छत्तीसगढ़

जुगाड़ या जिम्मेदारी : 5 औषधालयों के प्रभार वाले डॉ.संतोष गुप्ता हफ्ते के पूरे 7 दिन करते है ड्यूटी

हिमालय मुखर्जी ब्यूरो चीफ रायगढ़

रायगढ़: छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं या तो पूरी तरह चौपट हैं या बुरी तरह चरमरा गई हैं। सरकारी स्वास्थ्य सुविधा के तहत ग्रामीण अंचल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं उप स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के दावे तो किये जाते हैं लेकिन हकीकत में ऐसे कथित सुविधाओं का कोई लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पाता। स्थिति यह है कि जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं वहां उन केंद्रों में डॉक्टर नहीं होते डॉक्टर और दूसरे स्टाफ होते भी हैं तो जरूरी दवाएं नहीं होती। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के अपने भवन तक नहीं है, यह सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं की बात है। इसी के समानांतर आयुर्वेदिक चिकित्सालय भी ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए गए हैं। कई गांवों को आयुष गाँव घोषित किया गया है। गाहे-बगाहे 4-5 गांव के लोगों के लिए आयुष मेला का भी आयोजन किया जाता है जिसमें ग्रामिणों की चिकित्सा की जाती है तथा परामर्श दिया जाता है। लेकिन सरकारी आयुर्वेदिक चिकित्सा सेवा का भी वही हाल है। चूंकि ज्यादातर आयुर्वेद चिकित्सालय ग्रामीण क्षेत्रों में हैं इसलिए वहां कोई चिकित्सक जाना नहीं चाहता, जाता भी है तो हाजिऱी की खानापूरी करके वापस शहर लौट आता है। मिसाल के तौर पर रायगढ़ ग्रामीण आयुर्वेदिक चिकित्सालयों को लिया जा सकता है। जिले के ज्यादातर आयुर्वेदिक चिकित्सालयों में पदस्थ आयुर्वेदिक चिकित्सक अपने पदस्थापना की जगह महज रस्मअदायगी के तौर पर रहते हैं और विभागीय उच्च अधिकारियों से सांठ-गांठ कर अलग-अलग क्षेत्रों में खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में खुद को अटैच करा लेते हैं ऐसे अटैचमेंट अतिरिक्त प्रभार के रूप के किये जाते हैं।

रायगढ़ के आयुर्वेदिक डॉक्टर डॉ संतोष गुप्ता जिन की मूल पदस्थापना रेंगालपाली आयुर्वेदिक चिकित्सालय में है। रेंगालपाली ओडिशा से सटा गांव है। इस आयुर्वेदिक चिकित्सालय से लगभग एक दर्जन गांव चिकित्सा के लिए निर्भर हैं। लेकिन यहां पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सक संतोष गुप्ता के अक्सर अनुपस्थित रहने के कारण उन्हें इस चिकित्सालय का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। नतीज़े में गांववालों को आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिए या तो पुसौर जाना पड़ता है या जिला मुख्यालय रायगढ़ आना पड़ता है। अभी वर्तमान में चल रहे कोरोना महामारी के इस दौर में गांव से बहुत दूर जाना भी संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में आयुर्वेद चिकित्सा पर आस्था रखने वाले गांव के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। गांव के लोग रेंगालपाली आयुर्वेदिक चिकित्सालय में डॉक्टर व अन्य स्टाफ के नहीं रहने के कारण नीम-हकिमों और झोलाछाप डॉक्टरों के शरण में जाने को बाध्य हो जाते हैं।

गांव के बैगा गुनिया भी इस स्थिति का लाभ उठाने से नही चूकते। मिली जानकारी के अनुसार डॉक्टर संतोष गुप्ता पांच जगहों पर अपनी सेवाएं देते हैं। रेंगालपाली मूल पदस्थापना के साथ छपोरा, जिला जेल, मेकाहारा के आयुष केंद्र और जिला आयुर्वेदिक अस्पताल में उनकी ड्यूटी है। लेकिन विभाग के लोग ही बताते हैं कि डॉक्टर साहब ज्यादातर जिला आयुर्वेदिक अस्पताल में ही रहते हैं। ऑफिस स्टॉफ होने के बाद भी उन्हें यहां जानकर रखा गया ताकि वो खरीद-बिक्री में अपनी भूमिका निभा सकें।

आयुर्वेद अस्पताल में चल रहा एलपी का खेल

मेडिकल में एक शब्द खूब प्रचलित है एलपी यानी लोकल परचेस। जिसमें स्थानीय स्तर पर दवाई दुकान से दवाई खरीदी का अधिकार स्थानीय अधिकारियों को होता है। कायदे से स्थानीय खरीदी रेडक्रॉस मेडिकल स्टोर से ही होनी चाहिए या फिर टेंडर कोटेशन के आधार खरीदी की जानी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है। स्थानीय चिकित्सा अधिकारी स्थानीय खरीदी उन्हें मिलने वाले कमीशन पर करते हैं जो दवा विक्रेता जितना ज्यादा कमीशन देता है उस से ही खरीदी की जाती है। जबकि बाज़ार में वही दवाएं काफी कम मूल्य में उपलब्ध रहती हैं। आयुर्वेदिक अस्पताल के सूत्र बताते हैं कि एलपी का खेल यहां भी बदस्तूर जारी है जिसमें डॉ संतोष गुप्ता की बड़ी भूमिका की बात कही जाती है।

गांव में विफल आयुर्वेदिक चिकित्सा

ग्रामीण क्षेत्र में आयुर्वेद चिकित्सा के प्रति अधिक आस्था को देखते हुए सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में आयुर्वेदिक चिकित्सालयों की स्थापना की गई है। उन चिकित्सालयों में जरूरी अधोसंरचना के साथ डॉक्टरों एवं अन्य स्टाफ के पद भी स्वीकृत हैं। बावजूद इसके ग्रामीण आयुर्वेदिक चिकित्सालयों में ज्यादातर पद रिक्त हैं। जहां डॉक्टर पदस्थ भी हैं तो वे अपनी पदस्थापना की जगह में न रहते हुए शहरी क्षेत्रों में रहना ज्यादा बेहतर समझते हैं और जोड़-तोड़ के जरिये शहरों में रहने का रास्ता निकाल लेते है। रेंगालपाली में पदस्थ डॉक्टर संतोष गुप्ता जिनके पास शहरी क्षेत्र के तीन-तीन अस्पताल का प्रभार है। ये ऐसे अकेले डॉक्टर नहीं है जिले में ऐसे डॉक्टरों की संख्या काफी बड़ी है जो अपने मूल पदस्थापना वाले जगह में रहने के बजाए शहरी क्षेत्र में सरकारी ड्यूटी और निजी प्रैक्टिस दोनों कर रहे हैं। सरकार ने आयुर्वेदिक चिकित्सालयों की स्थापना तो की लेकिन उन चिकित्सालयों में डॉक्टरों की नियुक्ति को लेकर उदासीन है। नतीज़े में अधिकांश ग्रामीण आयुर्वेदिक चिकित्सालय ग्रामीणों को उनकी हारी-बीमारी में चिकित्सा उपलब्ध कराने में विफल रहे हैं। गांव के लोगों को आयुर्वेद चिकित्सकों का लाभ मिल सके इसके लिए सरकार को आयुर्वेद चिकित्सालयों में डॉक्टरों-स्टाफ की नियुक्ति और दवाओं की आपूर्ति के लिए पहल करनी होगी अन्यथा गाँव में आयुर्वेदिक चिकित्सालयों के होने और न होने में कोई फर्क नहीं है।

ज्यादातर व्यवस्था मेरे पहले से है – जिला आयुर्वेद अधिकारी

जि़ला आयुर्वेद अधिकारी डॉ गौरीशंकर पटेल कहते हैं कि डॉ संतोष गुप्ता की पदस्थापना रेंगालपाली में है जहां सप्ताह में तीन दिन उन्हें सेवाएं देना है एक दिन छपोरा में और दो दिन जिला जेल में सुबह 9 से 11, जिस दिन उन्हें जेल की ड्यूटी करनी होती है उस दिन उन्हें हम जिला आयुर्वेद कार्यालय बुला लेते हैं यहां स्टाफ की कमी है। सप्ताह में एक दिन वो मेकाहारा के आयुष विभाग में भी बैठते हैं। इनमें से ज्यादातर मेरे से पहले की व्यवस्था है।

जैसा आदेश वैसा काम – डॉ संतोष गुप्ता

डॉ संतोष गुप्ता कहते हैं कि जैसा आदेश है वैसा वो काम करते हैं। उनके अधिकारी जब उन्हें बुलाते हैं वो जाते है। उन्हें विभाग ने कोरोना का नोडल भी बनाया है। रहने की बात पर डॉ गुप्ता कहते हैं कि वो रेंगालपाली में भी रहते हैं और रायगढ़ में भी। जिला जेल में कलेक्टर साहब की अनुशंसा पर वो अपनी सेवाएं दे रहे हैं। रेंगालपाली में नहीं होने पर वो कहते हैं कि बीच-बीच में जाते हैं। सरपंच से उनकी बात होती रहती है।

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