करवा चौथ – महिलाओं के अखंड सौभाग्य, प्यार और विश्वास का प्रतीक

17 अक्टूबर 2019 गुरूवार को है करवाचौथ का व्रत

रखा है करवाचौथ का व्रत मैंने, बस एक ख्वाहिश के साथ,
एक जन्म नहीं सातों जन्म मिले हमें एक दूजे का साथ।

पति-पत्नी के मजबूत रिश्ते, अखंड सौभाग्य, प्यार और विश्वास का प्रतीक करवाचौथ का व्रत 17 अक्टूबर 2019 गुरूवार को है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष करवा चौथ पर 70 साल बाद रोहिणी नक्षत्र और मंगल का विशेष योग बन रहा है। यह संयोग करवा चौथ के पूजन को अधिक मंगलकारी बना रहा है।

सुहागिनों के लिए यह बेहद फलदायी होगा। यह योग भगवान श्री कृष्ण और सत्यभासा के मिलन के समय भी बना था। मान्यताओं के अनुसार यह योग चंद्रमा की 27 पत्नियों में सबसे प्रिय, सबसे सुंदर, तेजस्वी, सुंदर वस्त्र धारण करने वाली पत्नी रोहिणी के साथ होने से बन रहा है। इसका सबसे ज्यादा लाभ उन महिलाओं की जिंदगी में आएगा जो पहली बार करवाचौथ का व्रत रखेंगी।

करवाचौथ’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘करवा’ यानी ‘मिट्टी का बरतन’ और ‘चौथ’ यानि ‘चतुर्थी’। भारत में करवाचौथ का त्योहार पति-पत्नी के आपसी विश्वास और प्रेम के प्रतीक के रुप में माना जाता है। करवाचौथ का महापर्व पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, विशेषकर उत्तर भारत के हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में तो इस पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

सुहाग और अटूट प्रेम का प्रतीक करवा चौथ का व्रत सुहागिन स्त्रियां के लिए अति महत्वपूर्ण पर्व होता है । इस दिन सौभाग्यवती (सुहागिन) स्त्रियाँ दिन भर भूखी-प्यासी रहकर अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य, दीघर्यु की कामना करती है।

माना जाता है कि करवा चौथ का व्रत करने से न केवल पति की उम्र लंबी होती है बल्कि वैवाहिक जीवन भी सुखी रहता है। सभी विवाहित स्त्रियां साल भर इस त्योहार का इंतजार करती हैं और इसकी सभी विधियों को बड़े श्रद्धा-भाव से पूरा करती हैं।

खास बात यह है कि करवा चौथ के व्रत में भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, श्री कार्तिकेय और चंद्रमा की पूजा का विधान है। माना जाता है कि अगर इन सभी की पूजा की जाए तो माता पार्वती के आशीर्वाद से जीवन में सभी प्रकार के सुख मिलते हैं और सुहागिनों के वैवाहिक जीवन में इससे प्रेम का संचार बढ़ता है और पति की लंबी आयु से महिलाओं को सौभाग्यवती होने आशीर्वाद मिलता है।

एक अच्छे वर की तलाश

करवा चौथ का व्रत भारतीय स्त्रियों के द्वारा अपने पति की लम्बी आयु के लिए रखा जाता है। वही कुंवारी लड़कियां करवा चौथ का व्रत एक अच्छे वर की तलाश में रखती है। जहां सुहागिन इस व्रत में चंद्रमा की पूजा करती है तो वहीं, कुंवारी लड़कियां तारों को पूजती हैं।

करवाचौथ के दिन सुहागन महिलाएं अपने व्रत से माता गौरी और भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, ताकि उन्हें अखंड सुहाग और सुखी दाम्पत्य जीवन का आशीर्वाद मिले। इस दिन कई पति भी अपनी पत्नि का साथ देने के लिए उनके लिए उपवास रखते हैं।

अखण्ड सुहाग की कामना से किया जाना वाला अत्यंत कठिन व्रत करवा चौथ के दिन विवाहित स्त्रियां सुंदर कपड़े, गहने पहन कर सोलह श्रृंगार करती हैं और चंद्रमा की पूजा करती हैं। अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना के लिए करवा चौथ के व्रत के पूरे दिन सुहागिन स्त्रियां निर्जला व्रत करती है।

करवा चौथ का व्रत निर्जला रखा जाता है, इसमें व्रत रहने वालली सुहागिन के लिए पूरे दिन तक कुछ भी खाना और पीना वर्जित रहता है। करवा चौथ के व्रत में जल का त्याग करना होता है। सूर्योदय से चंद्रमा के उदय होने तक जल की एक बूंद भी स्त्रियां ग्रहण नहीं करती हैं और अन्न,फल इत्यादि का कुछ भी सेवन नहीं करती हैं। हालांकि गर्भवती, बीमार और स्तनपान कराने वाली महिलाएं दूध, चाय, जल आदि ग्रहण कर सकती हैं।

जब चांद निकलता है तो सभी विवाहित स्त्रियां छलनी से चांद और पति को देखकर उनके हाथ से जल ग्रहण कर अपना करवाचौथ के व्रत तोड़ेंगी हैं और सारी रस्में पूरी करती हैं। कहते हे कि करवाचौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मिलता है, उनके घर में सुख, शान्ति, समृद्धि और सन्तान सुख भी मिलता है।

मेरा (युद्धवीर सिंह लांबा धारौली, झज्जर) मानना भी यही है कि भारत देश में शादी को एक पवित्र बंधन माना जाता है, जिसमें पति-पत्नी सात जन्मों के बाद ही अलग होते हैं । भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां आज भी तलाक दर बहुत कम है।

पति की दीर्घायु के लिए करवाचौथ व्रत

भारतीय संस्कृति में पति को परमेश्वर का दर्जा दिया जाता है और महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए करवाचौथ व्रत रखती हैं। हिंदी फिल्म गंगा जमुना सरस्वती का एक बहुत ही प्यारा गीत बरबस ही सुहागिनों की जुबान पर आ जाया करता है । ‘पति परमेश्वर के सिवा ना मुझको परमेश्वर चाहिए। मैं सुहागिन रहूं सात जन्मों तलक मुझको मेरा ही वर चाहिए’।

पति की लंबी आयु और सलामती को समर्पित होने वाले करवाचौथ के पवित्र त्योहार को भारत में कब से मनाया जाता है और यह कितना प्राचीन है इस बारे में अलग-अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार करवाचौथ का व्रत सर्वप्रथम पतिव्रता सावित्री ने अपने पति की जान बचाने के लिए किया था।

कहते है कि इस कथा के अनुसार जब यमराज सत्यवान की आत्मा को लेने आए, तो सावित्री ने खाना-पीना सब त्याग दिया था । उसकी जिद के आगे यमराज को झुकना ही पड़ा और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।

द्रौपदी ने भी रखा था करवा-चौथ का व्रत

भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ की कथा का महत्व सुनाते हुए कहा था कि पूरी श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था।

आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित लगभग चौबीस हज़ार श्लोकों का एक अनुपम महाकाव्य रामायण के अयोध्याकाण्ड में सीता प्रभु श्री राम से कहती हैं कि
जहँ लगिनाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते, तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू ।

भावार्थ: हे नाथ, जहाँ तक स्नेह और नाते हैं, पति के बिना स्त्री को सूर्य से भी बढ़कर तपाने वाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पति के बिना स्त्री के लिए यह सब शोक का समाज है ।

लेखक युद्धवीर सिंह लांबा, अकिडो कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, बहादुरगढ़ जिला झज्जर, हरियाणा में रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत है ।

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