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राणे भाजपा में नहीं, एनडीए में जाएंगे!

मुंबई: नारायण राणे के लिए आखिर भाजपा ने एक फॉर्म्युला ढूंढ लिया है, जिसके तहत राणे को भाजपा में न लेकर एनडीए में शामिल किया जाएगा।

इसके लिए नारायण राणे को अपनी नई पार्टी बनानी होगी और भाजपा सरकार को समर्थन देकर ‘मित्र पक्षों’ की लाइन में खड़ा होना पड़ेगा।

भाजपा-संघ का फार्म्युला

सोमवार को दिल्ली में नारायण राणे और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मुलाकात के बाद मंगलवार को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं ने आपसी विचार विमर्श के बाद इस फॉर्म्युले को अंतिम रूप दिया। यह फार्म्युला नारायण राणे के पुराने राजनीतिक इतिहास को देखते हुए पसंद किया गया है।

लेना भी नहीं, छोड़ना भी नहीं

दरअसल राणे को लेकर भाजपा ‘लेना भी नहीं है और छोड़ना भी नहीं है’ कि स्थिति में थी। 2019 के चुनाव में राणे और उनके दोनों बेटों को भाजपा शिवसेना के खिलाफ इस्तेमाल करने की मंशा से भाजपा उन्हें छोड़ना भी नहीं चाहती थी, दूसरी तरफ राणे और उनके दोनों बेटों के उग्र और महत्वाकांक्षी मिजाज को देखते हुए उन्हें पार्टी में लेकर मुसीबत भी मोल नहीं लेना चाहती थी। इसलिए यह बीच का रास्ता अपनाया गया।

बेटों से मुक्ति मिली

इस फॉर्म्युले की वजह से भाजपा को एक और फायदा यह हुआ है कि वह नारायण राणे को दोनों बेटों की जिम्मेदारी लेने से बच गई है।

अब जब राणे अपनी पार्टी बनाएंगे, तो जाहिर है दोनों बेटे भी उसी पार्टी में रहेंगे।

खोत से निकला फॉर्म्युला

भाजपा को यह फॉर्म्युला राजू शेट्टी की पार्टी से अलग होकर नई पार्टी बनाने वाले सदाभाऊ खोत प्रकरण से मिला। खोत को बीजेपी ने अपने उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद का चुनाव जितवा कर राज्य में मंत्री बनाया है।

अब इसी तरह जब राणे अपनी पार्टी बना लेंगे, तो उसके बाद राणे के इस्तीफे से खाली हुई विधान परिषद की सीट पर जब चुनाव होगा तब भाजपा राणे को चुनाव जितवाएगी और फिर उन्हें भाजपा के सहयोगी दल के रूप में राज्य मंत्रिमंडल में मंत्री बनाएगी।

दशहरे का इंतजार
नारायण राणे ने कांग्रेस छोड़ने के बाद दशहरे पर अपनी नई राजनीतिक पारी की घोषणा करने का ऐलान किया था।

इस नए फॉर्म्युले के सामने आने के बाद राणे दशहरे पर क्या घोषणा करते हैं इसका इंतजार राजनीति क्षेत्र में सभी को है। वैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस 29 सितंबर तक विदेश दौरे पर हैं।

30 तारीख को दशहरा है। उनके लौटने के बाद ही राणे कोई फैसला लेंगे, इसलिए हो सकता है कि दशहरे के बजाए मामला अक्टूबर के पहले सप्ताह तक भी खिंच जाए।

राणे के लिए नुकसान

जानकारों का कहना है कि राणे के लिए नई पार्टी बनाना नुकसान का सौदा है। राणे ने अपने बेटों के राजनीतिक भविष्य के लिए भाजपा का दामन पकड़ा है।

इस फॉर्म्युले से उनका यह मकसद पूरा नहीं होगा। भाजपा उनका फायदा तो लेगी, लेकिन उनके परिवार की राजनीतिक मंसूबों को पूरा नहीं होने देगी।

दूसरे राणे अगर अपनी पार्टी बनाते हैं, तो वे केवल कोकण के नेता होकर रह जाएंगे। जानकारों का कहना है कि जिस तरह से मोदी और भाजपा के विरोध में धीरे-धीरे माहौल बन रहा है अगर 2019 तक वह माहौल तप गया, तो नारायण राणे के लिए मुश्किल बढ़ जाएगी।

ऐसे में भाजपा खुद का जनाधार बचाने में अपने संसाधन खर्च करेगी न कि राणे की पार्टी को खड़ा करने में। खासकर तब जब मुख्यमंत्री दिल से राणे के साथ नहीं हैं।

अलावा इसके राणे को कोकण में मात देने के लिए अगर शिवसेना और कांग्रेस आपस में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिल जाएं, तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होगा।

कोकण के राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मत है कि कोकण में उनके और उनके बेटे का पिछला चुनाव हारना यह साबित करता है कि नारायण राणे का खुद का प्रभाव अब कोकण में उतान नहीं है कि वह अपनी पार्टी बनाकर सफलता हासिल कर लें। राणे को इन तमाम स्थितियों का विचार करके ही कोई फैसला लेना होगा।

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