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कालसर्प दोष कारण और निवारण

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715

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योग प्रोक्ता सर्पश्च तस्मिन जीतो जीतः व्यर्थ पुत्रर्ति पीयात्।।

अर्थात – यदि राहुदेव आगे हों तथा केतुदेव पीछे हों अथवा केतुदेव आहो राहुदेव पीछे हों और सूर्यादि सभी सप्तग्रह देवता राहु केतु देव के मध्य या केतुदेव से राहुदेव के मध्य सभी ग्रहों की उपस्थिति से कालसर्प नामक योग की संरचना होती है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक धन पुत्र सुख आदि से वंचित होता है।

कालसर्प दोष है क्या ?

कालसर्प दो शब्दों से मिलकर बना है-काल और सर्प। जब सूर्यादि सातों ग्रह राहु (सर्प मुख) और केतु (सर्प की पूंछ) के मध्य आ जाते हैं तो कालसर्प योग बन जाता है। जिसकी कुण्डली में यह योग होता है उसके जीवन में काफी उतार-चढ़ाव और संघर्ष आता है।

इस योग को अशुभ माना गया है। पौराणिक कथा के अनुसार सागर मंथन के समय देवताओं और दानवों में एक समझौता हुआ जिसके तहत दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया। इस मंथन के दौरान सबसे अंत में भगवान धनवन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।

अमृत पाने के लिए देवताओं और दानवों में संघर्ष की स्थिति पैदा होने लगी। भगवान विष्णु तब मोहिनी रूप धारण करके उनके बीच प्रकट हुए और देवताओं व दानवों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाकर अमृत बांटने लगे।

अपनी चतुराई से मोहिनी रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु केवल देवताओं को अमृत पिला रहे थे जिसे दानव समझ नहीं पा रहे थे परंतु स्वरभानु मोहिनी की चतुराई का समझकर देवताओं की टोली में जा बैठा।

मोहिनी ने स्वरभानु को देवता समझकर उसे भी अमृत पान करा दिया परंतु सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। चूंकि अमृत स्वरभानु के जीभ और गर्दन को छू गया था अत: वह सिर कट जाने पर भी जीवित रहा।

ब्रह्मा जी ने स्वरभानु से कहा कि तुम्हारा सिर राहु के नाम से जाना जाएगा और धड़ जो केतु के रूप में जाना जाएगा। सूर्य और चन्द्रमा के कारण ही उसे इस स्थिति से गुजरना पड़ा था इसलिए वह उसे अपना शत्रु मानने लगा।

कहते हैं कि राहु-केतु सूर्य और चन्द्रमा को निगल लेते हैं जिसके फलस्वरुप सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होता है। राहु-केतु सदैव एक-दूसरे से सातवें घर में स्थित रहते हैं और दोनों के बीच 180 डिग्री की दूरी बनी रहती है। ये सदैव वक्री रहते हैं।

सूर्यादि सातों ग्रह अगर राहु और केतु के मध्य हो तब यह योग बनता है। अगर ग्रह केतु और राहु के मध्य हो तो कालसर्प योग नहीं माना जाएगा। कालसर्प योग के विचार में ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सभी ग्रह एक अर्धवृत्त के अंदर होने चाहिएं।

कुण्डली में कालसर्प योग के अतिरिक्त सकारात्मक ग्रह अधिक हों तो व्यक्ति उच्चपदाधिकारी भी बनाता है, परन्तु एक दिन उसे संघर्ष अवश्य करना पड़ता है। यदि नकारात्मक ग्रह अधिक बली हों तो जातक को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ता है।

कालसर्प दोष के प्रकार

कालसर्प-दोष या कालसर्प योग 288 प्रकार के है। क्योंकि 12 राशियों में 12 प्रकार का कालसर्प योग (12 x 12 = 144) तथा 12 लग्नों में 12 प्रकार कालसर्प योग (12 x 12 = 144) । दोनों को मिलाने से कुल 288 प्रकार का कालसर्प दोष होता है। इनमें से मुख्य 12 प्रकार के कालसर्प योग इस प्रकार हैं-

1 अनंत कालसर्प योग – प्रथम भाव में राहु और सप्तम भाव में केतु हो।

जब प्रथम भाव में राहु और सप्तम भाव में केतु होता है तब यह योग बनता है। इस योग से प्रभावित होने पर व्यक्ति को शारीरिक और, मानसिक परेशानी उठानी पड़ती है साथ ही सरकारी व अदालती मामलों में उलझना पड़ता है। इस योग में अच्छी बात यह है कि इससे प्रभावित व्यक्ति साहसी, निडर, स्वतंत्र विचारों वाला एवं स्वाभिमानी होता है।

उपाय – बिल्ली की जेर को लाल रंग के कपड़े में डालकर धारण करें। दूध का दान करें। चाँदी की थाली में भोजन करें। काले तथा नीले रंग के कपड़े पहनने से बचें। जेब में लोहे की साबुत गोलियाँ रखना भी लाभप्रद होता है।

2 कुलिक कालसर्प योग – दूसरे भाव में राहु और आठवें भाव में केतु हो।

द्वितीय भाव में जब राहु होता है और आठवें घर में केतु तब कुलिक नामक कालसर्प योग बनता है। इस कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक काष्ट भोगना होता है। इनकी पारिवारिक स्थिति भी संघर्षमय और कलह पूर्ण होती है। सामाजिक तौर पर भी इनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं रहती।

उपाय – चाँदी की ठोस गोली अपने पास रखें। सोना, केसर अथवा पीली वस्तुएँ धारण करें। चारित्रिक फिसलन से बचें। दोरंगा काला सफेद कंबल धर्म स्थान में दान दें। कान का छेदन भी लाभप्रद होता है। हाथी के पांव की मिट्टी कुएं में डालें।

3 वासुकि कालसर्प योग– तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु हो।

जन्म कुण्डली में जब तृतीय भाव में राहु होता है और नवम भाव में केतु तब वासुकि कालसर्प योग बनता है। इस कालसर्प योग से पीड़ित होने पर व्यक्ति का जीवन संघर्षमय रहता है और नौकरी व्यवसाय में परेशानी बनी रहती है। जातक को भाग्य का साथ नहीं मिल पाता है व परिजनों एवं मित्रों से धोखा मिलने की संभावना रहती है।

उपाय – हाथी दांत की वस्तु भूल कर भी अपने पास न रखें। चारपाई के पायों पर ताँबे की कील लगवा लें। रात्रि में सिरहाने में अनाज रखें तथा प्रातः यह अनाज पक्षियों को खिला दें। झूठ बोलने से बचें। स्वर्ण की अंगूठी या कोई भी स्वर्ण आभूषण धारण करें। केसर का तिलक लगाएँ।

4 शंखपाल कालसर्प योग– चतुर्थ भाव में राहु और दशम भाव में केतु हो।

शंखपाल कालसर्प योग राहु जब कुण्डली में चतुर्थ स्थान पर हो और केतु दशम भाव में तब यह योग बनता है। इस कालसर्प से पीड़ित होने पर व्यक्ति को आंर्थिक तंगी का सामना करना होता है। इन्हें मानसिक तनाव का सामना करना होता है। इन्हें अपनी मां, ज़मीन, परिजनों के मामले में कष्ट भोगना होता है।

उपाय – शंखपाद कालसर्प योग- ग्ंगा स्नान करें। चांदी की अंगूठी धारण करना लाभप्रद रहेगा। मकान की छत पर कोयला रखने से बचें। यदि रोग ज्यादा परेशान कर रहे हों तो 400 ग्राम बादाम नदी में प्रवाहित करें। चंदी की डिब्बी में शहद भरकर घर से बाहर सुनसान स्थान में दबा दें।

5 पद्म कालसर्प योग – पंचम भाव में राहु और एकादश भाव में केतु हो।

पंचम भाव में राहु और एकादश भाव में केतु होने पर यह कालसर्प योग बनता है। इस योग में व्यक्ति को अपयश मिलने की संभावना रहती है। व्यक्ति को यौन रोग के कारण संतान सुख मिलना कठिन होता है। उच्च शिक्षा में बाधा, धन लाभ में रूकावट व वृद्धावस्था में सन्यास की प्रवृत होने भी इस योग का प्रभाव होता है।

उपाय – अपनी पत्नी के साथ समस्त रीति-रिवाजों के साथ दूसरी बार शादी करें। घर में गाय या कोई भी दुधारू पशु पालें। चांदी का छोटा सा ठोस हाथी अपने पास रखें। दहलीज बनाते समय जमीन के नीचे चांदी का पत्तर डाल दें। पराई स्त्री से दूर रहें। नित्य सरस्वती स्तोत्र का पाठ करं।

6 महापद्म कालसर्प योग – छठे भाव में राहु और द्वादश भाव में केतु हो।

जिस व्यक्ति की कुण्डली में छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु होता है वह महापद्म कालसर्प योग से प्रभावित होता है। इस योग से प्रभावित व्यक्ति मामा की ओर से कष्ट पाता है एवं निराशा के कारण व्यसनों का शिकार हो जाता है। इन्हें काफी समय तक शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है। प्रेम के मामलें में ऐसे जातक दुर्भाग्यशाली होते हैं।

उपाय – राहु तथा केतु क्रमशः षष्ठ तथा द्वादश भाव में स्थित होकर इस योग की रचना करते हैं। निम्न प्रयोग लाभकारी रहेंगे। घर में पूरा काला कुत्ता पालें। काला चश्मा पहनना शुभ होगा। भाईयों या बहनों के साथ किसी रूप में झगड़ा न करें। चाल-चलन पर संयम रखें। कुंआरी कन्याओं का आशीर्वाद लेते रहें। सरस्वती की आराधना कष्ट दूर करने में सहायक होगी।

7 तक्षक कालसर्प योग – सप्तम भाव में राहु और प्रथम भाव में केतु हो।

तक्षक कालसर्प योग की स्थिति अनन्त कालसर्प योग के ठीक विपरीत होती है। इस योग में केतु लग्न में होता है और राहु सप्तम में। इस योग में वैवाहिक जीवन में अशांति रहती है। कारोबार में साझेदारी लाभप्रद नहीं होती और मानसिक परेशानी देती है।

उपाय – इस कालसर्प योग में राहु सप्तम तथा केतु लग्न भाव में स्थित होता है। ये उपाय करें। भूलकर भी कुत्ता न पालें। चलते पानी में नारियल बहाएं। विवाह के समय चांदी की ईंट अपनी पत्नी को दें।

ध्यान रहे इस ईंट का बेचना विनाश का कारण होता है। अतः हमेशा संभालकर रखें। घर में चांदी की ईंट रखें। किसी बर्तन में नदी का जल लेकर उसमें एक चांदी का टुकड़ा रखकर धर्मस्थान में दें। तांबे की वस्तुओं को दान में न दें। तांबे की गोली अपने पास रखें।

8 कर्कोटक कालसर्प योग – आठवें भाव में राहु और दूसरे भाव में केतु हो।

अगर राहु आठवें घर में और केतु दूसरे घर आ जाता है और बाकी ग्रह इनके बीच में हों तो कर्कोटक कालसर्प योग कुंडली में बन जाता है। ऐसी कुंडली वाले इंसान का धन स्थिर नहीं रहता है और गलत कार्यों में धन खर्च होता है।

उपाय – माथे पर तिलक लगाएँ। भड़भूजे की भट्ठी में ताँबे का पैसा डालें। चार नारियल नदी में बहाएँ। बेईमानी से पैसे न कमाएँ। सूखे मेवे चाँदी के बत्र्तन में डालकर धर्मस्थान में दें। जन्म के आठवें मास से कुछ बादाम मंदिर ले जाएँ आधे वहीं छोड़ दें बाकी बचे बादाम अपने पास रख लें। यह क्रिया अगले जन्मदिन आने तक करं। चांदी का चैकोर टुकड़ा जेब में रखें।

9 शंखचूड़ कालसर्प योग – नवम भाव में राहु और तृतीय भाव में केतु हो।

तृतीय भाव में केतु और नवम भाव में राहु होने पर यह योग बनता है। इस योग से प्रभावित व्यक्ति जीवन में सुखों को भोग नहीं पाता है। इन्हें पिता का सुख नहीं मिलता है। इन्हें अपने कारोबार में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। उपाय – सोना धरण करें। केसर का तिलक लगाएँ। पीला वस्त्र धारण करें। सुबह-सुबह पक्षियों को दाना-पानी डालें।

10 घातक कालसर्प योग – दशम भाव में राहु और चतुर्थ भाव में केतु हो।

कुण्डली के दशम भाव में राहु और चतुर्थ भाव में केतु के होने से घातक कालसर्प योग बनता है। इस योग से गृहस्थी में कलह और अशांति बनी रहती है। नौकरी एवं रोजगार के क्षेत्र में कठिनाईयों का सामना करना होता है।

उपाय – सिर खाली न रखें। टोपी या साफा कोई भी चीज सिर पर हमेशा रखें। सरस्वती का पूजन करें। चांदी का चैकोर टुकड़ा जेब में रखें। सोने की चेन पहनें। हल्दी का तिलक लगाएँ। मसूर दाल (बिना छिलके वाली) नदी में प्रवाहित करें।

11 विषाक्त या विषधर कालसर्प योग – एकादश भाव में राहु और पंचम भाव में केतु हो।

राहु एकादश में और केतु जब पंचम भाव में होता है तब यह योग बनता है। इस योग से प्रभावित व्यक्ति को अपनी संतान से कष्ट होता है। इन्हें नेत्र एवं हृदय में परेशानियों का सामना करना होता है। इनकी स्मरण शक्ति अच्छी नहीं होती। उच्च शिक्षा में रूकावट एवं सामाजिक मान प्रतिष्ठा में कमी भी इस योग के लक्षण हैं।

उपाय – मंदिर में दान करं। ताँबे या लाल वस्तु दान न दें। अस्त्र-शस्त्र घर में न रखें। सोने की अंगूठी पहनें। चार नारियल को जल में प्रवाह देना इस योग के अशुभ फल में न्यूनता लाएगा। चांदी के ग्लास में पानी पिएं। रात में दूध ना पिएँ।

12 शेषनाग कालसर्प योग – द्वादश भाव में राहु और छठे भाव में केतु हो।

व्यक्ति की कुण्डली में जब छठे भाव में केतु आता है तथा बारहवें स्थान पर राहु तब यह योग बनता है। इस योग में व्यक्ति के कई गुप्त शत्रु होते हैं जो इनके विरूद्ध षड्यंत्र करते हैं। इन्हें अदालती मामलो में उलझना पड़ता है।

मानसिक अशांति और बदनामी भी इस योग में सहनी पड़ती है। इस योग में एक अच्छी बात यह है कि मृत्यु के बाद इनकी ख्याति फैलती है। अगर आपकी कुण्डली में है तो इसके लिए अधिक परेशान होने की आवश्यक्ता नहीं है।

काल सर्प योग के साथ कुण्डली में उपस्थित अन्य ग्रहों के योग का भी काफी महत्व होता है। आपकी कुण्डली में मौजूद अन्य ग्रह योग उत्तम हैं तो संभव है कि आपको इसका दुखद प्रभाव अधिक नहीं भोगना पड़े और आपके साथ सब कुछ अच्छा हो।

उपाय – लाल मसूर दाल का दान दें। धर्म स्थान में ताँबे के बर्तन दान में दें। चांदी का ठोस हाथी घर में रखें। सोने की चेन पहनें। सरस्वती का पूजन नीले पुष्पों से करें। कन्या तथा बहन को उपहार देते रहें।

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