छत्तीसगढ़

महासमुंद : विख्यात चंडी मंदिर में पर्यटकों को नहीं दिखेगें भालू

मंदिर में भालू को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु जुट जाते हैं। श्रद्धालु अपने हाथ से भालुओं को प्रसाद खिलाते नजर आते हैं।

ओडिशा बॉर्डर पर स्थित विख्यात चंडी मंदिर में अब पर्यटकों को भालू दिखाई नहीं देंगे। पर्यटक अब भालुओं को अपने हाथों से प्रसाद नहीं खिला पाएंगे, क्योंकि वन मुख्यालय ने महासमुंद वन मंडल को पत्र जारी कर भालुओं की आमद पर रोक लगाने के निर्देश दिए है।

इसकी वजह है कि भालू काफी आक्रामक होते हैं। भविष्य में किसी प्रकार की अनहोनी न हो, इसे ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने यह निर्णय लिया है।

अधिकारियों का कहना है कि दुर्घटना घट सकती है, इसलिए भालुओं के पास पर्यटकों को रोकने की कवायद शुरू कर दी गई है।

गौरतलब है कि महासमुंद जिला मुख्यालय से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ की वादियों में स्थित बागबाहरा से घुंचपाली चंडी मंदिर तक पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर के सफर में दूर से ही चंडी माता के दर्शन होने लगते हैं।

मंदिर में शाम को मंदिर में पहुंचने वाले सैलानियों का चार जंगली भालू माता के दरबार में खूब मनोरंजन करते नजर आते हैं।

मंदिर में भालू को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु जुट जाते हैं। श्रद्धालु अपने हाथ से भालुओं को प्रसाद खिलाते नजर आते हैं।

वहां के रहवासियों का कहना है कि पिछले आठ साल से भालू निरंतर मंदिर में आते हैं, लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते।

जानकार बताते हैं कि मंदिर में मादा भालू अपने तीन शावकों के साथ नारियल, गुड़, चना और मूंगफली खाने के लिए आती है।

मुंगई माता मंदिर में भी आते हैं भालू

नेशनल हाइवे 53 के किनारे पटेवा और झलप के बीच मुंगई माता पहाड़ी के नीचे भी कभी-कभी भालुओं का आना होता है।

नेशनल हाइवे के पास होने की वजह से भारी संख्या में यहां भालू को देखने के लिए पर्यटक पहुंचते हैं। इसके साथ ही भीम खोज स्थित खल्लारी मंदिर में भी भालुओं का आना-जाना है।

जाली लगाकर रोकेंगे भालुओं को

वन विभाग के अधिकारी ने बताया कि मंदिर में भालुओं को आने से रोकने के लिए ऊंची जाली लगाने का काम किया जाएगा।

जाली लग जाने से भालू फांदकर भी मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। इसके साथ ही यह भी ध्यान दिया जाएगा कि पर्यटक भी भालुओं को किसी प्रकार का खाद्य पदार्थ न दे सकें।

पत्र देने के बाद शुरू हुई कवायद

वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने बताया कि भालू एक आक्रामक वन्यप्राणी है। भालुओं में प्रतिशोध की क्षमता अधिक होती है।

भालुओं के आक्रोशित होने पर जान का खतरा बना रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वाइल्ड लाइफ पीसीसीएफ को पत्र लिखा था।

पत्र को आधार बनाकर वन विभाग ने मंदिर में भालू के प्रवेश पर रोक लगाने की कवायद शुरू की है।

महासमुंद जिले के तीन मंदिरों में भालुओं का आना-जाना है, लेकिन प्रतिदिन चंडी मंदिर में ही मादा भालू अपने शावकों के साथ प्रसाद खाने के लिए आती है।
पर्यटकों की सुरक्षा के लिए मंदिर में जाली लगाई जा रही है, जिससे भविष्य में किसी प्रकार की दिक्कत न होने पाए।

 

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