मंगल सिर्फ तोड़ फोड़ ही नहीं करता – यह मांगलिक कार्य भी कराता है 

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715, 9811598848

जन्म कुंडली में यदि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल स्थित है तब इसे मांगलिक योग की कुंडली माना जाता है लेकिन दक्षिण भारत में इन भावों के साथ दूसरे भाव के मंगल को भी मांगलिक योग में शामिल किया गया है। अब कुंडली के 12 में छ्: भावों में मंगल की स्थिति से मांगलिक योग बनता है तो आधी से ज्यादा लोगों की कुंडली मांगलिक योग की बन जाएगी।

इस पर भी कुछ महान विद्वान चंद्रमा से भी मंगल योग देख लेते हैं अर्थात चंद्रमा से पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में मंगल है तो व्यक्ति चंद्र मंगली हो गया। इसके अलावा शुक्र मंगलिक का भी कुछ विचार कर लेते हैं अर्थात उपरोक्त भावों में शुक्र से मंगल की स्थिति शुक्र मंगलिक कहलाती है। इस प्रकार लग्न से, चंद्र से तथा शुक्र से भी कई स्थानों पर मंगल योग का शुभाशुभ विचार किया जाता है।

अगर कोई व्यक्ति लग्न के साथ चंद्र कुंडली से भी मांगलिक है तो वह अधिक मांगलिक कहलाता है, अगर शुक्र कुंडली से भी मांगलिक है तो अत्यधिक मांगलिक कहलाएगा। शुक्र सातवें भाव का कारक ग्रह है इसलिए उसे से भी मांगलिक योग देखा जाता है। चंद्र तथा शुक्र को ज्यादा महत्व देने की बजाय केवल लग्न से बनने वाले मांगलिक योग को देखना चाहिए।

 माँगलिक योग कुंडली का मिलान 

यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल है तो जिस दूसरे साथी से उसका विवाह तय होना है तब उसका मंगल भी वहीं स्थित होना चाहिए जहाँ पहले वाले जातक का है। माना कि लड़के की कुंडली में बारहवें भाव में मंगल स्थित है तो लड़की की कुंडली में भी बारहवें भाव में ही मंगल स्थित होना चाहिए तभी ये उचित मिलान कहा जाएगा अन्यथा नहीं।

अधिकाँशत: ज्योतिषी ऎसा नहीं करते है, वे केवल ये देखते हैं कि दोनों मांगलिक है या नहीं और विवाह के लिए हामी भर देते हैं। ऎसे में वर तथा वधू का ऊर्जा स्तर समान नहीं रह पाएगा। यदि कोई व्यक्ति मांगलिक है और उसकी कुंडली में जिस भाव में मंगल स्थित है ठीक उसी भाव में उसके साथी की कुंडली में कोई पाप ग्रह जैसे राहु, शनि, केतु अथवा सूर्य स्थित है तब भी विवाह किया जा सकता है क्योंकि पाप ग्रह से मंगल की ऊर्जा कम हो जाती है।

सूर्य को पाप ग्रह नहीं कहा जाता लेकिन इसे उग्र ग्रह की श्रेणी में रखा जाता है। इस योग को उदाहरण से समझेगें – माना लड़की की कुंडली में सातवें भाव में मंगल स्थित है और लड़के की कुंडली के उसी सातवें भाव में कोई पाप ग्रह(शनि, राहु, केतु अथवा उग्र ग्रह सूर्य) स्थित है तब विवाह किया जा सकता है।

मांगलिक योग का प्रभाव 

  • सातवाँ भाव जीवन साथी तथा गृहस्थी के सुख का है। यदि लग्न में मंगल स्थित है तो अपनी सातवीं पूर्ण दृष्टि से सप्तम भाव अर्थात गृहस्थ सुख को हानि पहुँचाता है क्योंकि मंगल का काम तोड़-फोड़ करना है।
  • यदि मंगल चतुर्थ भाव में स्थित है तब अपनी चौथी दृष्टि से सातवें भाव को देखता है और उपरोक्त फल देता है।
  • यदि मंगल बारहवें भाव में है तब भी अपनी आठवीं दृष्टि से सातवें भाव को देखता है और परेशानी उत्पन्न करता है।
  • यदि मांगलिक भावों में अर्थात 1,4,7,8 या 12वें भाव में स्थित मंगल अच्‍छे प्रभाव में है तो व्यक्ति के व्‍यवहार में मंगल के अच्‍छे गुण आएंगे लेकिन उपरोक्त भावों में मंगल खराब प्रभाव में है तब व्यक्ति में खराब गुण आएंगे।
  • मंगल की अपनी कुछ खास विशेषताओं का जिक्र हमने ऊपर किया है जिनके कारण गैर मांगलिक व्‍यक्ति अधिक देर तक मांगलिक व्यक्ति के साथ नहीं रह पाएगा। ऐसा इसलिये भी हो सकता है कि मंगल ग्रह उग्र होने के कारण अकेले रहना पसंद करता है और अगर कोई अन्‍य ग्रह उसके पास आता है तो वह उससे झगड़ बैठता है। इस प्रकार मांगलिक व्‍यक्‍ति लंबे समय के लिए अपने साथी को बर्दाश्त नहीं कर सकता है।
  • कई लोगों का यह भी विचार था कि व्यक्ति जब 28 वर्ष का हो जाता है तब मांगलिक योग खतम हो जाता है लेकिन ऎसा नहीं होता। जो योग कुंडली में है वह अपने फल देता ही है। इस बात के पीछे एक तथ्य यह हो सकता है कि पुराने समय में व्यक्ति का विवाह बाल अवस्था में हो जाता था। बचपन, किशोरावस्था तथा जवानी में व्यक्ति के भीतर अत्यधिक जोश भरा रहता है और उस पर मंगल का प्रभाव हो जाए तो व्यक्ति का क्रोध भी बढ़ जाता है, व्यक्ति साहसी, ऊर्जावान तथा अत्यधिक बलशाली हो जाता है। बात-बात पर बल का प्रयोग करने से घर की सुख शांति भंग हो जाती है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है और जिम्मेदारियाँ बढ़ती जाती है तो मंगल का प्रभाव स्वत: कम होता जाता है। वर्तमान समय में तो विवाह देरी से ही होता है तो 28 वर्ष को अपवाद ही माना जाना चाहिए।

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