19 जुलाई से होगा मॉनसून सत्र शुरू, जानें कैसे होती है स्पीकर और डिप्टी स्पीकर की नियुक्ति

पिछले हफ्ते, उसने बिना स्पीकर चुने ही अपना दो दिवसीय मानसून सत्र समाप्त कर दिया।

नई दिल्ली: जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जुलाई के महीने में लोकसभा और राज्य सभा सहित प्रदेशों की विभिन्न विधानसभाओं के मॉनसून सत्र शुरू होने लगते हैं। इस बार का लोकसभा और राज्यसभा का मॉनसून सत्र आने वाली 19 जुलाई को शुरू हो रहा है। साथ ही मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में विधानसभा सत्र शुरू होने को हैं, जबकि महाराष्ट्र विधानसभा का मॉनसून सत्र खत्म हो चुका है।

इन राज्यों में है पद रिक्त

सदन की कार्यवाही का संचालन स्पीकर और डिप्टी स्पीकर करते हैं, लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा की कई विधानसभाओं में स्पीकर/डिप्टी स्पीकर और लोकसभा में भी डिप्टी स्पीकर नहीं हैं। महाराष्ट्र में तो फरवरी से ही स्पीकर नहीं है। बड़े राज्यों के विधानसभाओं की वेबसाइटों पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में डिप्टी स्पीकर का पद खाली है।

लोकसभा में भी नहीं है डिप्टी स्पीकर

महाराष्ट्र विधान सभा इस वर्ष अधिकांश समय बिना अध्यक्ष के रही है। पिछले हफ्ते, उसने बिना स्पीकर चुने ही अपना दो दिवसीय मानसून सत्र समाप्त कर दिया। पिछले स्पीकर कांग्रेस के नाना पटोले थे, जो विधानसभा चुनाव के बाद 2019 में इस पद के लिए चुने गए थे। इस साल फरवरी में पटोले के पद से इस्तीफा देने के बाद से डिप्टी स्पीकर ने कार्यवाही का संचालन किया। महाराष्ट्र में, मुख्यमंत्री फडणवीस के कार्यकाल के दौरान, डिप्टी स्पीकर का पद चार साल खाली रहा था। लोकसभा में, जून 2019 में 17वीं लोकसभा की शुरुआत के बाद से उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हुआ है। यह लोकसभा के इतिहास में सबसे लंबी अवधि है जब यह पद खाली रहा है।

कैसे होता है चुनाव

संविधान में जिस प्रकार से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश और भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के नियुक्ति को लेकर स्पष्ट निर्देश हैं, वैसे ही स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के पद के लिए भी हैं। संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभा और अनुच्छेद 178 में राज्य विधानसभाओं के लिए कहा गया है कि ये सदन “जितनी जल्दी हो” अपने दो सदस्यों को स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के रूप में चुनेंगे।

संविधान में नहीं है कोई समय सीमा

संविधान में इन चुनावों के लिए न तो कोई समय सीमा निर्धारित है और न ही प्रक्रिया का वर्णन है। संविधान इस सबकी जिम्मेदारी विधायिकाओं पर छोड़ देता है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में, राष्ट्रपति/राज्यपाल स्पीकर के चुनाव के लिए एक तिथि निर्धारित करते हैं, और स्पीकर चुने जाने के बाद डिप्टी स्पीकर के चुनाव की तारीख तय करता है। संबंधित सदनों के विधायक आपस में से किसी एक को चुनने के लिए मतदान करते हैं।

इन राज्यों में है समय सीमा तय

वहीं हरियाणा और उत्तर प्रदेश में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के चुनाव कराने के लिए एक समय-सीमा निर्धारित है। हरियाणा में विधानसभा स्पीकर की नियुक्ति, चुनाव के बाद जल्द से जल्द होता है और फिर सात दिनों के भीतर डिप्टी स्पीकर का चुनाव होना तय है।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा स्पीकर का पद रिक्त होने पर चुनाव के लिए 15 दिनों की सीमा तय है। डिप्टी स्पीकर के मामले में, पहले चुनाव की तारीख अध्यक्ष द्वारा तय की जाती है, और बाद की रिक्तियों को भरने के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है।

स्पीकर के कार्य और शक्तियां

लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट के अनुसार, स्पीकर “सदन का प्रमुख प्रवक्ता होता है, वह इसकी सामूहिक आवाज का प्रतिनिधित्व करता है और बाहरी दुनिया के लिए इसका एकमात्र प्रतिनिधि होता है”। स्पीकर सदन की कार्यवाही और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करता है। अध्यक्ष ही निर्धारित करता है कि क्या कोई विधेयक धन विधेयक है अथवा नहीं और इसलिए राज्य सभा के दायरे से बाहर है।

डिप्टी स्पीकर के कार्य

डिप्टी स्पीकर, स्पीकर से स्वतंत्र होता है। वह स्पीकर के अधीन नहीं होता है, क्योंकि दोनों सदन के सदस्यों में से और उनके द्वारा ही चुने जाते हैं। लोकसभा के डिप्टी स्पीकर के पद का भी बड़ा महत्व है। स्पीकर की अनुपस्थिति में सदन की अध्यक्षता करने के अलावा, डिप्टी स्पीकर, संसद के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर समितियों की अध्यक्षता कर सकता है। उदाहरण के लिए, पिछली लोकसभा के डिप्टी स्पीकर एम थंबीदुरई ने निजी सदस्यों के विधेयकों और प्रस्तावों पर लोकसभा समिति और एमपी स्थानीय क्षेत्र विकास योजना को देखने वाली समिति का नेतृत्व किया।

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