मायावती करना चाहती है कई राज्यों में पैकेज डील

अलग-अलग विपक्षी दलों के साथ सीटों की साझेदारी को लेकर चल रही बातचीत में मायावती ने कड़ी शर्ते रखी है.

नई दिल्ली: कांग्रेस की नई नवेली वर्किंग कमेटी ने राहुल गांधी की अध्‍यक्षता में बीते रविवार को गंभीर चिंतन किया। बैठक में पूर्व वित्‍त मंत्री से लेकर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह तक कई बड़े नेता मौजूद रहे।

साल 2019 के चुनावों में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में मायावती की भूमिका अहम होगी, इसके लिए अलग-अलग विपक्षी दलों के साथ सीटों की साझेदारी को लेकर चल रही बातचीत में मायावती ने कड़ी शर्ते रखी है. दरअसल मायावती कई राज्यों में एक साथ दलों के साथ एक पैकेज डील करना चाहती हैं.

“बसपा गठबंधन करके किसी भी पार्टी के साथ तभी चुनाव लड़ेगी जब हमारी पार्टी को गठबंधन में सम्मानजनक सीटें मिलेंगी”, मंगलवार को बसपा अध्यक्ष मायावती ने ये बयान देकर 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले विपक्षी दलों को साफ मैसेज दिया है कि मायावती किसी भी दल से सीट शेयरिंग पर गठजोड़ अपनी शर्तों पर करेंगी.

दरअसल मायावती एक पैकेज डील करना चाहती हैं. राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण राज्यों में अहम विपक्षी दलों के साथ एक ही सीट शेयरिंग फार्मूला यूपी के लिए मायावती ने समाजवादी पार्टी के सामने राज्य की 80 सीटों में से 37 सीट पर चुनाव लड़ने की शर्त रखी है और वे चाहती हैं कि सपा अपने कोटे से आरएलडी को सीटें दे.

मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में मायावती की बातचीत कांग्रेस से चल रही है जहां सीट-दर-सीट बात की जा रही है. पीएल पुनिया ने कहा, “किसी बड़े फार्मूले की आवश्यकता नहीं है. आपसी बातचीत करके उसका समाधान किया जा सकता है चाहे कांग्रेस हो या बसपा, सम्मानजनक समझौता होना चाहिए.”

इस रणनीति के तहत मायावती ने बुधवार को शरद पवार से मुलाकात की. खबर है कि मायावती और पवार के बीच महाराष्ट्र में सीट शेयरिंग की संभावनाओं पर बात हुई है.बैठक पर शरद पवार ने बात करने से इनकार कर दिया. मायावती और पवार दोनों ही पीएम पद के दावेदारों में गिने जाते हैं.

हालांकि एनसीपी ने साफ कर दिया है कि सबसे बड़ी पार्टी का लीडर ही पीएम बनेगा. एनसीपी सांसद और नेता तारिक अनवर ने एनडीटीवी से कहा, “2004 में विपक्ष की तरफ से कोई पीएम पद का उम्मीदवार नहीं था. जब 2004 में नतीजे आए तो उसके आधार पर जो सबसे बड़ी पार्टी थी उसका नेता पीएम बना. लोकतंत्र का तकाजा है कि जो सबसे बड़ी पार्टी होगी नेतृत्व उसी को देना होगा.”

जाहिर है, अब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव विपक्षी दलों की गठजोड़ बनाने की कवायद का पहला महत्वपूर्ण इम्तिहान होंगे.

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