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डिस्काउंट के बाद भी नहीं बिके CHB के आधे से भी ज्यादा फ्लैट्स और बंगले

इन प्रोजेक्ट्स में फंस गए सरकार और जनता की अरबों रुपए

रायपुर:30 सितंबर तक लोग पुरानी कीमत और 20 फीसदी तक की छूट के साथ छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड द्वारा मकानों की आसानी से खरीदी की योजना दी गई है। लेकिन सरकार द्वारा जोर-शोर से प्रचार के बाद भी CHB के आधे से भी ज्यादा फ्लैट्स और बंगले नहीं बीके।

नतीजतन सरकार और जनता की अरबों रुपए इन प्रोजेक्ट्स में फंस गए। मजबूरी में अब कांग्रेस सरकार को इन मकानों-फ्लैट्स को 30-40 फीसदी कम दामों में बेचने का निर्णय लेना पड़ा है ताकि घाटे को कम किया जा सके, और फंसी हुई राशि निकाली जा सके।

दरअसल भाजपा शासन काल में बोर्ड में काबिज अधिकारियों ने कमीशन और भ्रष्टाचार का ऐसा बीज बोया, जिससे उनकी जेबें तो भरती गईं लेकिन सरकार का अरबों का राजस्व उनके बनाए महंगे प्रोजेक्ट्स में फंसता चला गया।

बोर्ड में सालों से काबिज अधिकारियों ने बिल्डरों, भू-माफियों से सांठगांठ कर ऐसा सिस्टम बनाया है जिससे इन्हें मलाई खाने का बेतहाशा अवसर मिला और ये सब मिलकर सरकार को लुटते रहे। बोर्ड के चेयरमेन के पद पर जो भी बैठा वह भी सब-कुछ रुटीन में चलने दो की तर्ज पर अपने कमीशन और राजनीतिक फायदा लेने तक ही सीमित रहा और अधिकारी मलाई उड़ाते रहे।

ऐसे तैयार होता है प्रोजेक्ट

हाउंिसग बोर्ड के अधिकारी प्रोजेक्ट तैयार करने से पहले जगह और लोकेशन देखते हैं, प्रोजेक्ट प्लान करने से पहले यह देखा जाता है कि जिस जगह पर प्रोजेक्ट आएगा उसके आसपास किस तरह की जमीन है।

अधिकारी यह भी सुनिश्चित करते हैं कि आस-पास उनके अपनों की जमीन है या नहीं। नहीं होने की स्थिति में वे बिल्डरों-भू माफियों की मदद से आसपास की जमीन खरीद लेते हैं। इसके बाद प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है।

प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने के लिए भी बोर्ड में एक ही आदमी का अलग-अलग नामों से कई फर्म रजिस्टर किए गए हैं। प्रत्येक फर्म का नाम अलग-अलग लेकिन उसका मालिक एक ही आदमी है।

फ्लैट्स-रो हाउस के लिए सेनेटरी प्रोडक्ट हो, चाहे डोर या टाइल्स हो सबकुछ की सप्लाई अलग-अलग फर्मों के नाम से एक ही आदमी द्वारा किया जाता है। हर प्रोजेक्ट के लिए कांट्रेक्टर-अधिकारी-चेयरमेन का 10, 12, 15 फीसदी कमीशन तय होता है। पूरी प्रक्रिया चेन बनाकर की जाती है। जिससे अनियमितता जाहिर न हो सके।

हर प्रोजेक्ट में होता है टुकड़ों-टुकड़ों में खेल

हाउसिंग बोर्ड में जितने भी प्रोजेक्ट होते है वह चार श्रेणी में बंटा हुआ है। कमिश्नर को सबसे अधिक बजट प्रोजेक्ट स्वीकृति का अधिकार होता है। इसमें ईई, एसई, एई को वर्क आर्डर उनके कार्य क्षमता के अनुसार मिलता है। जिसे घालमेल कर नीचे के तीनों इंजीनियर प्रोजेक्ट को तोड़ कर कमिश्नर के पास छोटा-छोटा बनाकर प्रस्तुत करते जिसमें ये सारे अधिकारी बड़े स्तर पर खेल करते है।

मान लो कोई पांच करोड़ का प्रोजेक्ट बनाना है जिसे सीधे कमिश्नर मंजूर कर सकता है। लेकिन इसमें खेल ईई 3 करोड़ एसई 2.50 करोड़ और एई 2 करोड़ को प्रोजक्ट बनाकर मंजूर करवा लेता है।

जबकि काम हाउसंिग बोर्ड को पांच करोड़ का करना है, लेकिन अधिकारियों ने कमिश्नर को 5 करोड़ का एकमुक्त प्रोजेक्ट न देकर अलग-अलग प्रोजेक्ट बनाकर दिया जिसमें स्टीमेट 5 से 7.50 करोड़ पहुंच गया। इस तरह खेल खेला जाता रहा है।

विज्ञापन में करोड़ों खर्च

प्रोजेक्ट तैयार होने के बाद इसके विज्ञापन में करोड़ों खर्च किए जाते हैं। बोर्ड हर तबके के लिए अलग-अलग प्रकार के फ्लैट्स, डूप्लेक्स और रो-हाउस का निर्माण करता है। इन प्रोजेक्टस के प्रचार के लिए और लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रचार-माध्यमों में बड़े-बड़े विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं, जिसमें सरकार करोड़ों खर्च करती है।

जब तक इन प्रोजेक्टस में तैयार किए जा रहे फ्लैट्स या भवनों के मुताबिक पंजीयन नहीं आ जाते विज्ञापनों का दौर चलता रहता है। इससे सरकार का करोड़ों का राजस्व सिर्फ विज्ञापनों में ही खर्च हो जाता है।

प्रोजेक्ट के आस-पास सस्ते प्लाट और फ्लैट्स

प्रोजेक्ट पर जब काम शुरू होता है और निर्माण गति पकड़ता है तभी बोर्ड के अधिकारी अपने लोगों के माध्यम से आसपास की खरीदी हुई जमीनों पर प्लाट और मकान बोर्ड से सस्ते दामों पर बेचने लगते हैं, इससे लोग हाउसिंग बोर्ड के बजाय निजी बिल्डरों से प्लाट और मकान खरीदने लगते हैं। इससे हाउसिंग बोर्ड के प्रोजेक्ट के फ्लैट्स और मकान जाम हो जाते हैं और उसके लिए ग्राहक नहीं मिलते। नतीजतन सरकार का करोड़ों का राजस्व इन महंगे प्रोजेक्टस में जाम हो जाता है।

हाउसिंग बोर्ड के सभी संभाग कार्यालयों में सालों से एक ही जगह पर जमे अधिकारियों ने बिल्डरों-भू भाफियों और ठेकेदारों से मिलकर भ्रष्टाचार का ऐसा जाल बुना है जिसमें सरकार ही उलझ गई है। बोर्ड के महंगे प्रोजेक्टों में फंसे रकम निकालने के लिए सरकार को कीमत कम करने के अलावा और भी रास्ते अपनाने होंगे।

बरसों से एक ही जमे हुए अधिकारियों कर्मचारियों को इधर-उधर करने के साथ इनके प्रभार वाले कार्यों में फेरबदल करने की आवश्यकता है। बोर्ड के टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के साथ ठेका व निर्माण सामग्री सप्लाई करने वाले फर्मों की पड़ताल भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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