कानून और कागजों में मिला रहा है निःशुल्क शिक्षा का लाभ : क्रिष्टोफर पॉल

कोरोना काल में उच्च न्यायालय बिलासपुर ने कहा था कि प्रायवेट विद्यालयों को सिर्फ ट्यूशन फीस लेने का अधिकार है

रायपुर। भारत का संविधान और शिक्षा का अधिकार कानून के अनुसार राज्य सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है, ऐसा लिखा हुआ है। आठ हजार प्रायवेट विद्यालयों में लगभग 10 लाख बच्चे स्वयं फीस देकर पढ़ रहे है और लगभग 3 लाख बच्चे निःशुल्क शिक्षा के अंतर्गत प्रवेशित है जिनकी प्रतिपूर्ति की राशि सरकार द्वारा प्रायवेट विद्यालयों को दिया जाता है। इन 10 लाख बच्चों का कोरोना काल का तीन माह का फीस भी सरकार नहीं दे पाई, लेकिन जब प्रायवेट विद्यालयों ने पालकों से पूरा फीस वसूल लिया तब सरकार ने साल के अंत में दे दिया जनरल प्रमोशन तो अब प्रायवेट विद्यालयों ने पूरा फीस जमा नहीं करने वाले 2 लाख बच्चों का टीसी और रिजल्ट रोक देने का फरमान जारी कर दिया गया है।

कोरोना काल में उच्च न्यायालय बिलासपुर ने कहा था कि प्रायवेट विद्यालयों को सिर्फ ट्यूशन फीस लेने का अधिकार है, वह भी किश्तों में लिया जाना है, लेकिन ट्यूशन फीस का परिभाषा नहीं होने के कारण पालक दुविधा में है और आम जनता के बीच भ्रांतिया है, क्योंकि प्रायवेट विद्यालयों के द्वारा सभी मदो को समायोजित कर उसे ट्यूशन फीस का नाम देकर वसूला जा रहा है जिसको लेकर छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसियेशन ने मुख्यमंत्री से ट्यूशन फीस को परिभाषित की मांग किया गया था, जिस पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने स्कूल शिक्षा विभाग को ट्यूशन फीस को परिभाषित करने का निर्देश दिया, लेकिन स्कूल शिक्षा विभाग ने लोक शिक्षण संचालनालय को पत्र लिखकर ट्यूशन फीस को परिभाषित करने का निर्देश दे दिया और 27 अक्टूबर 2020 से मामला डीपीआई स्तर पर लंबित है, जिससे प्रायवेट विद्यालयों को ट्यूशन फीस के नाम पर पूरा फीस वसूलने का अवसर मिल गया।

कोई बच्चा जो भारत का नागरिक है, अमीर या गरीब, लड़का या लड़की, किसी भी जाति का हो, उसे निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा पाने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन प्रायवेट विद्यालयों का फरमान और सरकार की मौन स्वीकृति पालकों की समझ से परे है। राज्य सरकार और प्रायवेट विद्यालयों की साजिश का शिकार होते पालकों को अब यह समझ नहीं आ रहा है कि उनके बच्चों के जीवन व भविष्य का क्या होगा।

छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसियेशन प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल का कहना है कि पालकों को डरने की जरूरत नहीं है, जल्द इस मामले को लेकर हम उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगें, किसी भी बच्चे के जीवन व भविष्य के साथ खिलवाड़ होने नहीं दिया जाएगा।

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