ज्योतिष

केतु – पाप पुण्य की चेतना

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

जीवन में कष्ट देना और जीवन के कार्यों में बाधाएं देने का कार्य केतु ग्रह करता है। अचानक दुर्घटना, शल्य चिकित्सा और भूत-प्रेत बाधा यह सभी केतु के कार्यक्षेत्र है। केतु को मोक्ष कारक ग्रह भी कहा गया है। मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक है की व्यक्ति पुण्य कर्म एकत्रित करें। श्रीमद भगवद्गीता के एक श्लोक के अनुसार –

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं, क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना, गतागतं कामकामा लभन्ते।

अर्थात
जीवात्माएं उस विशाल स्वर्ग लोक के भोगों को भोग कर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक में आ जाती हैं और पुण्य प्राप्त होने पर मृत्यु लोक से गमन कर जाती है।

इस लोक में पुण्य कर्म करने के लिए प्रेरित करने और जीवात्मा को मोक्ष का मार्ग दिखाने का कार्य केतु ग्रह करता है। इसके लिए वह व्यक्ति को पाप कर्म और पुण्य कर्म दोनों में अन्तर करने की चेतना देता है। जीवन का उद्देश्य स्पष्ट करता है। यह सर्वविदित है की प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार जीवन में सुख – दुःख की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में वर्णित स्वर्ग और नर्क के द्वार केतु के द्वारा ही खुलते है।

जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन स्वहित और दूसरों के हितों का ध्यान रखते हुए, करता है तो व्यक्ति सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है, और इसके विपरीत होने पर वह ना अपने हितों का ख्याल रखता है और ना ही दूसरों के हितों को महत्व देता है।

इस भावना में स्वार्थ ही स्वार्थ होता है, त्याग और परहित की भावना गौण होती है। प्राणी मात्र के सभी जीवों के हितों को महत्व देना, और आपकी वजह से किसी को कोई कष्ट ना हो, इस विचार के साथ जीवन जीना ही सदमार्ग पर रहना है।

मंगल केतु एक साथ जिस भाव को दृष्टि देते है उस भाव में फोड़े फुन्सी, कैंसर की सम्भावना देते है। प्राणी को मोक्ष देने का कार्य क्षेत्र परमात्मा ने केतु के सुपुर्द किया है। केतु की स्थिति त्रिक भाव में मंगल-शनि के साथ युति में हो तो वह जातक को एक उत्तम स्तर का शल्य चिकित्सक बनाता है।

देश रक्षक बनाता है या फिर देशद्रोही बनाकर आतंकवादी बना सकता है। केतु व्यक्ति के जीवन में स्पीड ब्रेकर का काम करता है। केतु व्यक्ति की सिक्थसेंस को सक्रिय करता है। केतु व्यक्ति को सांसारिक विषयों से उन्मुख कर आध्यात्मिक विषयों से जोड़ता है।

सांसारिक जीवन से मोहभंग करने के लिए केतु व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक कष्ट देता है। व्यक्ति को बोध कराता है कि सांसारिक सुख काफी भोग लिए है, अब जीवन को परमात्मा की प्राप्ति में लगाओ।

ईश्वर की भक्ति में मन लगाने और स्वयं को ईश्वर को समर्पित करने का सन्देश देता है। इस प्रकार जीवन शान्ति की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ता है। इसके लिए यथासंभव उपाय करने की प्रेरणा भी केतु देता है। शान्ति की तलाश में व्यक्ति को एकांत में लेकर जाता है।

मोक्ष और शान्ति की प्राप्ति के लिए व्यक्ति तीथों पर भटकता है। संतों, महात्माओं, सन्यासियों और धर्म गुरुओं के सानिंध्य में समय व्यतीत करता है। कई बार व्यक्ति अपने दायित्वों से भागकर संन्यास जीवन का रुख लेता है।

परिवार की जिम्मेदारियों से भागने वालों को मोक्ष की प्राप्ति से जीवन में कष्ट का आगमन होने पर ही व्यक्ति ईश्वर को याद करता है। सुख के समय में व्यक्ति धर्म, आस्था, विश्वास और भक्ति को संदेह की निगाहों से देखता है, केतु का रोग, शोक और व्यय भाव में होने का अर्थ यह है की व्यक्ति का जन्म दूसरों के ऋण चुकाने के उद्देश्यों से ही हुआ है। ऐसे में व्यक्ति देश सेवा, समाज सेवा के कार्यों से जोड़ता है।

व्यक्ति ऐसे काम पूर्ण करें इसके लिए प्रशासनिक, सरकारी शक्तियों से युक्त भी करता है। किसी उच्च पद पर आसीन कर देता है। समाज, संसार और शरीर के दोषों को दूर करने का कार्य करता है।

केतु कष्ट देने से पूर्व व्यक्ति का ध्यान भटकाता है। सामने होते हुए भी चीजे दिखाई नहीं देती है। दृष्टिभ्रम देकर दुर्घटनाएं कराता है। ज्ञानभ्रम देकर सम्मान हानि की स्थिति बनाता है। अज्ञानी होने पर भी व्यक्ति ज्ञान और सीख देने लगता है।

अब प्रश्न यह उठता है की आखिर केतु को ही क्यों मोक्ष का कारक कहा जाता है। जैसा की हम जानते है की राहु सिर है और केतु गर्दन से नीचे का भाग है। मोक्ष से क्या अभिप्राय है – मोक्ष दुखों की पूर्ण निवृत्ति है, यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है, इस लक्ष्य को इसी जीवन में पाया जा सकता है, मोक्ष जन्म मरण चक्र का समाप्त हो जाना है।

मोक्ष का सामान्य अर्थ दुखों का विनाश है। मोक्ष का विचार बन्धन से जुड़ा हुआ है। आत्मा का सांसारिक दुखों से ग्रस्त होना ही उसका बन्धन है और इन दुखों से सर्वथा मुक्त हो जाना मोक्ष। व्यावहारिक जीवन में प्राय: हर कोई कहता है कि मैं दुखी हूँ, मुझे दुख है, यहाँ मैं प्रश्न यह है कि ‘मैं का अर्थ क्या है? व्यक्ति का अहं ही ‘मैं है।

अहम् होने के लिए मस्तिष्क होना अनिवार्य है। और केतु के पास सिर नहीं है इसलिए केतु ग्रह अहंकार से रहित है। उसे आत्मज्ञान है। केतु को सांसारिक सम्मान, पद, पदवी और ताज की कामना नहीं रहती।

केतु अपने प्रभाव से व्यक्ति को तख्तोताज को छोड़कर शान्ति के मार्ग पर लेकर जाता है। जैसे -महात्मा गौतम बुद्ध ताज का त्याग कर रातोंरात घर से निकल गए थे, भगवान् श्रीराम ताज छोड़कर वचन पालन के लिए वनवास चले गए थे।

केतु बारहवें भाव में ही क्यों मोक्ष देता है। यह पुनर्जन्म के चक्र से बाहर कर जीवन मृत्यु पर विराम लगाता है। यहाँ भी एक अन्य प्रश्न जन्म लेता है की यदि केतु बारहवें भाव में मोक्ष प्रदायक है तो क्या यहां “कारकाय भाव नाशाय” सिद्धांत के विपरीत कार्य कर रहा है।

अनुभव में यह पाया गया है की शनि आठवें भाव का कारक होकर इस भाव में होने पर आयु वृद्धि देता है, ठीक इसी तरह से केतु का बारहवें भाव में होना मोक्ष कारक है। गुरु ग्रह धर्म और आध्यात्म देने वाले ग्रह है और केतु को भी आध्यात्मिक उन्नति देने वाला ग्रह कहा गया है।

गुरु सांसारिक रिश्तों को निभाते हुए जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए धर्म पालन देता है। इसके विपरीत केतु संसारिकता का त्याग कर व्यक्ति को साधना जीवन की ओर अग्रसर करता है। केतु प्रभावित व्यक्ति के लिए रिश्तों के मोह से मुक्त होता है, वह रिश्तों को तुच्छ मानता है।

केतु की अपेक्षा गुरु का प्रभाव अधिक हो तो व्यक्ति जनकल्याण और धर्मार्थ विषयों में धन एवं सेवा कार्य करता है। मंदिरों का निर्माण करता है। प्याऊ लगवाता है, धर्मशालाओं का निर्माण करता है, निर्माण कार्य बशर्ते शनि ग्रह ही कराते है परन्तु धर्म से संबंधित इमारतों का निर्माण विचार गुरु ग्रह ही देता है। अब यदि केतु की बात करें तो केतु संसार से दूर ले जाकर आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त हो जाने के बावजूद व्यक्ति को आगे से आगे आध्यात्मिक उन्नति पर आगे बढ़ता है।

अष्टम में केतु-शुक्र – परिपक्वता और मासूमियत एक साथ

वैदिक ज्योतिष में अष्टम भाव को मृत्यु भाव, छिद्र भाव, छुपे हुए रहस्यों, जातक के द्वारा या जातक पर किए गए षडयंत्रों का और अवैध संबंधों का भाव है। गुप्त प्रेम संबंध भी इसी भाव से देखे जाते हैं। यह भाव हमारी असुरक्षा के विषयों को दर्शाता है।

इस भाव के बली होने का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी ताकत के बल पर अपने गुप्त विषयों को छुपा कर रखता है। इस भाव को दोष भाव के नाम से भी जाना जाता है। यही वह भाव है जो हमें मृत्यु और हमारे अंत के विषय में बताता है।

यह भाव हमारी कमजोरियों की व्याख्या करता है। इस भाव के विषयों के सामने आने से एक ओर जहां मान-सम्मान खतरे में पड़ता है वहीं यह भाव असुरक्षा और डर की स्थिति भी बताता है। जिन व्यक्तियों को व्यर्थ का डर लगता है, उनका यह भाव कमजोर होता है।

असुरक्षा, जीवन के गहन रहस्यों से संबंधित आठवां घर है। इस भाव से मुर्दाघर, कब्रिस्तान, दिवालियापन, कोर्ट, आपदा क्षेत्र, कालकोठरी, अंधेरी जगह आदि का विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस भाव से विरासत भी देखी जाती है।

कमजोरियों और गंभीरता का भाव

यह भाव नुकसान और चीजों को गंभीरता से लेने और सावधान रहने की स्थिति को दर्शाता है। जीवन में छिपी, चौंकाने वाली, निंदनीय, भ्रामक और अप्रत्याशित घटनाएं आठवें घर के माध्यम से आती हैं। यह हमारी कमजोरी और हमारे गहरे डर से संबंधित है। यह मुक्ति का दूसरा घर है और दिखाता है कि हम किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से स्वतंत्रता की तलाश करते हैं और सामान्य रूप से अन्य लोगों के प्रभाव से भी मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं।

अगर हम इस भाव से संबंधित मुद्दों का सामना करने की हिम्मत रखते हैं तो यह रचनात्मक का भाव है। इस भाव से संबंधित हमें शीघ्र रात देगी या इस दर्द से दोचार अधिक होना पड़ेगा। इस भाव से व्यक्ति की बड़ी गलतियां और सबसे गहरे रहस्यों को देखा जा सकता है। मुश्किल के समय में हम स्वयं को कैसे संभालते हैं, यह दर्शाता है कि हम जीवन में कितने विकसित है, हम कितने परिपक्व है इस भाव के विश्लेषण से जाना जा सकता है। हमारे व्यक्तिगत दर्शन, ज्ञान और अंतर्दृष्टि की व्याख्या भी यही भाव करता है।

परिपक्वता का भाव

सही मायनों में यह भाव अन्य लोगों के साथ हमारी परिपक्वता का भंडार है। यह मृत्यु और अपनों को खोने पर हमारी परिपक्वता को दर्शाता है। यह रिश्तों में हमारी ईर्ष्या, द्वेष और भय की स्थिति बताता है, इन समस्याओं का हम किस प्रकार सामना करते है, कितनी परिपक्वता से स्वयं को संभालते है। यह दिखाता है कि हम कमजोरियों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। उदाहरण के लिए – छल, झूठ और विश्वासघात, हत्या और हमारे मानस के कई गहरे हिस्सों में जन्में बीज आठवें घर के हैं। जिन व्यक्तियों में छल, झूठ, विश्वासघात, हत्या और कुविचार अधिक आते हैं ऐसे व्यक्ति का लग्नेश अष्ट्मेश के नक्षत्र में स्थित होता है। कुंड्ली में लग्नेश का नीच राशि का स्थित होना भी व्यक्ति में छुपे हुए दुर्गुणों की जानकारी देता है।

अष्टम भाव में शुक्र

अब बात करें हम शुक्र ग्रह की तो अष्टम भाव में शुक्र प्राय: समस्याग्रस्त होता है। विशेष रूप से, यौन संबंधों और इससे जुड़ी हमारी इच्छाओं को लेकर। इस भाव में शुक्र की स्थिति यह बताती है कि इन विषयों के फलस्वरुप आपको आने वाले जीवन में बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। अष्टम शुक्र की इच्छाएं हमें आम तौर पर गलतियों की ओर ले्कर जाती हैं और आठवें भाव के परिणाम उच्च और अक्सर दर्दनाक होते हैं।

इस भाव में शुक्र जिस भाव का स्वामी होता है उस भाव से जुड़े विषयों के फलों को भी बाधित करता है। अष्ट्म भाव का शुक्र हमें सिखाता है कि जिस भाव का स्वामी शुक्र है उस भाव के फलों को पाने के लिए या अनुकूल रुप में पाने के लिए संबंधित विषय से जुड़ी इच्छाओं का समय रहते प्रबंधन कर लेना चाहिए, अन्यथा जीवन में यह कष्ट देता है, कष्ट बढ़ने पर आरोप, सजा और दंड की स्थिति भी यह देता है। जैसे –

1. यदि शुक्र कुंड्ली में लग्नेश है और अष्टम भाव में स्थित है तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य सुख को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रबंधन करना होगा।

2. इसी प्रकार शुक्र यदि दूसरे भाव का स्वामी होकर अष्ट्म भाव में हैं तो संचित धन और कुटुंम्ब को लेकर नियोजन, प्लानिंग करनी उत्तम रहती है।

3. तीसरे भाव का स्वामी होकर शुक्र अष्टम भाव में हो तो जातक को यात्रा करते समय यात्राओं पर जाते समय, महिला मित्रों से बातचीत करते समय, महिला मित्रों से निकटता बढ़ाते समय अतिरिक्त सावधानी और प्रबंधन करना चाहिए।

4. चतुर्थ भाव का स्वामी शुक्र हों और अष्टम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को माता का सुख पाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं।

5. शुक्र पंचमेश होकर अष्ट्म भाव में स्थित हो तो व्यक्ति के अनेक गुप्त प्रेम संबंध होते है, रिश्तों को छुपाने के लिए व्यक्ति एक के बाद एक झूठ बोलता है। अपने अनैतिक रिश्तों को सामने आने से बचाने के लिए एक पाप के बाद दूसरा पाप करता चला जाता है।

ऐसे पुरुष जातक की महिलाओं से अतिरिक्त निकटता रहती हैं, और ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए नैतिकता के सारे नियमों को किनारे कर चलता है। प्रेम संबंधों में ऐसा व्यक्ति स्वार्थी और विश्वासघाती भी होता है।

ऐसे व्यक्ति एक के बाद एक अनेक स्नेह संबंध रखता है और सभी रिश्ते अंत में जाकर टूट जाते है। ऐसे व्यक्ति को खास तौर पर अपने प्रेम संबंधों की अतिरिक्त देखभाल अवश्य करनी चाहिए।

6. छ्ठे भाव का स्वामी शुक्र यदि अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति के रोग नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं, ऐसे व्यक्ति को अपने रोगों को नियंत्रित करने के लिए प्रबंधन करना चाहिए।

7. सप्तमेश शुक्र का अष्ट्म भाव में जाना वैवाहिक जीवन को कष्ट्मय तो बनाते ही है साथ ही यह वैवाहिक जीवन की असफलता का कारण भी बनता है।

8. अष्टमेश शुक्र अष्टम में हो तो व्यक्ति के जीवन में अप्रत्याशित घटनाएं सामान्य से अधिक होती है।

9. भाग्येश शुक्र अष्टम भाव में हो तो भाग्य की कमी, ऊपरी बाधा और पिता के स्वास्थ्य के लिए प्रबंधन करना अनिवार्य हो जाता है।

10. दशमेश शुक्र का अष्टम भाव में स्थित होना, कार्यक्षेत्र में अतिरिक्त सावधानी के साथ उतार चढ़ाव की स्थिति भी देता है।

11. एकादश भाव का शुक्र अष्ट्म भाव में होना, आय प्रबंधन और तनाव की स्थिति देता है।

12. द्वादशेश होकर शुक्र अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए कि कारावास की स्थिति बनें।
आईये अब केतु को जानें-

वैदिक ज्योतिष में केतु

केतु को सूक्ष्मता, गहन अध्ययन और छुपे हुए विषयों को सामने लाने वाला ग्रह कहा जाता है। केतु ग्रह के बारे में कहा जाता है कि यह जिस भाव में स्थित होता है उस भाव से संबंधित विषयों में बार-बार कष्ट देता है।

जिस भाव में यह स्थित होता है उस भाव के विषयों में आगे बढ़ने से रोकता है। केतु बताता है कि जीव की गति केतु बताता है। यह दुर्घटना और शल्य क्रिया दोनों का संकेत देता है। अध्ययन यह कहता है कि केतु परेशानी का कारण क्यों बनता है?

धर्म आध्यात्म यह कहता है कि जब व्यक्ति के पुण्य कर्म समाप्त हो जाते है तो व्यक्ति पुण्य कर्म अर्जित करने के लिए जीव के रुप में जन्म लेता है और इस उद्देश्य उस जीवन की इस लोक की यात्रा शुरु होती है। जैसे ही पुण्य कर्म एकत्रित हो जाते हैं, तो जीव मृत्यु लोक की ओर वापस पलायन कर जाता है।

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में केतु को मोक्ष का कारक माना गया है। जन्म कुंडली में केतु जिस भाव में स्थित होता है व्यक्ति को उस भाव से संबंधित विषयों में मोक्ष की प्राप्ति होती है। केतु जिस भाव में स्थित होता है उस भाव की कारक वस्तुओं में व्यक्ति को सदमार्ग पर लेकर जाता है।

केतु आध्यात्मिक विषयों को जानने की रुचि जागृत करता है। सांसारिक जीवन से मोह भंग करता है। इसके विपरीत शुक्र भोग-विलास का कारक ग्रह है। व्यक्ति को सांसारिक जीवन, भोग्य और वैवाहिक जीवन की रुचि देता है। इन दोनों ग्रहों का एक सात होना व्यक्ति के चरित्र को जद्दोजहद की स्थिति देता है।

ऐसा व्यक्ति सांसारिक सुखों की ओर कभी भागता है और कभी परमात्मा की ओर भागता है। ऐसे जातक की स्थिति दो नावों पर सवार होने जैसी हो जाती है। केतु का अष्टम भाव में होना व्यक्ति को जीवन के मध्य में बढ़ा बदलाव देता है कि – ऐसा बदलाव की जातक के जीवन की दिशा बिल्कुल बदल जाती है।

शुक्र और केतु की युति अष्टम में होने पर व्यक्ति प्रेम संबंधों में आध्यात्मिकता तलाशता है और बाद में भटक कर, भोग विलासी तो हो जाता है। परन्तु स्वयं को आध्यात्मिक दिखाता है। अर्थात ऐसे व्यक्ति के दो रुप होते हैं।

आंतरिक रुप में व्यक्ति भोग-विलासी और चरित्रहीन होता है परन्तु वह दुनिया के सामने स्वयं को आध्यात्मिक प्रवृत्ति का दिखाता है। एक समय में वह अपना एक ही रुप सामने लाता है, दूसरे रुप को छुपाए रखता है, इसे स्प्लिट पर्सनालिटी के रुप में समझा जा सकता है।

केतु के विषय में ज्योतिष शास्त्र यह भी कहते है कि किसी भी त्रिक भाव में होना जीव का इस लोक में आना, अपने किसी ॠण की पूर्ति करना है। इसमें छ्ठे भाव में केतु की स्थिति उच्च सफलता देने वाली, अष्ट्म भाव का केतु गूढ़ विषयों में गजब का ग्यान और व्याख्या करने की योग्यता देता है।

ऐसा व्यक्ति ज्ञान देने और सीख देने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता, मतलब ऐसे व्यक्ति का ज्ञान गूढ़ तो अवश्य होता है परन्तु वह स्वयं ऐसे ज्ञान का पालन कभी नहीं करता है। उसकी कथनी और करनी में जमीं आसमां का फर्क होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के प्रसिद्धि ग्रंथ के अनुसार – अष्टम भाव में केतु हो तो वह दुर्बुद्धि, तेजहीन, स्त्री द्वेषी एवं चालाक होता है। शुक्र केतु के साथ हो तो जातक दूसरों की स्त्रियों या पर पुरुष के प्रति आकर्षित होता है।

ऐसा व्यक्ति काव्य, संगीत,कविता और साहित्य लेखन में विद्वता रखता है। साहित्य अध्ययन में गहरी रुचि ऐसे व्यक्ति की होती है। इसके साथ ही जातक राजनैतिक विषयों की भी गहरी पकड़ होती है। केतु को शुक्र का साथ अष्टम भाव में मिलने से जातक को अनेक भाषाओं का ग्यान रहता है। कला और सौंदर्यवर्धक विषयों की गहराई से जानकारी रखते है।

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