मिशन 2019 सामने, बीजेपी से क्यों छिटक रहे हैं सहयोगी?

2019 लोकसभा चुनाव में करीब 15 महीने बचे हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी दोबारा से सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए है. जबकि विपक्षी दल मोदी को मात देने के लिए एकजुट होने की योजना बना रहे हैं.

2019 लोकसभा चुनाव में करीब 15 महीने बचे हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी दोबारा से सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए है. जबकि विपक्षी दल मोदी को मात देने के लिए एकजुट होने की योजना बना रहे हैं.

इस कड़ी में सोमवार को एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने पहले सोनिया गांधी से मुलाकात की और उसके बाद कई विपक्षी दलों के साथ बैठक की. जबकि बीजेपी के सहयोगी दल एक-एक करके छिटक रहे हैं.

पहले शिवसेना फिर टीडीपी और अब यूपी में योगी सरकार में सहयोगी दल SBSP यानी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर के सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं. पिछले एक सप्ताह में एक के बाद एक बीजेपी के तीन सहयोगी दलों ने बागी तेवर दिखाए हैं.

बीजेपी को पहला झटका शिवसेना ने दिया है. शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में अकेले दम पर 2019 के चुनाव में उतरने का बकायदा प्रस्ताव पास किया. इतना ही नहीं उन्होंने कहा, ‘मैं कसम खाता हूं कि अपने दम पर देश के सभी राज्यों में चुनाव लड़ेंगे. चाहे जीतें या हारें.’

शिवसेना ने सोमवार को दोबारा बीजेपी को घेरते हुए सामना में लिखा कि बीजेपी युति (गठबंधन) धर्म का पालन नहीं करती बल्कि मित्र दलों को कमजोर करने में उसे आनंद मिलता है.

शिवसेना ने कहा, ‘बीजेपी की यही कार्यप्रणाली है कि राज्य में प्रादेशिक दलों से गठबंधन कर सत्ता पर काबिज होना और बाद में धीरे-धीरे मित्र दलों के ही पर कतरते हुए अपने हाथ-पैर फैलाना.

सामना में कहा गया कि साल 2014 की मोदी लहर को एकतरफ रख दो, अब 2019 के चुनावों में देखेंगे कि बीजेपी के कितने सांसद जीतकर आते हैं. वक्त आ गया है कि देश की राजनीति में बीजेपी को गठबंधन के लिए अब अच्छे मित्र नहीं मिलेंगे इसलिए उन्हें दूसरे ग्रह से मित्र खोजने होंगे.’

शिवसेना के इस तेवर से साफ लग रहा है कि दोनों दलों के रिश्ते अब बहुत दिनों तक चलने वाले नहीं है. ऐसे में अगर दोनों दल अलग होते हैं तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ही नहीं बल्कि शिवसेना को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

बता दें कि दोनों पार्टियों के एक ही वोटबैंक है. ऐसे में दोनों के अलग-अलग लड़ने से वोटों का बिखराव होगा और इसका सियासी फायदा कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को मिलने की उम्मीद है.

शिवसेना के बाद बीजेपी को दूसरा झटका तेलगू देशम पार्टी ने दिया है. टीडीपी के अध्यक्ष आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से अलग राह चुनने का संकेत दिया है. नायडू ने कहा है,’पिछले कुछ समय से राज्य में बीजेपी के नेता टीडीपी की आलोचना कर रहे हैं.

इन्हें रोकने की जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व की है. हम गठबंधन धर्म निभा रहे हैं. बीजेपी के नेता लगातार टीडीपी सरकार पर उंगली उठा रहे हैं. ऐसे में बीजेपी नेतृत्व अपने नेताओं को कंट्रोल नहीं करती है, तो हम अलग रास्ता अख्तियार कर सकते हैं.’

बता दें कि दक्षिण भारत में बीजेपी की एकलौती सहयोगी पार्टी टीडीपी के रिश्तों में दरार पड़ती हुई नजर आ रही है. बीजेपी आंध्र प्रदेश में अपने जनाधार को बढ़ाने में जुटी है. इतना ही नहीं इस बीच बीजेपी और जगन रेड्डी की पार्टी के बीच भी नजदीकियां बढ़ी है.

यही वजह रही कि टीडीपी ने तीन तलाक विरोधी बिल पर मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी नजर आई. इसके बाद अब नायडू बीजेपी से अलग अपनी राह तलाश रहे हैं.

राजभर का बगावती तेवर

यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ आए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के 10 महीने में ही बगावती तेवर अख्तियार कर लिया है. राजभर ने पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में चेतावनी देते हुए उन्होंने अपने ही सरकार पर हमला बोला और कहा कि इस सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार कम नहीं हुए हैं बल्कि बढ़ा ही है.

उन्होंने कहा कि केंद्र की सरकार पिछड़े और गरीबों के बूते बनी है. अगर आपने उनसे वोट लिया है तो उन्हें अधिकार भी देने होंगे. अगर गरीब-पिछड़ों के अधिकारों के लिए मुझे जान भी देनी पड़ी तो मैं पीछे नहीं हटूंगा. गठबंधन धर्म की दुहाई देते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे इस धर्म को नहीं निभाएंगे तो मैं भी गठबंधन धर्म नहीं निभाऊंगा.

राजभर ने कहा कि ये मुझे मंत्रिमंडल से निकालने के नाम पर डराने की कोशिश करते हैं. मैं किसी से नहीं डरता. मैं हर समय अपने अटैची में इस्तीफा लेकर चलता हूं.

उन्होंने कहा कि ऐसा दावा किया जा रहा है कि बीजेपी के शासन में केंद्र और राज्य सरकार में भ्रष्टाचार बेहद कम हो गया. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. पहले 500 रुपए का भ्रष्टाचार होता था, लेकिन अब तो पांच हजार रुपए का हो रहा है.

इन दलों में भी कसमसाहट

बीजेपी के साथ यही नहीं कई छोटे सहयोगी दल भी कसमसाहट में हैं. बिहार में महागठबंधन से नाता तोड़कर नीतीश कुमार ने बीजेपी साथ दोबारा सरकार बनाने के बाद से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) के नेता और केंद्र में मंत्री उपेंद्र कुशवाहा अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.

इतना ही नहीं कुशवाहा लगातार आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के साथ भी नजदीकियां दिखी हैं. लालू के सजा होने बाद कुशवाहा उनके परिवार से मिले थे. इसके अलावा रिपब्लिक पार्टी के रामदास अठावले ने भी महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई घटना के बाद दलित नेता जिग्नेश मेवाणी का बचाव करते दिखे.

बीजेपी के सहयोगी बेचैन

चाहे देश हो या राज्यों में बीजेपी अब पहले वाली बीजेपी नहीं रह गई है. देश की सत्ता के साथ-साथ 18 राज्यों में भी बीजेपी की सरकारे हैं. 2014 के चुनाव में बीजेपी पूर्ण बहुमत मिला और उसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, उत्तराखंड, यूपी, हिमाचल सहित के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज हुई है.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 282 सीटें जीती थी. जबकि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में बीजेपी गठबंधन की बैशाखी पर सवार थी. यही वजह है की दोनों सरकारों के नजरिए भी सहयोगियों के साथ अलग-अलग देखने को मिले.

अटल सरकार की जहां पूरी तरह से सहयोगियों पर निर्भर थी, तो वहीं मोदी सरकार अपने दम पर हैं. इसीलिए मोदी सरकार पर गठबंधन की कोई मजबूरी नहीं है. ऐसे में बीजेपी के सहयोगियों दलों में बेचैनी दिख रही है.

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