कटघोरा: वनमंडलाधिकारी की बढ़ सकती हैं मुसीबते, अब ठेकेदार व सप्लायर आमरण अनशन की बना रहे योजना..

कटघोरा. कटघोरा वनमंडल में विवाद थमने का नाम नही ले रहा है इस बार वनमण्डलाधिकारी के खिलाफ स्थानीय कॉन्ट्रेक्टर व मटेरियल सप्लायरो ने मोर्चा खोलने की तैयारी की है. डीएफओ पर हर बार की तरह इस बार भी विभिन्न निर्माण कार्यो से जुड़े भुगतान को लटकाने के आरोप लगे है. ठेकेदारों का कहना है कि यदि फारेस्ट डिपार्टमेंट उनके लंबित राशि के भुगतान में देर करती है तो वे वनमंडल परिसर में आमरण अनशन करेंगे. उन्होंने एक पत्र विभाग को लिखा है. पत्र की प्रतिलिपि कोरबा कलेक्टर, एसडीएम, एसडीओपी व थाना प्रभारी को प्रेषित किया है.
गौरतलब है कि वनमंडल की ओर से कराए गये निर्माण कार्यो में नियोजित ठेकेदारो के द्वारा विभाग को मिक्सचर मशीन, वाइब्रेटर, डीजल पम्प, सेनेटरिंग आदि संसाधन तय किराये पर उपलब्ध कराए गए थे. कार्य पूरा होने के महीनों बाद तक उक्त सामग्रियों का किराया राशि ठेकेदारो को प्रदान नही किया गया है. ठेकेदारों कि माने तो कोरोनाकाल में उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब हो चुकी है जिस वजह सर उन्हें भुगतान की आवश्यकता महशुस हो रही है

आखिर वनमंडलाधिकारी पर लग रहे आरोप क्या वाकई यथार्थ हैं या पूरी तरह बेबुनियाद?

दरअसल वन विभाग में वर्ष 2017-18 में हुए निर्माण कार्यो का भुगतान आज पर्यंत तक लंबित है जिस वजह से ठेकेदार व सप्लायरों के सब्र का बाण टूट चुका है।पर क्या इस लंबित भुगतान की वजह वनमंडलाधिकारी ही है या वजह कुछ और है?सूत्रों की माने तो विभाग के अंतर्गत हुए घटिया निर्माण इसकी बड़ी वजह है जो आज पर्यंत तक भुगतान लंबित अवस्था मे बना हुआ है जिन ठेकेदारों पर मेहरबान होकर विभागीय अधिकारियों ने निर्माण कार्यो का जिम्मा इन्हें सोंपा था दरअसल वे घटिया निर्माण कर विभाग को दोहरी राह पर खड़ा दिया था,अब ऐसे परिस्थितियों में आखिर विभाग घटिया निर्माण कार्यो का भुगतान कैसे करें?

लिहाजा वनमंडलाधिकारी ने सभी निर्माण कार्यो की उच्चस्तरीय जांच कराने टीम गठित की।जिसमे लम्बा समय लग गया और जांच उपरांत जिन कार्यो को सही पाया गया उनके भुगतान को शीघ्र करने की पहल विभाग द्वारा शुरू कर दी गई और जिन कार्यो में त्रुटि रही उन्हें दूर कर भुगतान करने की बात सामने आई थी।इस दौरान जांच पूरी होने के पश्चात विभाग लंबित प्रकरणों के भुगतान को शीघ्र करने की तैयारी में लगा हुआ है,लेकिन ठेकेदार व सप्लायरों का रुख आमरण अनशन की ओर जाना समझ से परे है,अगर निर्माण कार्यो में इन्होंने गुणवत्ता को शीर्ष पर रख होता तो शायद! इन कार्यो का भुगतान तात्कालीन वनमंडलाधिकारी के कार्यकाल में ही संभव हो जाता।लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वन विभाग पूरी तरह साक पाक है लंबित भुगतान विभाग की शिथिल कार्यशैली को बया करता है।देखने वाली बात यह होगी कि इस आमरण अनशन का विभाग पर कितना असर होता है।

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