राष्ट्रीय

पटरी से उतरा मेक इन इंडिया? 3.5 लाख करोड़ के रक्षा प्रॉजेक्ट्स अटके

नई दिल्ली: जिस ‘मेक इन इंडिया’ कैंपेन को केंद्र सरकार ने जोर-शोर से शुरू किया था, उसके तहत देश की रक्षा के लिए तैयार किए जाने वाले हथियार और जरूरी सामानों का उत्पादन ही नहीं हो पा रहा है।

इसके पीछे कई वजहें हैं, जिनमें लालफीताशाही, लंबी प्रक्रियाएं, कमर्शल और तकनीकी दिक्कतों के अलावा राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी मुख्य वजहें हैं। नतीजा यह हुआ है कि पिछले 3 सालों में अभी तक कोई भी बड़ा रक्षा प्रॉजेक्ट पूरा नहीं हो पाया है।

इन आधा दर्जन बड़े प्रॉजेक्ट की अनुमानित लागत 3.5 लाख करोड़ रुपए है। इन प्रॉजेक्ट्स में फ्यूचर इन्फैंट्री कॉम्बैट वीइकल्स (FICV), लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर्स, नेवल मल्टी-रोल चॉपर्स, जनरल स्टेल्थ सबमरीन, फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट, माइन काउंटर-मेज़र वेसेल्स (MCMV) शामिल हैं।

इतना ही नहीं तेजस की सफलता के बाद 114 सिंगल इंजल फाइटर्स के लिए भी रिक्वेस्ट फॉर इनफर्मेशन (RFI) जल्द ही जारी होने वाला है।

उधर स्वीडन के Gripen-E और अमेरिका के F-16 जेट में से भारत जिसे भी कॉन्ट्रैक्ट देगा, उसकी कीमत लगभग 1 लाख करोड़ होगी। ऐसे में तय है कि फंड की कमी के चलते इन प्रॉजेक्ट्स में और लेटलतीफी होगी।

हालांकि रक्षा मंत्रालय से जुड़े अफसरों ने बताया कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन हर दूसरे हफ्ते रक्षा प्रॉजेक्ट्स से जुड़ी मीटिंग्स कर रही हैं जिससे जल्द से जल्द इन प्रशासनिक अड़चनों को दूर किया जा सके।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘यह बड़े और जटिल प्रॉजेक्ट्स हैं, खासतौर पर उस देश के लिए जो विशेष गोला बारूद नहीं बना सकता। इनमें थोड़ा समय लगेगा।’ भारत रक्षा उत्पादों के मामले में दूसरे देशों पर से अपनी आत्मनिर्भरता कम करने के मामले में अभी बहुत पीछे है।

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