उत्तर प्रदेशराज्य

राजनीति छोड़ना चाहते थे योगी, गुरुमंत्र से बने नेता

लखनऊ: 26 साल में सांसद और 44 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले योगी आदित्यनाथ सांसद बनने के कुछ महीने बाद ही राजनीति छोड़ना चाहते थे।

इसका खुलासा मुख्यमंत्री ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शनिवार को किया। सीएम ने कहा, ‘पहली बार सांसद बनने के 5-6 महीने बाद ही मैंने अपने गुरु से कहा कि राजनीति मुझे जंचती नहीं है।

मेरे गुरु ने कहा कि पलायन मत करो। इसे सेवा का जरिया बनाओ। इसमें रमो मत। 1999 में जब मेरी जीत का अंतर महज 7 हजार का रह गया था, तो मुझे लगा कि मेरा निर्णय सही था, मुझे चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।’

गणित में रुचि न होती तो राजनीति में कैसे आता

योगी से जब यह पूछा गया कि उन्होंने गणित से बीएससी किया, उनकी गणित से विशेष रुचि की वजह क्या है? योगी ने कहा- ‘अगर मेरी गणित में रुचि नहीं होती तो मैं राजनीति में कैसे आ पाता?

चुनावी राजनीति तो गुणा भाग की ही है। मेरी रुचि यह जानने में थी कि विज्ञान की सीमाएं कहां तक है? पर जब यह जान लिया कि विज्ञान की सीमाएं सीमित हैं तो आध्यात्म का रास्ता चुन लिया।

योगी बनने को कहा तो भयभीत हो गया था

सीएम ने बताया कि कि जब गुरु महंत अवैद्धनाथ ने पहली बार योगी बनने को कहा था तो मैं भयभीत हो गया था।

घर चला आया, पर जब वह बीमार पड़े तो उन्होंने मुझे बुलाया और कहा-मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाना चाहता हूं तो मैं इनकार नहीं कर सका। नाथ संप्रदाय की काफी कठिन प्रक्रिया के बाद मैं योगी बना।

जीजाजी ने कॉमरेड बनने को कहा
योगी ने बताया कि जब वह कोटद्वार में बीएससी करने के लिए पहुंचे, तो एसएफआई से जुड़े उनके जीजाजी चाहते थे कि वह कॉमरेड बने। इस पर सीएम ने कहा, ‘छात्र जीवन में कई तरह के विचारों से सामना होता है। हमारा सामना एसएफआई और एनएसयूआई से भी हुआ। पर मेरे जीवन का ध्येय राष्ट्र की सेवा था, इसलिए मैं एबीवीपी से जुड़ा।

‘विन डीजल को नहीं जानता’
विन डीजल को पहचानते है? इस पर सीएम ने कहा कि उन्होंने 25 साल से कोई फिल्म नहीं देखी है। इस वजह से मैं इसके बारे में कुछ नहीं कह सकता हूं।

‘हमारे यहां पहले से थे दलित पुजारी’

सीएम ने कहा गोरखनाथ पीठ ने जाति भेद कभी नहीं माना। उन्होंने कहा, ‘लोग साथ पंगत में बैठकर खाते हैं। नाथ संप्रदाय में हर जाति, हर धर्म का इंसान जुड़ सकता है।

शर्त बस एक है राष्ट्रवाद। 1986 में हुई उडूपी धर्म संसद में मेरे पूज्य गुरुदेव अवैद्यनाथ ने प्रस्ताव रखा कि छुआछूत शास्त्र सम्मत नहीं है।

अगर छुआछूत की परंपरा होती, तो वाल्मीकि और संत रविदास कैसे होते? केरल की सरकार ने 6 दलित पुजारियों की नियुक्ति की घोषणा की है।

मुझे यह सुनकर हंसी आती है। मेरे गुरुदेव के नेतृव में 1990 में पटना के महावीर मंदिर में दलित पुजारी की नियुक्ति हुई थी।’

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