राजनीति

प्रजातंत्र और संसद का गला घोंटना चाहती है मोदी सरकार : रणदीप सुरजेवाला

मॉनसून सत्र में प्रश्नकाल को शामिल नहीं किए जाने को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार पर हमला बोला

नई दिल्ली। कोरोना वायरस  महामारी के बीच आगामी 14 सितम्बर से संसद का मॉनसून सत्र शुरू होना है। लेकिन इस सत्र में प्रश्नकाल को शामिल नहीं किए जाने को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि सरकार सवालों से बचने के लिए महामारी का बहाना बना रही है। वहीं कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा है कि जवाबदेही से बचने के लिए षडयंत्र के तहत प्रश्नकाल को हटाया गया है। मोदी सरकार प्रजातंत्र और संसद का गला घोंटना चाहती है।

दरअसल, अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने गुरुवार को पत्रकार वार्ता की। इस दौरान संसद के मॉनसून सत्र में प्रश्नकाल के नहीं होने पर कांग्रेस के स्टैंड को लेकर एक सवाल पूछा गया। जिसके जवाब में सुरजेवाला ने कहा कि सुरक्षा के नाम पर सरकार जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने में लगी है। लोकतंत्र को दबाने के लिए सरकार महामारी का बहाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संसद में प्रश्नकाल को समाप्त करके सरकार प्रासंगिक सवालों के जवाब देने से डर रही है। मोदी सरकार चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ, खस्ताहाल भारतीय अर्थव्यवस्था, गिरती जीडीपी और बेरोजगारी के मुद्दे पर जवाब नहीं देना चाहती है।

कांग्रेस नेता ने कहा

कांग्रेस नेता ने कहा कि तारांकित सवाल इसलिए पूछे जाते हैं ताकि संसद के पटल पर उस सवाल के जवाब में सप्लीमेंट्री सवाल पूछकर सरकार की नीतियों और फैसलों के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। हालांकि मोदी सरकार प्रजातंत्र और संसद का गला घोंटना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि मोदी सरकार ने पूरी संसदीय प्रणाली पर षडयंत्रकारी हमला बोल रखा है। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार संसद को पंगु बना रहे हैं। ऐसे में प्रश्नकाल को खारिज करना सरकार की तानाशाही और कुत्सित षडयंत्र का ज्वलंत सबूत है।

सुरजेवाला ने सवाल किया कि क्या कारण है कि जब संसद की बैठक हो सकती है तो मंत्री अपने स्थान पर खड़े होकर विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे सकते। क्या इसका कोई लॉजिक हो सकता है। क्या सवाल पूछना संसद का समय नष्ट करना है। क्या सरकार संसद पर तालाबंदी करना चाहती है। क्या सरकार 130 करोड़ लोगों के प्रतिनिधियों की आवाज को दबा देना चाहती है। सच्चाई यही है कि ये सरकार न तो सवाल पूछने देती है और न ही जवाब देना चाहती है।

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