22 मई विश्व जैव विविधता दिवस पर विशेष : बदल रहा है रेगिस्तान

- दिलीप बीदावत

दिलीप बीदावत
पिछले कुछ सालों से राजस्थान में मौसम का बदलना असामान्य घटना बन चुकी है। मई जून की प्रचंड गर्मी की जगह अक्सर आंधी, तूफान और फिर बारिश देखने को मिल रही है। भले ही आमजनों के लिए यह राहत की बात होगी लेकिन पर्यावरणविद की नजर में यह जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है। यह प्रभाव केवल मौसम के बदलने तक सीमित नहीं है बल्कि समूचे परिस्थितिकी तंत्र इससे प्रभावित हो रहा है। एक गैर आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण के बदलते मिजाज ने राजस्थान के जैविकीय चक्र को प्रभावित किया है। पेड़ पौधों से लेकर जीव जंतुओं की अनेक प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।

रेगिस्तान में पाया जाने वाला फोग पौधा अब लुप्त होने के कगार पर है। रेगिस्तान के फैलाव को रोकने वाले इस पौधे से पशुओं का चारा, आहार और पानी तक उपलब्ध होता था। ऊंट, गाय, बकरी जैसे पालतू पशु के अलावा हिरण, खरगोश, लोमड़ी जैसे असंख्य जंगली जानवर और पक्षी इसकी पत्तियों को चबा कर भोजन और पानी दोनों की पूर्ति करते थे। अच्छी बरसात और फसल का पूर्वाभास देने वाला जंगली कौआ अब नहीं दिखता। मृत पशुओं के अवशेष खाकर पर्यावरण की सुरक्षा करने वाले गिद्द गायब हो रहे हैं। सेवण, धामण और भुरट जैसी घास सिमट रही है। खेजड़ी, कूमट, कैर, रोहिड़ा और जाल के प्रौढ़ और वृद्ध पेड़ दिखते हैं क्योंकि शिशु और युवावस्था वाले पेड़ नहीं के बाराबर है। ट्रैक्टर से खेत जुताई का सिलसिला शुरू होने के बाद से नव अंकुरित पौधे उखड़ जाते हैं। यह सिलसिला जारी रहा तो, आने वाले सालों में स्थानीय पेड़-पौधों की प्रजातियां भी लुप्त हो जाएंगी। अपनी चहचहाहट से अच्छी फसल का अनुमान लगाने वाली सुगन चिड़िया की संख्या लगातार कम होती जा रही है। यह सारा बदलाव विकास के नाम पर विनाश की अनदेखी का नतीजा है। यह जलवायु परिवर्तन का असर है या कुदरत की ओर से दी गई सजा, यह जांच और शोध का विषय हो सकता है, लेकिन इतना तो तय है कि थार का जैविकीय तंत्र बदल रहा है।

थार के रगिस्तान में जैव विविधता का सरंक्षण प्राचीनकाल से विधमान था जो आस्था के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी मानव संस्कारों के केंद्र में रहा है। आज का वैज्ञानिक ज्ञान भले ही आस्थाओं को खारिज करता होगा, लेकिन प्रत्येक देवी-देवता के साथ किसी जीव-जंतु, नदी-तालाब और वृक्ष लताओं का जुड़ाव जैव विविधता संरक्षण की एक व्यापक श्रृंखला बनाती है और देवी-देवाताओं के साथ इनकी पूजा का अर्थ ही जैव विविधता का संरक्षण है। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक सोच इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों और धरोहरों के दोहन के बीच संतुलन नहीं बना सकी। हालांकि भक्तिकाल को जैव विविधता संरक्षण के लिए सामुदायिक जागरूकता और चेतना का काल कहा जा सकता है।

आधुनिक विकास की असंतुलित समझ ने इस सिलसिले में अवरोध उत्पन्न किया। आज रेगिस्तान की धरती पर पसरे जैव विविधता के यह केंद्र औरण, गौचर जैसे चारागाह मरणासन्न स्थिति में पहुंच गए हैं। थार का रेगिस्तान अपने आप में अन्य क्षेत्रों से भिन्न जैव विविधता की विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। लेकिन यह विशिष्टता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। जैसलमेर में पाया जाने वाले गोडावण पक्षी के अंतिम एक-दो जोड़े बचे हुए हैं। सुरक्षित आवासों और विशिष्ट प्रकार के आहार के अभाव में स्थानीय जीव-जंतु या तो क्षेत्र छोड़ कर पलायन कर गए या उनकी प्रजाति ही विलुप्त हो गई। बाजारवाद की इस चकाचैंध में हर व्यक्ति अब स्वार्थपरक मानसिकता में केवल अपने नफा-नुकसान और विकास की सोच रखता है। जैव विविधता का मंत्र वसुदेव कुटुंबकम अब स्मृति से दूर चला गया है। जमीन और प्रकृति से रिश्ता केवल उत्पदान और दोहन तक सीमित रह गया है। आज रेगिस्तान में पानी की कमी नहीं है। रेगिस्तान को दो भागों में विभाजित करने वाली इंदिरा गांधी नहर ने क्षेत्र को हरा-भरा तो बनाया। बाजरा, मूंग, मोठ पैदा करने वाली धरती में मूंगफली, कपास, जीरा, गेहूं, सरसों जैसी फसलों का उत्पादन शुरू हुआ। लेकिन विकास के इस लहर के साथ साथ विनाश का सुनामी भी आया। रसायन और कीटनाशक के असंतुलित उपयोग जैव विविधता के लिए खतरा बन गया। नहर के किनारे कहीं भी जैव विविधता सरंक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र नहीं रखा गया। इंदिरा गांधी नहर ने क्षेत्र को हरा-भरा तो बनाया लेकिन रेगिस्तान की अपनी जैव विविधता को नष्ट करने में भी अहम भूमिका निभाई।

जैसलमेर में विंड एनर्जी की बड़ी-बड़ी पवन चक्कियां, गैस, कोयला व अन्य खनिज पदार्थों के दोहन के लिए कंपनियों द्वारा किया जा रहा खनन कार्य, बाड़मेर में तेल एवं कोयला खनन के लिए हजारों एकड़ भूमि सरकार और कंपनियों के लिए तो सोना उगल रही है, लेकिन यह जैव विविधता और परिस्थितिकी तंत्र की बलि देकर अर्जित की जा रही विकास की उपलब्धियां भावी समय के लिए संकट पैदा करने वाली है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा स्टेट व केंद्रीय बायोडावर्सिटी बोर्ड रेगिस्तान की जैव विविधता और परिस्थिकी तंत्र की बर्बादी पर मौन है। सरकार पूरी तरह से उदासीन है। पिछले 50 सालों में रेगिस्तान के पर्यावरण, जैव विविधता और परिस्थितिकी तंत्र में आए इस बदलाव का प्रभाव सूखा, आंधी, तूफान, बाढ़ जैसी आपदाओं के रूप में देखा जा रहा है। पर्यावरणविद इससे भी भयंकर विनाश की चेतावनी दे रहे हैं। समय रहते सरकार और समुदाय को चेतना होगा। रेगिस्तान के औरण व गौचर की जमीनों को जैव विविधता संरक्षण के रूप में विकसित करने, पारंपरिक जल स्रोतों को ठीक करने के लिए कदम उठाने होंगे। अन्यथा रेगिस्तान के बदलते इस पारिस्थितिकी तंत्र का असर पूरे देश को भी भुगतना होगा।

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