लक्ष्मी जी खींची चली आएंगी- पूजा करें धन यंत्रों की

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव:

दीपावली पर्व के स्वागत में बाजार सज गए है। चारों और त्योहारों की धूम है। जोरशोर से तैयारियां चल रही है कि लक्ष्मी जी को कैसे प्रसन्न किया जाए ? लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए व्यक्ति हर संभव प्रयास करता है।

व्रत, पूजन, दर्शन और साधना भी करता है। हमारे वैदिक शास्त्रों में कहा गया है की देवी लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर उन्हें स्थिर रूप में अपने घर या व्यावसायिक स्थल में वास करने के लिए आमंत्रित करने के लिए आवश्यक है की उनका पूजन यन्त्र रूप में किया जाए।

सदैव के लिए लक्ष्मी जी का वास आपके यहां हो इसके लिए आज हम आपको कुछ यंत्रों की जानकारी देने जा रहे है, जिनका दर्शन, पूजन नित्य करने से श्री प्रसन्न होकर अपनी कृपा बनाए रखती है। आशा है पर्वों के इस अवसर पर यह जानकारी आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी-

आगे बढ़ने से पूर्व सबसे पहले आईए जान लेते हैं कि यंत्र क्या होते हैं और इनमें किस प्रकार शक्ति निहित होती हैं।

यंत्र क्या होते हैं ?

यंत्र के सहारे अनेक लोगों ने दुर्लभ कार्य को सम्पन्न किया है व ऐश्वर्य पाया है। साधारण सी दिखने वाली वस्तु अपने आप में एक असीमित शक्ति को समाहित किए रहती है जिसे साधारण व्यक्ति समझने में आज असफल है। उठो, जागो और इसी क्षण अपने श्रेष्ठ जीवन निर्माण का संकल्प करो, यंत्रों को उपयोग में लाओ अन्यथा बाकी का जीवन भी बीते हुये जीवन की तरह चला जायेगा।

यंत्र का उपयोग जन्म से मरण तक प्रत्येक क्षण आवश्यक है, गर्भवती महिला के लिए प्रसव से सम्बन्धित परेशानियों से बचने के लिए। नवजात शिशु के लिए ऊपरी बाधाओं से बचना। बालकों के
लिए प्रखर बुद्धि एवं विद्या पाने के लिए तथा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए।

युवा पीढ़ियों के लिए कार्यालय, व्यापार, समाज आदि में उन्नति हेतु तथा धन ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए, बड़े व्यापारियों के लिए व्यापार वृद्धि एवं लक्ष्मी प्राप्ति के लिए। अज्ञात् शत्रुओं से बचने के लिए, भयंकर बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए, मस्तिष्क को शान्ति पाने के लिए।

महिलाओं के लिए स्वरूप एवं शारीरिक रक्षा हेतु यंत्र ही एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा किसी भी धर्म सम्प्रदाय एवं अवस्था के व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता पाने के लिए उससे सम्बन्धित यंत्रों को उपयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। साधना के मार्ग में सर्वप्रथम यंत्रों की ही उपासना होती है। कुछ लोगों के मन में संशय भी है कि इस मार्ग में सफलतायें कम प्राप्त होती हैं।

यंत्र राज श्रीयंत्र

सनातन धर्म संस्कृति में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु विभिन्न यंत्रों की साधना का विधान है। इन यंत्रों का उपयोग ध्यान केंद्रित करने के लिए किया जाता है। ये यंत्र एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इनमें श्रीयंत्र सर्वाधिक शक्तिशाली है और इसे यंत्रराज की संज्ञा दी गई है। श्रीयंत्र में सभी देवी देवताओं का वास होता है। इसे विचारशक्ति, एकाग्रता तथा ध्यान को बढ़ाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है।

श्रीयंत्र का प्रयोग ध्यान में एकाग्रता के लिए किया जाता रहा है। आधुनिक वास्तुशास्त्रियों ने माना है कि इस यंत्र के गणितसूत्र के आधार पर बनाए गए मंदिर, आवास या नगर में अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा ऐसे स्थान में रहने वाले लोगों में विचारशक्ति, ध्यान, शांति, सहानुभूति, सौहार्द व प्रेम के गुणों का उद्भव होता है।

श्रीयंत्र आद्याभगवती श्रीललितमहात्रिपुर सुंदरी का आवास है। इसकी रचना तथा आकार के बारे में आदिगुरु शंकराचार्य की दुर्लभकृति सौंदर्यलहरी में बड़े रहस्यमय ढंग से चर्चा की गई है। महालक्ष्मी
को सभी देवियों में श्रेष्ठ माना जाता है और श्रीललितामहात्रिपुर सुंदरी भगवती महालक्ष्मी का श्रेष्ठतम रूप है।

श्रीयंत्र ॐ शब्द ब्रह्म की ध्वनितरंगों का साकार चित्र है। ऐसा कहा जाता है कि जब ॐ का उच्चारण किया जाता है तो आकाश में अदृश्य ध्वनि तरंगें श्रीयंत्र की आकृति लेती हैं। भारत का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक पूजनीय यंत्र श्रीयंत्र ही है। यह समूचे ब्रह्मांड का प्रतीक है जिसे श्रीचक्र भी कहा जाता है।

जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह के पीड़ित होने पर श्रीयंत्र की पूजा का विधान शास्त्रों में वर्णित है। श्रीयंत्र शब्द की उत्पत्ति श्री और यंत्र के मेल से हुई है। श्री शब्द का अर्थ है लक्ष्मी अर्थात संपत्तिा। इसलिए इसे संपत्ति प्राप्त करने का यंत्र भी कह सकते हैं।

इनके महत्व के बारे में कहा गया है:

यत्रास्ति भोगो नहि तत्र मोक्षो। यत्रास्तिमोक्षो नहि तत्राभोगः।।
श्री संदुरी सेवन तत्पराणाम्। भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव।।

जहां भोग है वहां मोक्ष नहीं है। जहां मोक्ष है वहां भोग नहीं है। परंतु भगवती त्रिपुरसुंदरी की आराधना करने वाले भक्तों के लिए भोग और मोक्ष दोनों एक साथ सुलभ होते हैं जबकि ये दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। तंत्र शास्त्र में भगवती त्रिपुरसुंदरी का महत्व सर्वोपरि है। कहा गया है:
न गुरोः सदृशो दाता न देवः शंकरोपमः।
न कोलात् परमो योगी न विद्या त्रिपुरापरा।।

श्रीयंत्र की स्थापना विधि

शुद्धता एवं विश्वासपूर्वक शुक्रवार, सोमवार अथवा गुरुवार को सुबह उठकर, गंगा जल युक्त जल से स्नानादि करके, ललाट पर लाल चंदन अथवा रोली का चंदन लगा कर, यथाशक्ति लक्ष्मी का कोई भी मंत्र जप करते हुए, श्री यंत्र को केसर युक्त कच्चे दूध में धो कर पूजन स्थल, व्यवसाय स्थल, घर, अथवा कहीं भी, शुद्ध स्थान पर लाल रेशमी कपड़े पर स्थापित करना चाहिए।

दीपावली, दशहरा, शिवरात्रि, नवरात्रि, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण आदि पर्वो पर श्री यंत्र की विशेष पूजा में लक्ष्मी के प्रिय मंत्रों का जप व श्रीसूक्त , लक्ष्मीसूक्त व कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

श्री यंत्र के सम्मुख प्रतिदिन सामान्य रूप से धूप, अगरबत्ती तथा घी का दीपक जलाने से लक्ष्मी की सामान्य पूजा हो जाती है। श्री यंत्र के चोरी होने, टूट जाने पर पुनः स्थापित किया जाता है। बुध ग्रह को बली करने के लिए पारद श्री यंत्र शीघ्र ही शुभ फल प्रदान करता है तथा जातक की बौद्धिक क्षमता में वृद्धि लाता है। लक्ष्मी दोष, दरिद्रता निवारण, धन लाभ, धन रक्षा आदि कार्यों में लाभ पाने के लिए पारद श्री यंत्र का पूजन करें।

सम्पूर्ण श्रीयंत्र

इस यंत्र में 13 यंत्रों का समावेश है। ये सभी यंत्र हर तरह से साधक की मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सहायता करते हैं। जमीन-जायदाद की प्राप्ति, धन और सफलता के लिए सम्पूर्ण श्रीयंत्र
अति लाभकारी है। इसकी आराधना से जातक के जीवन की समस्त बाधाओं, तनाव और चिंताओं का नाश हो जाता है। जातक को प्रसिद्धि, शक्ति, अधिकार, धन, व्यावसायिक सफलता, सुख और
शांति की प्राप्ति होती है। व्यापार में उन्नति एवं आमदनी में लाभ देता है। सम्पूर्ण श्री यंत्र को उत्तर, पूर्व, अथवा उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करना चाहिए।

स्फटिक श्रीयंत्र

स्फटिक एक सामान्य प्राप्ति वाला रंगहीन तथा प्रायः पारदर्शक मिलने वाला अल्पमोली पत्थर है। यह पत्थर देखने में कांच जैसा प्रतीत होता है। सिलिका आक्साइड का एक रूप यह स्फटिक पत्थर
स्वयं में विशेष आब तथा चमकयुक्त नहीं होता, लेकिन विशेष काट में काटने तथा पालिश करने पर इसमें चमक पैदा की जा सकती है। स्फटिक पत्थर से बनी विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां
एवं यंत्र बनाये जाते हैं।

जिस प्रकार से नवग्रह होते हैं। ठीक उसी प्रकार से नौग्रहों की नौ प्रकार की लक्ष्मी होती हैं।

1 आद्या लक्ष्मी 2 धान्य लक्ष्मी 3 धैर्य लक्ष्मी 4 गजलक्ष्मी 5 सन्तान लक्ष्मी
6 विजय लक्ष्मी 7 विद्या लक्ष्मी 8 धन लक्ष्मी 9 धान्य लक्ष्मी

अनन्त ऐश्वर्य व लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्रीविद्या व श्रीयंत्र की साधना का महत्त्व सर्वाधिक है। श्रीविद्या ही ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी और षोडशी इत्यादि नामों से विख्यात
है। श्रीविद्या की साधना हेतु उसके आधारभूत ‘श्रीयंत्र’ को समझना प्रथमतः अनिवार्य है। इस ‘श्री यंत्र’ के सम्मुख आर्तभाव से श्रद्धापूर्वक ’श्रीसूक्त’ पढ़ने पर बहुतों को धन सम्पत्ति की प्राप्ति हुई है।

अनेक धर्मशास्त्रों में यह प्रमाण पाया गया है कि स्फटिक श्री यंत्र, दक्षिणावर्ती शंख, गोमती चक्र एवं तुलसी पत्र जिस घर में यह पांचों वस्तुयें एक साथ प्रतिष्ठित की जाती हैं और प्रतिदिन इनकी पूजाएवं दर्शन किया जाता है। वहां धन और ऐश्वर्य की कभी भी कमी नहीं होती है। स्फटिक के श्रीयंत्र को समस्त प्रकार के श्रीयंत्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। स्फटिक में निर्मित श्रीयंत्रमय शिवलिंग की
महिमा तो अवर्णनीय है। स्फटिक के श्रीयंत्र की पूजा जीवन पर्यंत की जा सकती है।

पारद श्रीयंत्र

यह पूजा स्थल अथवा किसी भी स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। श्री यंत्र को स्थापित करने से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। इस यंत्र के प्रभाव से जीवन के अनेक अभाव दूर होते हैं। यदि
नौकरी में अधिकारियों से मतभेद, मनमुटाव तथा तरक्की में विलंब हो तो ये बाधाएं दूर होती हैं।

संगसितारा श्रीयंत्र

यह यंत्र सौदर्य, ज्ञान और धन को प्राप्त करने के लिए अत्यंत लाभकारी है। किसी कुंडली में शुक्र के बुरे प्रभाव से ग्रस्त जातक के लिए इस यंत्र के उपयोग से बुरे प्रभाव को कम किया जा सकता
है। वास्तु सुधार उपकरण के रूप में यह पिरामिड काम करते हैं।

अष्टधातु में श्रीयंत्र

समुद्रमन्थन द्वारा चैदह रत्नों के साथ लक्ष्मी का भी आविर्भाव हुआ। लक्ष्मी के बिना संसार का कोई भी कार्य नहीं चल सकता। इस यंत्र की उपासना करने से भक्ष्य, भोज्य, चोप्य, लेह्य चारों प्रकार के पदार्थ प्राप्त होते हैं। कुबेर के धन को प्रदान करने का सामथ्र्य इन्हीं लक्ष्मी में है। अष्टधातु के श्रीयंत्र की उपासना भी श्रेयष्कर मानी गई है।

सुमेरू पिरामिड श्रीयंत्र

यह वास्तु सुधार हेतु उपयोगी यंत्र है। इसकी साधना धन संपत्ती प्राप्त करने हेतु, रुपये की प्राप्ति, लोन की प्राप्ति, जुआ में सफलता आदि में शुभ फलदायी होता है। यह गरीबी को दूर
करता है। इसे फैक्ट्री, कार्यालय, घर आदि में इस्तेमाल कर सकते हैं।

कच्छप श्रीयंत्र

यह कछुए की आकृति के आधार पर बना श्रीयंत्र है। इसका निर्माण धातु या स्फटिक से होता है। इसे अपने घर में, शयन कक्ष में, पुलिस स्टेशन, कार्यालय या मंदिर में रख सकते हैं। ध्यान रहें कि कछुए का मुख सामने होना चाहिए। यह यंत्र शारीरिक शक्ति का विकास, धैर्यता, धन, आराम को प्रदान करता है तथा झगड़ा-झंझट व गलती से निजात दिलाती है। इसकी साधना सभी शुभ फलों में स्थिरता प्रदान करती है तथा यह दीर्घायु प्रदान करता है।

पिरामिड श्रीयंत्र

वास्तु शास्त्र में पिरामिड और श्रीयंत्र को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। क्योंकि श्रीयंत्र का वास्तु के साथ संबंध है। वास्तु शास्त्र श्रीयंत्र पर आधारित है। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत के कई शहरों में पूर्वकाल में भवन का निर्माण कर श्रीयंत्र अवश्य स्थापित किया जाता था तथा बहुत से भवन और नगर श्रीयंत्र के ज्यामितीय रेखा गणित को आधार बनाकर बनाए जाते थे।

किसी भवन निर्माण में श्रीयंत्र वास्तु दोष दूर करने का संपूर्ण यंत्र है। यह यंत्र व्यक्ति को किसी भी क्षेत्र में ज्ञान, बुद्धि और सीखने की क्षमता प्रदान करती है। इसके उपयोग करने का सबसे अच्छा तरीका है उसे टेबल के सामने रखें। यह एकाग्रता और मानसिक शक्ति को बढ़ाता है। यह बुध, राहु और केतु को संतुष्ट करने के लिए और धन-संपत्ति के लिए लाभदायक है।

महालक्ष्मी यंत्र

इस यंत्र को निरंतर धन वृद्धि के लिए उपयोगी माना गया है। महालक्ष्मी यंत्र अत्यन्त दुर्लभ एवं लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण प्रयोग है तथा अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध तथा ऐश्वर्य प्रदान
करने में सर्वथा समर्थ है। यह स्वर्ण वर्षा करने वाला यंत्र कहा गया है।

निरन्तर धनवृद्धि के लिए इस के सामने ‘कनकधारा स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। महालक्ष्मी यंत्र व्यापार वृद्धि, दारिद्र्य नाश व ऐश्वर्य प्रदान करता है। दीपावली के शुभ अवसर पर सिंह लग्न में इस यंत्र को सम्मुख रखकर धूप, दीप आदि द्वारा पूजन करने के पश्चात श्री सूक्त और कनक धारा स्तोत्र के सोलह पाठ करने से माता लक्ष्मी वर्ष पर्यंत भक्तगणों को अनुगृहीत करती हैं।

मधुर बोलने वाले, कर्तव्यनिष्ठ, ईष्वर भक्त, कृतज्ञ, इन्द्रियों को वष में रखने वाले, उदार, सदाचारी, धर्मज्ञ, माता-पिता की भक्ति भावना से सेवा करने वाले, पुण्यात्मा, क्षमाषील, दानषील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले मनुष्यों के घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है।

1 ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
2 ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
3 ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।।

कमला यंत्र

महाविद्या की क्रम परंपरा में माता कमला का स्थान दसवां है। इनका आसन कमल है। इनकी कांति सोने के समान है। श्वेत वर्ण के चार गज अपनी शुंडाओं में जल भरे कलश लेकर इन्हें स्नान कराते हैं। चार भुजाओं वाली इस देवी के एक हाथ में वर, एक में अभय व एक में कमल है।

शक्ति के इस विशिष्ट रूप की साधना से जीवन सुखमय होता है और दरिद्रता दूर होती है। यह दुर्गा का सर्व सौभाग्य रूप भी है। जहां कमला हैं वहां विष्णु हैं, जिस साधक के घर ये दोनों हों उसका गृहस्थ जीवन सुखमय होता है। समृद्धि की प्रतीक, स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति, नारी, पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है।

यह समृद्धि, शुद्धता, पवित्रता की प्रतीक है और दरिद्रता, तनाव, कर्ज व रोग का उन्मूलन करती है। कमला यंत्र को महालक्ष्मी व कनक धारा यंत्र से भी अधिक शक्तिशाली माना गया है। इस यंत्र की उपासना से शुक्र ग्रह को बल मिलता है। इस यंत्र की सिद्धि के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप किया जाना चाहिए।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह्सौः जगत्प्रसूत्यै नमः।

कनकधारा यंत्र

कनकधारा यंत्र की उपासना से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती है। यह यंत्र अत्यंत दुर्लभ परंतु लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण और अपने आप में अचूक, स्वयंसिद्ध तथा ऐष्वर्य प्रदान करने में समर्थ है। इस यंत्र की उपासना से रंक भी धनवान हो जाता है परंतु इसकी प्राण प्रतिष्ठा की विधि जटिल है।

इस यंत्र का उपयोग घर, दूकान, फैक्ट्री, धन्धे व व्यवसाय स्थल पर कर सकते हैं। दीपावली, होली या शुक्लपक्ष की द्वितीया, नवमी, सप्तमी, दशमी, पूर्णिमा, सोम, बुध, शुक्रवार रोहिणी, पुर्नवसु, हस्त, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफल्गुनी नक्षत्र प्राण-प्रतिष्ठा हेतु उत्तम हैं।

इस यंत्र के भीतर के त्रिकोण क्रमशः दारिद्रî विनाशक, श्रेष्ठ लक्ष्मी एवं ऐश्वर्य के प्रतीक हैं त्रिकोण का मध्य विन्दु मां भगवती (भुवेनेश्वरी) का सूचक है जो अनिष्ट निवारक, प्रसन्नता एवं ऐश्वर्यदायक है। इस यंत्र की सिद्धि के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप किया जाना चाहिए।
ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कनकधारायै नमः।

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