छत्तीसगढ़

विश्व की महान शिक्षक मदर टेरेसा को रायगढ़ से था खास लगाव

सभी का नाम जानती थीं मदर

हिमालय मुखर्जी ब्यूरो चीफ रायगढ़

शिक्षक दिवस विशेष : संत मदर टेरेसा की पुण्यतिथि भी आज, नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद रायगढ़ ने किया था उनका भव्य स्वागतपूरे देश में आज शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। शिक्षक दिवस क्यों और किसलिए मनाया जाता हर छात्र को मुंहजुबानी याद है। 5 सितंबर 1997 के दिन संत मदर टेरेसा का निधन हुआ था। मदर टेरेसा को कौन नहीं जानता? अल्बानिया में जन्म, भारत कर्मभूमि, नोबेल मिला, भारत रत्न इत्यादि….इत्यादि। मदर टेरेसा से बड़ा शिक्षक आज के दौर में कौन हो सकता है।

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18 साल की आयु में घर छोड़ने के बाद उन्होंने कलकत्ता के सैंट मैरी स्कूल में 18 साल तक पढ़ाया। परित्यक्तों और दिव्यांगों की सेवा करने की सीख पूरी दुनिया को दी। लेकिन क्या आपको पता है मदर टेरेसा को रायगढ़ जिला पसंद था वो यहां पांच दफे आ चुकी हैं और यहां सेवा करना उन्हें पसंद था। रायगढ़ तत्कालीन मध्यप्रदेश का ऐसा पहला जिला था जहां मदर टेरेसा ने लोगों की सेवा के लिए मिशनरीज ऑफ चैरेटी की शुरुआत की थी। डॉ. पीके मिश्रा, डॉ. मित्रा. डॉ. पाठक और एडवोकेट डीपी श्रीवास्तव मदर टेरेसा की सदैव अगुवाई करते थे। मदर इनके घर भोजन करने भी जाया करती थीं।

मदर टेरेसा को 1979 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था और जनवरी 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न मिला था। ठीक इसी के बाद रायगढ़ के तत्कालीन कलेक्टर, एसपी, लायंस क्लब, जोन कमिश्नर, डॉक्टर्स और समाजसेवियों ने मदर को रायगढ़ बुलाया। फरवरी के पहले हफ्ते वो रायगढ़ आईं। रायगढ़ स्टेशन से लेकर छातामुड़ा शांतिदान तक एक भव्य जूलुस निकला। लोगों ने मदर का खुलेदिल से स्वागत किया।

आयोजन में स्वागत गीत गाने वाली सरोज शाह (75 वर्ष) कहती हैं कि मैं स्टेज के नीचे खड़ी थी। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया। आशीर्वाद दिया। एक अलग सी दैविक अनुभूति हुई। मैंने वैष्णव जन को तेने कहियो… गाया। मदर मुझे बहुत देर तक अपने साथ रखी हुईं थी। मैंने देखा कि उन्हें बच्चों से बहुत लगाव था वो सभी से बहुत प्रेम से मिलती। बीमारों से भी उनके प्रेमभाव में कोई अलगाव नहीं था। वो संत थी, उनका स्पर्श आज भी मेरे जेहन में है।

सभी का नाम जानती थीं मदर

रामभांठा निर्मल छाया की 63 साल की सिस्टर संजीवनी बताती हैं 1976 में मैं कलकत्ता के मिशनरीज में थीं। एक साथ करीब 350 से 400 हम सिस्टर्स वहां रहती थी मदर को बाकायदा सभी के नाम याद थे। वहां किचन में मेरी ड्यूटी लगी थी। खाने के एक दिन 10 से 15 लोग बचे थे और आटा पावभर से भी कम था। मैं परेशान थी, रोने लगी थी, मदर ने पूछा तो बताया आटा नहीं है। मदर ने बड़े ही सहज भाव से कहा कि जाओ जीसस से प्रार्थना करो और बोलो आटा नहीं है।

मैंने इसी भाव से चैपल में प्रार्थना शुरू कर दी। तभी किसी की आवाज आई कि मदर बुला रही है। बाहर जाकर देखी तो मदर आश्रम का मुख्य दरवाजा खोले खड़ीं थी और कहा कि ये देखो सरदार जी ने ट्रक भरकर आटा लाया है। सरदारजी ने मदर से हाथ जोड़कर कहा था कि मेरे गोदाम में यूं ही यह आटे का ट्रक पड़ा है और रखे-रखे खराब होने से बेहतर मदर आपके यहां काम आ जाए। बकौल सिस्टर संजीवनी यह मेरे लिए सबसे बड़ा चमत्कार था। ईश्वर प्रार्थना सुनता है मैंने अपनी आंखो से कई दफे देखा है।

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मिशनरी ऑफ चैरेटीज रामभाठा की सिस्टर सिमोन कहतीं है मुझे रायगढ़ आए हुए 7 साल हुए हैं। 4 साल शांतिदान में 3 साल निर्मल छाया में। मदर टेरेसा की शिक्षा प्रेम और मदद है। इसी भाव से हम लोगों की सेवा करते हैं। मदर हमेशा कहतीं थी कि लोग खाने के भूखे नहीं है लोग प्यार और देखभाल के भूखे हैं। कुष्ठ रोगियों को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था लेकिन मदर ने इन्हीं की सेवा को अपना कर्म चुना। आज 137 देशों में हमारी संस्था है जिसमें 6 हजार से अधिक सिस्टर,मदर,फादर,ब्रदर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

रायगढ़ में छातामुड़ा में शांतिदान है जहां कुष्ठरोगियों, बीमार महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों का मुफ्त में इलाज और सेवा की जाती है। 10 मई 1963 को रामभांठा में सबसे पहले मिशनरीज का आश्रम खोला गया। इसे स्वंय मदर टेरेसा ने आकर खोला था। 5 मई को 1963 को वो पहली बार रायगढ़ आईं थी। पहले यहां अनाथ बच्चों की परविश शुरू की गई। साथ ही साथ बीमारों का इलाज लेकिन जगह कम पड़ी तो हमनें रोगियों के लिए 1966 में छातामुड़ा में दूसरा केंद्र खोल दिया।

रामभाठा में निर्मल छाया के तहत 2008 तक बच्चों का लालन-पालन किया गया। इसके बाद भारत सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र में अनाथ बच्चों की परवरिश ले ली तो अब हम निर्मल छाया में परित्यक्त बुजुर्गों को दोपहर में खाना खिलाते हैं और बच्चों की मुफ्त में शिक्षा देते हैं। मदर की दी हुई सीख को हम आगे बढ़ा रहे हैं।सबसे पहले मिशनरीज के आश्रम जाता हूं

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जिले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजकुमार मिंज मदर टेरेसा से अपने कनेक्शन को आध्यात्मिक बताते हैं। वो मदर की सेवा और कर्म के भाव को स्कूली जीवन से फॉलो करते हैं। एक घटना का जिक्र करते हुए मिंज बताते हैं कि 1985 में मैं कक्षा 10 में था और किसी काम के सिलसिले में रेलवे के जनरल बोगी में यात्रा कर रहा था। पूरी बोगी खचाखच भरी थी। लोग बाथरूम नहीं जा रहे थे। मैं भी गया लेकिन वहां कि गंदगी देखकर वापस आ गया। कोच में दो महिलाएं नीली बॉर्डर वाली सफेद उजली साड़ी पहनी हुईं थी। जैसे ही उन्हें यह पता चला वो बेहिचक पूरे बाथरूम की सफाई करने लगी। इसी घटना ने मुझे बदलकर रख दिया।

मैं मदर का भक्त हो गया। मिशनरीज की सिस्टर आपको हर जगह दिख जाएंगी जो किसी काम को करने से कभी घृणा नहीं करतीं। कोढ़ियों को समाज की मुख्यधारा में लाने का काम इन्हीं मिशनरीज ऑफ चैरटी का है। गंभीर बीमारियों से ग्रसित लोग, अनाथ बच्चों और दिव्यांगो का सहारा बनी इस संस्था में सभी की देखभाल निशुल्क और पूर्ण सेवा भाव से की जाती है। जिसकी स्थापना संत मदर टेरेसा ने की थी। मिंज कहते हैं मैंने मदर को करीब से तो नहीं देखा पर उन्हें मैं महसूस कर सकता हूं। ऐसा लगता है कि उनका आशीर्वाद मेरे सर पर हमेशा रहता है। पुलिस की नौकरी में हूं ट्रांसफर होते रहते हैं लेकिन जहां रहता हूं वहां के मिशनरीज आश्रम सबसे पहले जरूर जाता हूं।

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