ज्योतिष

अष्टम में केतु-शुक्र – परिपक्वता और मासूमियत एक साथ

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

वैदिक ज्योतिष में अष्टम भाव को मृत्यु भाव, छिद्र भाव, छुपे हुए रहस्यों, जातक के द्वारा या जातक पर किए गए षडयंत्रों का और अवैध संबंधों का भाव है। गुप्त प्रेम संबंध भी इसी भाव से देखे जाते हैं। यह भाव हमारी असुरक्षा के विषयों को दर्शाता है।

इस भाव के बली होने का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी ताकत के बल पर अपने गुप्त विषयों को छुपा कर रखता है। इस भाव को दोष भाव के नाम से भी जाना जाता है। यही वह भाव है जो हमें मृत्यु और हमारे अंत के विषय में बताता है।

यह भाव हमारी कमजोरियों की व्याख्या करता है। इस भाव के विषयों के सामने आने से एक ओर जहां मान-सम्मान खतरे में पड़ता है वहीं यह भाव असुरक्षा और डर की स्थिति भी बताता है। जिन व्यक्तियों को व्यर्थ का डर लगता है, उनका यह भाव कमजोर होता है।

असुरक्षा, जीवन के गहन रहस्यों से संबंधित आठवां घर है। इस भाव से मुर्दाघर, कब्रिस्तान, दिवालियापन, कोर्ट, आपदा क्षेत्र, कालकोठरी, अंधेरी जगह आदि का विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस भाव से विरासत भी देखी जाती है।

कमजोरियों और गंभीरता का भाव

यह भाव नुकसान और चीजों को गंभीरता से लेने और सावधान रहने की स्थिति को दर्शाता है। जीवन में छिपी, चौंकाने वाली, निंदनीय, भ्रामक और अप्रत्याशित घटनाएं आठवें घर के माध्यम से आती हैं। यह हमारी कमजोरी और हमारे गहरे डर से संबंधित है।

यह मुक्ति का दूसरा घर है और दिखाता है कि हम किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से स्वतंत्रता की तलाश करते हैं और सामान्य रूप से अन्य लोगों के प्रभाव से भी मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं।

अगर हम इस भाव से संबंधित मुद्दों का सामना करने की हिम्मत रखते हैं तो यह रचनात्मक का भाव है। इस भाव से संबंधित हमें शीघ्र रात देगी या इस दर्द से दोचार अधिक होना पड़ेगा। इस भाव से व्यक्ति की बड़ी गलतियां और सबसे गहरे रहस्यों को देखा जा सकता है।

मुश्किल के समय में हम स्वयं को कैसे संभालते हैं, यह दर्शाता है कि हम जीवन में कितने विकसित है, हम कितने परिपक्व है इस भाव के विश्लेषण से जाना जा सकता है। हमारे व्यक्तिगत दर्शन, ज्ञान और अंतर्दृष्टि की व्याख्या भी यही भाव करता है।

परिपक्वता का भाव

सही मायनों में यह भाव अन्य लोगों के साथ हमारी परिपक्वता का भंडार है। यह मृत्यु और अपनों को खोने पर हमारी परिपक्वता को दर्शाता है। यह रिश्तों में हमारी ईर्ष्या, द्वेष और भय की स्थिति बताता है, इन समस्याओं का हम किस प्रकार सामना करते है, कितनी परिपक्वता से स्वयं को संभालते है। यह दिखाता है कि हम कमजोरियों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।

उदाहरण के लिए – छल, झूठ और विश्वासघात, हत्या और हमारे मानस के कई गहरे हिस्सों में जन्में बीज आठवें घर के हैं। जिन व्यक्तियों में छल, झूठ, विश्वासघात, हत्या और कुविचार अधिक आते हैं ऐसे व्यक्ति का लग्नेश अष्ट्मेश के नक्षत्र में स्थित होता है। कुंड्ली में लग्नेश का नीच राशि का स्थित होना भी व्यक्ति में छुपे हुए दुर्गुणों की जानकारी देता है।

अष्टम भाव में शुक्र

अब बात करें हम शुक्र ग्रह की तो अष्टम भाव में शुक्र प्राय: समस्याग्रस्त होता है। विशेष रूप से, यौन संबंधों और इससे जुड़ी हमारी इच्छाओं को लेकर। इस भाव में शुक्र की स्थिति यह बताती है कि इन विषयों के फलस्वरुप आपको आने वाले जीवन में बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। अष्टम शुक्र की इच्छाएं हमें आम तौर पर गलतियों की ओर ले्कर जाती हैं और आठवें भाव के परिणाम उच्च और अक्सर दर्दनाक होते हैं।

इस भाव में शुक्र जिस भाव का स्वामी होता है उस भाव से जुड़े विषयों के फलों को भी बाधित करता है। अष्ट्म भाव का शुक्र हमें सिखाता है कि जिस भाव का स्वामी शुक्र है उस भाव के फलों को पाने के लिए या अनुकूल रुप में पाने के लिए संबंधित विषय से जुड़ी इच्छाओं का समय रहते प्रबंधन कर लेना चाहिए, अन्यथा जीवन में यह कष्ट देता है, कष्ट बढ़ने पर आरोप, सजा और दंड की स्थिति भी यह देता है। जैसे –

1. यदि शुक्र कुंड्ली में लग्नेश है और अष्टम भाव में स्थित है तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य सुख को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रबंधन करना होगा।

2. इसी प्रकार शुक्र यदि दूसरे भाव का स्वामी होकर अष्ट्म भाव में हैं तो संचित धन और कुटुंम्ब को लेकर नियोजन, प्लानिंग करनी उत्तम रहती है।

3. तीसरे भाव का स्वामी होकर शुक्र अष्टम भाव में हो तो जातक को यात्रा करते समय यात्राओं पर जाते समय, महिला मित्रों से बातचीत करते समय, महिला मित्रों से निकटता बढ़ाते समय अतिरिक्त सावधानी और प्रबंधन करना चाहिए।

4. चतुर्थ भाव का स्वामी शुक्र हों और अष्टम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को माता का सुख पाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं।

5. शुक्र पंचमेश होकर अष्ट्म भाव में स्थित हो तो व्यक्ति के अनेक गुप्त प्रेम संबंध होते है, रिश्तों को छुपाने के लिए व्यक्ति एक के बाद एक झूठ बोलता है। अपने अनैतिक रिश्तों को सामने आने से बचाने के लिए एक पाप के बाद दूसरा पाप करता चला जाता है।

ऐसे पुरुष जातक की महिलाओं से अतिरिक्त निकटता रहती हैं, और ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए नैतिकता के सारे नियमों को किनारे कर चलता है। प्रेम संबंधों में ऐसा व्यक्ति स्वार्थी और विश्वासघाती भी होता है।

ऐसे व्यक्ति एक के बाद एक अनेक स्नेह संबंध रखता है और सभी रिश्ते अंत में जाकर टूट जाते है। ऐसे व्यक्ति को खास तौर पर अपने प्रेम संबंधों की अतिरिक्त देखभाल अवश्य करनी चाहिए।

6. छ्ठे भाव का स्वामी शुक्र यदि अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति के रोग नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं, ऐसे व्यक्ति को अपने रोगों को नियंत्रित करने के लिए प्रबंधन करना चाहिए।

7. सप्तमेश शुक्र का अष्ट्म भाव में जाना वैवाहिक जीवन को कष्ट्मय तो बनाते ही है साथ ही यह वैवाहिक जीवन की असफलता का कारण भी बनता है।

8. अष्टमेश शुक्र अष्टम में हो तो व्यक्ति के जीवन में अप्रत्याशित घटनाएं सामान्य से अधिक होती है।

9. भाग्येश शुक्र अष्टम भाव में हो तो भाग्य की कमी, ऊपरी बाधा और पिता के स्वास्थ्य के लिए प्रबंधन करना अनिवार्य हो जाता है।

10. दशमेश शुक्र का अष्टम भाव में स्थित होना, कार्यक्षेत्र में अतिरिक्त सावधानी के साथ उतार चढ़ाव की स्थिति भी देता है।

11. एकादश भाव का शुक्र अष्ट्म भाव में होना, आय प्रबंधन और तनाव की स्थिति देता है।

12. द्वादशेश होकर शुक्र अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए कि कारावास की स्थिति बनें।

आईये अब केतु को जानें-

वैदिक ज्योतिष में केतु

केतु को सूक्ष्मता, गहन अध्ययन और छुपे हुए विषयों को सामने लाने वाला ग्रह कहा जाता है। केतु ग्रह के बारे में कहा जाता है कि यह जिस भाव में स्थित होता है उस भाव से संबंधित विषयों में बार-बार कष्ट देता है।

जिस भाव में यह स्थित होता है उस भाव के विषयों में आगे बढ़ने से रोकता है। केतु बताता है कि जीव की गति केतु बताता है। यह दुर्घटना और शल्य क्रिया दोनों का संकेत देता है। अध्ययन यह कहता है कि केतु परेशानी का कारण क्यों बनता है?

धर्म आध्यात्म यह कहता है कि जब व्यक्ति के पुण्य कर्म समाप्त हो जाते है तो व्यक्ति पुण्य कर्म अर्जित करने के लिए जीव के रुप में जन्म लेता है और इस उद्देश्य उस जीवन की इस लोक की यात्रा शुरु होती है। जैसे ही पुण्य कर्म एकत्रित हो जाते हैं, तो जीव मृत्यु लोक की ओर वापस पलायन कर जाता है।

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में केतु को मोक्ष का कारक माना गया है। जन्म कुंडली में केतु जिस भाव में स्थित होता है व्यक्ति को उस भाव से संबंधित विषयों में मोक्ष की प्राप्ति होती है। केतु जिस भाव में स्थित होता है उस भाव की कारक वस्तुओं में व्यक्ति को सदमार्ग पर लेकर जाता है।

केतु आध्यात्मिक विषयों को जानने की रुचि जागृत करता है। सांसारिक जीवन से मोह भंग करता है। इसके विपरीत शुक्र भोग-विलास का कारक ग्रह है। व्यक्ति को सांसारिक जीवन, भोग्य और वैवाहिक जीवन की रुचि देता है। इन दोनों ग्रहों का एक सात होना व्यक्ति के चरित्र को जद्दोजहद की स्थिति देता है।

ऐसा व्यक्ति सांसारिक सुखों की ओर कभी भागता है और कभी परमात्मा की ओर भागता है। ऐसे जातक की स्थिति दो नावों पर सवार होने जैसी हो जाती है। केतु का अष्टम भाव में होना व्यक्ति को जीवन के मध्य में बढ़ा बदलाव देता है कि – ऐसा बदलाव की जातक के जीवन की दिशा बिल्कुल बदल जाती है।

शुक्र और केतु की युति अष्टम में होने पर व्यक्ति प्रेम संबंधों में आध्यात्मिकता तलाशता है और बाद में भटक कर, भोग विलासी तो हो जाता है। परन्तु स्वयं को आध्यात्मिक दिखाता है। अर्थात ऐसे व्यक्ति के दो रुप होते हैं।

आंतरिक रुप में व्यक्ति भोग-विलासी और चरित्रहीन होता है परन्तु वह दुनिया के सामने स्वयं को आध्यात्मिक प्रवृत्ति का दिखाता है। एक समय में वह अपना एक ही रुप सामने लाता है, दूसरे रुप को छुपाए रखता है, इसे स्प्लिट पर्सनालिटी के रुप में समझा जा सकता है।

केतु के विषय में ज्योतिष शास्त्र यह भी कहते है कि किसी भी त्रिक भाव में होना जीव का इस लोक में आना, अपने किसी ॠण की पूर्ति करना है। इसमें छ्ठे भाव में केतु की स्थिति उच्च सफलता देने वाली, अष्ट्म भाव का केतु गूढ़ विषयों में गजब का ग्यान और व्याख्या करने की योग्यता देता है।

ऐसा व्यक्ति ज्ञान देने और सीख देने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता, मतलब ऐसे व्यक्ति का ज्ञान गूढ़ तो अवश्य होता है परन्तु वह स्वयं ऐसे ज्ञान का पालन कभी नहीं करता है। उसकी कथनी और करनी में जमीं आसमां का फर्क होता है।

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के प्रसिद्धि ग्रंथ के अनुसार – अष्टम भाव में केतु हो तो वह दुर्बुद्धि, तेजहीन, स्त्री द्वेषी एवं चालाक होता है। शुक्र केतु के साथ हो तो जातक दूसरों की स्त्रियों या पर पुरुष के प्रति आकर्षित होता है।

ऐसा व्यक्ति काव्य, संगीत,कविता और साहित्य लेखन में विद्वता रखता है। साहित्य अध्ययन में गहरी रुचि ऐसे व्यक्ति की होती है। इसके साथ ही जातक राजनैतिक विषयों की भी गहरी पकड़ होती है। केतु को शुक्र का साथ अष्टम भाव में मिलने से जातक को अनेक भाषाओं का ग्यान रहता है। कला और सौंदर्यवर्धक विषयों की गहराई से जानकारी रखते है।

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