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राष्ट्रपति के विदाई भाषण में दिखा ‘भीड़ की हिंसा’ का दर्द

नई दिल्ली :  राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार की शाम देशवासियों को आखिरी बार संबोधित किया. उनके विदाई संबोधन में एक तरफ जहां भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा का दर्द साफ दिखाई दिया, वहीं प्रदूषण और जयवायु परिवर्तन को लेकर भी वे चिंतित दिखाई दिए. भीड़ की हिंसा पर प्रणब मुखर्जी ने कहा कि हमें अपने जन संवाद को शारीरिक और मौखिक, सभी तरह की हिंसा से मुक्त करना होगा. पर्यावरण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है. प्रदूषण और जयवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने सभी को साथ मिलकर काम करने का आह्वान करते हुए कहा कि हम सबको मिलकर कार्य करना होगा क्योंकि भविष्य में हमें दूसरा मौका नहीं मिलेगा.

राष्ट्रपति के विदाई भाषण के कुछ मुख्य अंश-

  1. प्रणब मुखर्जी ने कहा, ‘मैं अपने दायित्वों को निभाने में कितना सफल रहा, इसकी परख इतिहास के कठोर मानदंड द्वारा ही हो पाएगी.’
  2. जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसकी उपदेश देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, परंतु मेरे पास देने के लिए कोई उपदेश नहीं हैं.
  3. भारत का संविधान मेरा पवित्र ग्रंथ रहा है, भारत की संसद मेरा मंदिर रहा है और भारत की जनता की सेवा मेरी अभिलाषा.
  4. विकास को वास्तविक बनाने के लिए, देश के सबसे गरीब को यह महसूस होना चाहिए कि वह राष्ट्र का एक भाग है.
  5. हम प्रतिदिन अपने आसपास बढ़ती हुई हिंसा देखते हैं, इस हिंसा की जड़ में अज्ञानता, भय और अविश्वास है.
  6. हमें अपने जन संवाद को शारीरिक और मौखिक, सभी तरह की हिंसा से मुक्त करना होगा.
  7. एक अहिंसक समाज ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों, विशेषकर पिछड़ों और वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है.
  8. प्रकृति हमारे प्रति पूरी तरह उदार रही है. परंतु जब लालच आवश्यकताओं की सीमा को पार कर जाता है तो प्रकृति अपना प्रकोप दिखाती है.
  9. जलवायु परिवर्तन से कृषि क्षेत्र पर भीषण असर पड़ा है. वैज्ञानिकों को मिट्टी की सेहत सुधारने, जलस्तर की गिरावट को रोकने और पर्यावरण संतुलन के लिए किसानों और श्रमिकों के साथ कार्य करना होगा.
  10. हम सबको मिलकर कार्य करना होगा क्योंकि भविष्य में हमें दूसरा मौका नहीं मिलेगा.
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