छत्तीसगढ़ का मनरेगा भुगतान देश में 26 वें स्थान पर होना, गरीब मजदूरों के साथ अन्याय

रमन सरकार का गरीब मज़दूरों से दिखावा उजागर - कांग्रेस

रायपुर: प्रदेश में महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं हो रहा है, केंद्र की रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है. यू पी ए सरकर की ग्रामीण क्षेत्रो में श्रमिको को रोजगार के अधिकार की गारंटी देकर भारत ही नहीं विश्व में मिसाल कायम की है. यह योजना देश के लिए जीवनदायनी योजना साबित हुई है.

कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता घनश्याम राजू तिवारी ने केंद्र की इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, छत्तीसगढ़ राज्य में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण योजना (मनरेगा) में प्रदेश के मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं होने के कारण सरकार के गलत नीति के परिणाम स्वरूप मजदूरों को पलायन करना पड़ रहा है. छत्तीसगढ़ में मनरेगा मजदूरों के साथ भुगतान को लेकर रमन सरकार पर कांग्रेस पार्टी के आरोप सच साबित हुए है. छत्तीसगढ़ मनरेगा भुगतान के मामले पर देश मे 26 वे स्थान पर है, प्रदेश में 14 वर्षों की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री रमन सिंह इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है.

मुख्यमंत्री रमन सिंह की प्रदेश में 150 दिन रोजगार देने की घोषणा भी झूठी एवं बेअसर साबित हुई है. घोषणा के अनुरूप रोजगार देने में सरकार असफल रही है. प्रदेश में सरकार केवल 47 दिनों का ही रोजगार उपलब्ध करा पा रही है. जिसका भुगतान समय पर नहीं किया जा रहा है. राज्य में 41 लाख 20 हजार 054 मजदूर पंजीकृत जॉब कार्डधारी है, लेकिन अधिकांश रोजगार के लिये भटक रहे है. केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद प्रदेश में भारी पैमाने पर मनरेगा में हुई गड़बड़ियां भ्रष्टाचार, समय सीमा पर मजदूरों का भुगतान नहीं करने के कारण केन्द्र सरकार द्वारा मनरेगा के राशि आबंटन में समय-समय पर बंदिश लगाई जाती रही है. योजना में खर्च राशि का हिसाब-किताब समय पर नहीं भेजने और अनगिनत गलतियों और झूठी जानकारी देने के कारण लगभग करोड़ों रू. का भुगतान आज भी लंबित पड़ा है.

बस्तर के सुदूर जिले बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, दंतेवाड़ा में केवल 2 प्रतिशत लोगो को ही रोजगार मिल पाया है. मजदूरों को आनलाइन भुगतान करने के कारण एवं दूरस्थ अंचल बैंकिंग सुविधा के अभाव में छत्तीसगढ़ के मनरेगा के मजदूरों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. मजदूरी के भुगतान के अभाव में एवं अव्यवस्था के कारण प्रदेश के मजदूरों में राज्य में काम करने की दिलचस्पी नहीं बची. साथ ही दूसरे राज्यों में अधिक मजदूरी मिलने तथा लगातार काम मिलने के कारण किसान एवं मजदूर पलायन करने पर मजबूर हो रहे है. मनरेगा का भुगतान नहीं होने के चलते, नोटबंदी के बाद मजदूरों की कारखानों से छटनी और सूखे की मार से लोग काम की तलाश में भटक रहे हैं. पर्याप्त राहत कार्य एवं रोजगार का सर्वथा अभाव है. सरकार पलायन रोक पाने और रोजगार प्रदान करने में पूरी तरह असफल है. यही वजह है कि यहां के मजदूर तमिलनाडु, झारखंड, पंजाब, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा के दुर्दांत ईलाकों में जाकर पेट पालने एवं ठेकेदारों के झासें में आकर बंधुआ मजदूरी के जाल में फंस जाते हैं.

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