 दिसंबर 1970 को कर्पूरी ठाकुर की सरकार बनी थी। कर्पूरी सरकार में सुंबरुई को परिवहन के साथ-साथ वन कल्याण मंत्री बनाया गया था। मंत्री बनते ही बागुन ने कंडक्टर का निलंबन वापस ले लिया था।

बागुन सुंबरुई सातवीं तक ही पढ़े-लिखे थे लेकिन कई भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी। संथाली, बांग्ला, ओड़िया, हिन्दी और अंग्रेजी के वो अच्छे जानकार थे। हालांकि, उनके बारे में कहा जाता रहा है कि उन्होंने 58 शादियां की थीं। वो जब भी चुनाव जीतते एक शादी कर लेते। उनकी पांच संतानें हैं। इनमें से सबसे बड़े बेटे मस्तान की मौत हो चुकी है। दूसरे बेटे का नाम इन्होंने हिटलर रखा था। कहा जाता है कि सुंबरुई चश्मे के डिब्बे में पैसा रखा करते थे। कांग्रेस में उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी।

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