पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर, महिलाओं की बढ़ी जिम्मेदारी

राज शार्दुल

कोंडागांव।

खेती किसानी के कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है निंदाई गुड़ाई से लेकर धान की कटाई , ढुलाई एवं मिजाई में महिलाएं किसी भी तरह पुरुषों से कम नहीं है।

खासकर धान की फसल में निदाई एवं कटाई की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर ही होती है। धान की कटाई में कहीं कहीं ही पुरुषों को देखा जा सकता है। बुवाई के समय महिलाएं हल तक चला लेती हैं तत्पश्चात जब निंदाई की बारी आती है तोपूरी जिम्मेदारी महिलाएं अपने कंधों पर उठा लेती हैं।

इसका कारण यह बताया जाता है कि निदाई गुड़ाई के कार्य अपेक्षाकृत कम मजदूरी मिलता है इस कारण पुरुष मजदूर निदाई के कार्य मैं रुचि नहीं रखते तथा वे अन्य कार्यों में चल देते हैं जिसमें ज्यादा मजदूरी मिले ।इस समय पुरुष मजदूर गांव की तरफ कार्य नहीं होने से शहरों की ओर पलायन कर ज्यादा पैसा कमाना पसंद करते हैं।

इन दिनों महिलाएं धान कटाई के कार्य में अच्छा खासा कमा लेती हैं। कटाई के लिए मजदूरी का दर ₹100 से लेकर ₹120 प्रतिदिन दिया जाता है किंतु आजकल ठेका पद्धति का बढ़ते चलन से महिलाएं भी छोटा छोटा समूह बनाकर दैनिक मजदूरी के बजाय ठेका पद्धति से कार्य करना पसंद करती हैं ।

जहां उनको लगभग दोगुना तक मजदूरी मिल जाता है ।धान कटाई के सीजन में महिलाएं प्रतिदिन 200 से लेकर ढाई ₹250तक कमा लेती हैं बड़े राजपुर ब्लॉक के महिला जयबती नेताम, मानो बाई, मंगली बाई ,फलेश्वरी आदि ने बताया कि
तीन से चार साल पहलेअपेक्षाकृत मजदूरी कब मिलता था किंतु अब ठेका के चलन होने से वे ठेके पर ही कार्य करना पसंद करते हैं।

जिससे उनको प्रतिदिन ₹200 से लेकर ₹220 तक मजदूरी मिल रहा है जिससे उनके घर का रोजमर्रा का खर्च चल जाता है महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से खेती किसानी के अलावा पशुपालन सब्जी आदि के कार्य में भी अच्छा खासा परिवर्तन दिखाई दे रहा है। महिलाएं पशुओं की देखभाल के अलावा कृषि के अन्य कार्य फल उत्पादन सब्जी मिर्चा आदि के संग्रहण एवं उत्पादन में अच्छा खासा भागीदारी निभा रही हैं।

पुरुषों के पलायन से बढ़ रही महिलाओं की जिम्मेदारी

खाना पकाने से लेकर अन्य घरेलू कार्यों में इनकी जिम्मेदारी तो है ही इसके अलावा महिलाओं पर फसलों की निगरानी से लेकर कटाई एवं साथ ही पशुधन की देखभाल भी शामिल है ।

ईंधन के लिए लकड़ियां एकत्रित करना इसके अलावा घर के सदस्यों की प्यास बुझाने के लिए पानी की व्यवस्था तक का जिम्मा महिलाओं का ही होता है। यह महिलाओं का प्रतिदिन का कार्य है । ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अभाव एवं कम मजदूरी के चलते पुरुष मजदूर पलायन करने को मजबूर होते हैं। खासकर बस्तर के लोगों को आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु ,चेन्नई एवं देश के अन्य हिस्सों में मजदूरी के लिए पलायन करते देखा जा सकता है। जहां उनको खाना खर्च काटकर 500 से ₹600 प्रतिदिन का रोजी मिल जाता है ।

जिसके चलते वह घर के छोटे-मोटे खेती कार्य एवं मवेशियों की जिम्मेदारी को महिलाओं पर छोड़कर बाहर कार्य पर जाना पसंद करते हैं। पुरुषों के रोजगार के लिए बाहर पलायन करने से महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी आती है एक तो घर की देखभाल ऊपर से रोजमर्रा का खर्च इसके अलावा बच्चों केक्ष पढ़ाई लिखाई का इंतजाम इन सब की जिम्मेदारी को बखूबी निभाने के लिए यहां की महिलाएं तैयार रहती हैं।

महिलाओं के लिए नहीं है कोई प्रोत्साहन योजना

कृषि के क्षेत्र में महिलाओं की लगातार बढ़ती भागीदारी के बावजूद कृषि विभाग एवं सरकार के द्वारा किसी प्रकार का प्रोत्साहन एवं जागरूकता के लिए कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा है। जिससे महिलाओं में निराशा है। जागरूक महिलाओं का मानना है कि बस्तर में ही नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में कृषि के क्षेत्र में महिलाएं बढ़ चढ़कर कार्य करती हैं ।

पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कृषि के कार्य में ज्यादा आगे हैं लेकिन सरकार के द्वारा महिलाओं को कृषि कार्य हेतु किसी प्रकार से जागरूक एवं प्रोत्साहन देने के लिए कोई कार्य नहीं किया जा रहा है जो कि दुर्भाग्य जनक है।

हालांकि सरकार ने कृषि क्षेत्र में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के द्वारा प्रत्येक वर्ष के 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है किंतु इसका कहीं पर कोई प्रचार-प्रसार होते दिखाई नहीं देता जिसके चलते महिलाओं को ही नहीं बल्कि आम लोगों को भी किसान दिवस के बारे में किसी प्रकार की जानकारी नहीं है।

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