मोदी का वादा निकला झूठा , नहीं मिला बेरोजगारों को नौकरीयां

अब आंकड़ों में बेरोजगारी कम करने की कवायद? अब आंकड़ों में बेरोजगारी कम करने की कवायद?

अंतरराष्ट्रीय श्रम संस्था (आईएलओ) ने हाल ही में अनुमान जताया है कि भारत में 2018 में बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 1.86 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी. अनुमान के मुताबिक 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 1.89 करोड़ पार कर लेगा जबकि 2017 में देश में बेरोजगारों की संख्या 1.83 करोड़ आंकी गई थी. इन आंकड़ों के इतर 2014 के आम चुनावों में नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वह अपने कार्यकाल के दौरान हर साल 1 करोड़ नई नौकरी पैदा करेंगे जिससे देश में बेरोजगारी के आंकड़े को सुधारा जा सके.

अब मोदी सरकार के कार्यकाल को 4 साल बीत चुके हैं और अपने अंतिम साल में प्रवेश कर रही सरकार को 2019 में एक बार फिर जनता के सामने जाना होगा. सवाल उठता है कि बीते चार साल के दौरान मोदी सरकार 1 करोड़ नौकरी प्रति वर्ष की दर से अभी तक 4 करोड़ नई नौकरियां पैदा कर सकी है या फिर इस वादे को पूरा होने में अभी समय लगेगा?

केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक मोदी सरकार ने 2015 के दौरान 1.55 लाख नौकरियां पैदा कीं तो 2016 के दौरान 2.31 लाख नई नौकरियों का सृजन किया गया. वहीं 2014 में कांग्रेस से सत्ता की बागडोर संभालने के बाद मोदी सरकार ने 4.93 लाख नौकरियों का सृजन किया. हालांकि 2014 के आंकड़ों में गणना उन महीनों की भी शामिल है जब देश में कांग्रेस की सरकार थी.

अब इन आंकड़ों से तो एक बात पूरी तरह साफ है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने वादा 1 करोड़ नौकरियों का किया. लेकिन फिलहाल चार साल बीतने के बाद वह प्रति वर्ष लाख- दो लाख-तीन लाख नौकरियां दे पा रही है. हालांकि इससे पहले कांग्रेस ने भी चुनाव से पहले 1 करोड़ नौकरी के वादे को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था और बीजेपी ने मनमोहन सरकार की आलोचना भी इसी मुद्दे पर की कि वह अपने कार्यकाल के दौरान देश में नई नौकरियों का सृजन नहीं करा सके.

क्या संभव हैं 1 करोड़ नौकरी?

अब बेरोजगारी पर आईएलओ के आंकड़ों को देखें भारत में 2018 में 1.86 करोड़ बेरोजगार गिने जा रहे हैं. 2019 में यह संख्या लगभग 3 लाख और बढकर 1.89 करोड़ बेरोजगार की हो जाएगी. इस आंकड़े से यदि मोदी सरकार के वादे के आंकड़े को हटा दें तो स्वाभाविक है कि देश में बेरोजगारी के स्तर में अच्छा सुधार दिखाई देने लगेगा. लेकिन 2014 में किए गए वादे के चार साल में जब करोड़ का आंकड़ा दूर रहा तो मौजूदा मोदी सरकार को भी एहसास हो गया कि रोजगार सृजन का इतना बड़ा लक्ष्य रोजगार की मूल परिभाषा के तहत पूरा नहीं किया जा सकता है.

इसके चलते बीते एक साल के दौरान खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पकौड़ा रोजगार का जिक्र किया जिसे बाद में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह संसद तक ले गए और दलील दी कि देश में मोदी सरकार के दौरान स्वरोजगार भी रोजगार सृजन माना जाना चाहिए. गौरतलब है कि इस विवाद में इससे पहले मोदी सरकार में प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन भी दलील दे चुके हैं कि देश में अभी तक एकत्र किए जा रहे रोजगार और बेरोजगारी के आंकड़े सही तस्वीर नहीं पेश करते. यह दलील इसलिए दी गई थी क्योंकि 2017 में जारी हुए रोजगार के आंकड़ों में मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान ओला और ऊबर कैब सर्विस द्वारा 8 लाख ड्राइवर को दिए गए रोजगार को नहीं जोड़ा गया था.

बाहरहाल, इन आंकड़ों को आंकलन में शामिल किया जाता है या नहीं, फिलहाल मोदी सरकार को समझ आ चुका है कि 1 करोड़ नौकरी पैदा करना मुश्किल काम है और इसीलिए उससे पहले कांग्रेस सरकार के लिए भी एक करोड़ नौकरी का वादा जुमला साबित हुआ था.

विपक्ष खासकर इसलिए सरकार को निशाने पर ले रहा है कि एक तरफ वो नौकरियां देने में विफल रही है दूसरी ओर प्रधानमंत्री मजबूरी में चाट-पकौड़ा बेचने वालों को भी बेरोजगार मानने को तैयार नहीं. यही नहीं पार्टी के नेता और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने हाल ही में कहा कि युवा नौकरी के लिए नेताओं के पीछे भागने के बजाय पान की दुकान खोल लें या गाय पाल लें. साफ है कि एक करोड़ नौकरी देने का वायदा पान-पकौड़ा रोजगार की ओर जा रहा है और विपक्ष के हाथ यही सरकार के खिलाफ एक बड़ा हथियार है.

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