महाराष्ट्र: महिला किसानों ने गांव को बनाया ‘नो सूइसाइड जोन’

महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या न करें, इसके लिए यहां एक गांव की महिलाएं प्रेरणास्रोत बन गई हैं।

महिला किसानों ने खेती का ऐसा तरीका खोजा है जिससे कम पानी में वह फसल उगा रही हैं। इतना ही नहीं उन्होंने बैंक का कर्ज चुकता करते हुए कारोबार का टर्नओवर 1 करोड़ रुपये कर लिया है।

यह कहानी है उस्मानाबाद जिले के हिंगलाज्वाडी गांव की। यहां महिला किसानों के समूह ने गांव की दशा बदल कर नई दिशा दिखाई है।

इस गांव के पुरुष घर और बच्चे संभालते हुए दिखते हैं तो महिलाएं खेत में काम करने जाती हैं। ये महिलाएं बैंक में किस्त जमा करने भी जाती हैं।

3000 आबादी वाले इस गांव में सब कुछ अलग सा दिखता है। पुरुष घर संभालने का काम आराम से करते दिखते हैं तो महिलाएं पुरुषों की तरह खेत में काम करते हुए दिख जाती हैं।

फसल के रेट तय करने खुद जाती बाजार
गांव में महिला किसानों का समूह फसल के भाव को तय करने खुद ही बाजार जाकर सप्लायर से बात करती हैं। महिला किसानों के समूह की लीडर कोमलवती हैं। उनके पति के अच्युत काटकटे ने बड़े गर्व से कहा कि मेरी पत्नी समूह की नेता है। मैं उसको फॉलो कर रहा हूं। उसने मेरी जिंदगी बदल दी है और आज एक बेहतर किसान की भूमिका में है। गांव की महिलाओं ने आर्थिक तंगी से परेशान पुरुषों को राह दिखाई है। इतना ही नहीं कम संसाधनों में खेती कैसे की जाए, इसका तरीका भी खोजा है।

इसलिए महिलाओं ने संभाली कमान
गांव के विष्णु कुमार ने बताया कि पानी की कमी और बैंक लोन की किस्त न जमा कर पाने की वजह से किसान खुदकुशी कर रहे थे। इसे रोकने के लिए गांव की महिलाओं ने मोर्चा संभाला। गांव की महिलाओं की सूझबूझ के कारण गांव के किसी किसान ने बैंक का कर्ज चुकता न करने की परेशानी से खुदकुशी नहीं की। हमारे गांव में खुशियां लौट आई हैं।

हमने जमीन का छोटा हिस्सा खेती के लिए मांगा
महिला किसान रेखा शिंडे ने बताया, ‘बारिश न होने से पानी की कमी और बैंक कर्ज न चुका पाने की वजह से जिले में किसान सुइसाइड कर रहे थे। यह सब बढ़ता जा रहा था। फिर हम गांव की महिलाओं ने सोचा क्यों न हम खुद खेती करके देखें। तब हमने खेती के लिए एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा मांगा जिससे हम वहां खेती करें। मगर पहले तो हमें मना किया गया कि यह पुरुषों का काम है मगर बाद में फिर हमें खेती के लिए जमीन मिल गया। इसके बाद हमने कम पानी में खेती शुरू की। फसल अच्छी हुई और हमने बैंक के पैसे अदा करना शुरू कर दिया। इसके बाद तो घर, परिवार और बच्चों का पालन-पोषण आराम से होने लगा। हमारा आत्मविश्वास बढ़ गया और हम सभी महिलाओं का समूह अब गांव में सब्जियां उगातीं हैं।’

नहीं हारी हिम्मत
मंजूश्री ने बताया कि सब्जियां उगाने और बेचने के बाद हालत सुधरी तो महिलाओं ने उस्मानाबाद जाकर सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी हासिल की। मगर सरकारी कार्यालय में कोई महिलाओं को बाबू ने किसी भी तरह से खेती और किसानी से संबंधित स्कीम के बारे में बताने में असमर्थता जताई। हमने हिम्मत नहीं हारी और हम लगातार सरकारी योजनाओं की जानकारियां जुटाने में जुट गए। आज हमारे गांव में 200 स्वयं सहायता समूह है जिसमें 265 महिलाएं सदस्य हैं। इन महिला किसानों के समूह का टर्नओवर 1 करोड़ पहुंच गया है।

मिला सम्मान
गांव में खेती करने के बाद आर्थिक स्थिति को मजबूत करेन के लिए स्वयं सहायता समूह की मदद से ब्यूटी पार्लर, पोलट्री फॉर्म, बकरी पालन और दुग्ध व्यवसाय भी शुरू किया गया। इससे गांव में अच्छी आमदनी हुई। गांव की महिलाओं को मिली इस उपलब्धि को देखते हुए साल 2017 का सीआईआई द्वारा दिया जाने वाला फाउंडेशन महिला प्रत्याशी सम्मान गांव मिला। इतना ही नहीं नीति आयोग अवॉर्ड भी मिला।

यह है नियम
रेखा शिंडे ने बताया कि महिलाओं ने एक नियम बनाया है कि गांव का कोई भी व्यक्ति अगर कुछ खरीददारी कर रहा है तो वह गांव की दुकानों से ही खरीदे। इससे गांव का पैसा गांव में ही रहता है बाहर नहीं जाता।

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