मध्यप्रदेश

MP की सत्ता का संग्राम, कौन बनेगा नेपानगर का नायक ?

अखबारी कागज बनाने के कारखाने के चलते नेपानगर देशभर में अपनी खास पहचान रखता है।

भोपाल। मध्यप्रदेश में जिन 28 विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव होने है। उनमें महाराष्ट्र की सीमा से सटे बुरहानपुर जिले की नेपानगर सीट भी शामिल है। अखबारी कागज बनाने के कारखाने के चलते नेपानगर देशभर में अपनी खास पहचान रखता है।

यहां से कांग्रेस विधायक रही सुमित्रा देवी कास्डेकर के इस्तीफे के बाद ये सीट खाली हुई है। उपचुनाव में सुमित्रा देवी बीजेपी के टिकट पर मैदान में है जबकि कांग्रेस ने रामकिशन पटेल को मैदान में उतारा

तस्वीरें निमाड़ अंचल के नेपानगर की है। ये शहर औद्योगिक नगरी के रूप में भी अपनी पहचान रखता है। अखबारी कागज बनाने का कारखाने के चलते भी इस शहर की देशभर में खास पहचान है। नेपानगर विधानसभा क्षेत्र फिलहाल राजनीतिक वजहों से सुर्खियों में है।

दरअसल नेपानगर सीट से 2018 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाली सुमित्रा देवी कास्डेकर ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था और बीजेपी में शामिल हो गई थी, जिससे ये सीट खाली हो गई। इसलिए इस सीट पर उपचुनाव होने जा रहे है। बीजेपी ने सुमित्रा देवी कास्डेकर को अपना प्रत्याशी बनाया है जबकि कांग्रेस ने रामकिशन पटेल को मैदान में उतारा है। फिलहाल दोनों ही प्रत्याशी अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हुए है।

नेपानगर सीट का सियासी मिजाज टटोले तो नेपानगर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है। ये सीट खंडवा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है।नेपानगर विधानसभा क्षेत्र में कुल वोटर्स की संख्या 2,35,117 है। इनमें से 1,20,813 पुरुष मतदाता। जबकि 1,14,286 महिला मतदाता है।

2018 में इस सीट पर 70.09 फीसदी मतदान हुआ था। नेपानगर सीट पर बीजेपी का दबदबा रहा है। 2003 से लेकर 2018 तक इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा। 2018 में कांग्रेस के टिकट पर सुमित्रा देवी कास्डेकर ने जीत हासिल की थी। लेकिन उन्होंने विधायकी से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया। वैसे ओवरऑल देखें। तो यहां अब तक हुए चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने 4-4 बार जीत हासिल की। जबकि एक बार अन्य दल के प्रत्याशी जीते।

उपचुनाव के लिए तैयार नेपानगर में वैसे तो कई मुद्दे है.. लेकिन दलबदल खास मुद्दा बना हुआ है। कांग्रेस इसी मुद्दे पर बीजेपी को घेर रही है। जबकि बीजेपी प्रत्याशी कांग्रेस में अपनी उपेक्षा और क्षेत्र का विकास नहीं होने को पाला बदलने की वजह बता रही है। फिलहाल उपचुनाव का रण तैयार है। दोनों प्रत्याशी मैदान में है। जनता भी वोट की ताकत दिखाने के लिए रेडी है। लोग किसके दावों और वादों पर मुहर लगता है.. और किसे नेपानगर का नायक बनाते है। तो 10 नवंबर को ही पता चलेगा।

कब बदलेगी नेपानगर की तस्वीर ?

इस बार नेपानगर का नायक कौन होगा। ये तो 10 नवंबर को पता चलेगा। फिलहाल बीजेपी और कांग्रेस दोनों दल अपने अपने प्रचार में जुटे है। लगातार जनसंपर्क कर रहे है। और मतदाता तक अपनी बात पहुंचा रहे है। कांग्रेस जहां दलबदल के मुद्दे पर बीजेपी को घेर रही है। तो वहीं बीजेपी क्षेत्र के विकास की दुहाई दे रही है। बीजेपी प्रत्याशी के लिए पूर्व बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने मोर्चा संभाल रखा है।

नेपानगर विधानसभा क्षेत्र में बेरोजगारी बड़ी समस्या

जैसे जैसे उपचुनाव की तारीख नजदीक आ रही है। वैसे वैसे नेपानगर में सियासी सरगर्मी बढ़ती जा रही है। प्रचार अभियान चरम पर पहुंच गया है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने जीत का लिए पूरी ताकत झोंक दी है। बीजेपी प्रत्याशी सुमित्रा देवी कास्डेकर पर पाला बदलने के अपने निर्णय को सही साबित करने की चुनौती है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी रामकिशन पटेल पर नेपानगर सीट पर कब्जा बरकरार रखने की चुनौती।

वैसे तो नेपानगर विधानसभा क्षेत्र में कई मुद्दे है। जिस वजह से उपचुनाव हो रहे है। मुद्दा तो वही छाया है। कांग्रेस लगातार दलबदल के मुद्दे पर बीजेपी प्रत्याशी की घेराबंदी में जुटी है। जबकि बीजेपी प्रत्याशी ये सफाई दे रही है। कि कांग्रेस में उनकी उपेक्षा और क्षेत्र के विकास की वजह से उन्होंने बीजेपी का दामन थामा है। सुमित्रा देवी कास्डेकर बीजेपी में रहकर क्षेत्र के विकास का दावा कर रही है। क्षेत्र के कद्दावर बीजेपी नेता और बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने सुमित्रा देवी कास्डेकर के लिए मोर्चा संभाल रखा है। बीजेपी ने अपनी जीत का पूरा भरोसा जताया है।

कांग्रेस ने उपचुनाव में ‘बिकाऊ नहीं टिकाऊ’ का नारा बुलंद किया है। कांग्रेस प्रत्याशी रामकिशन पटेल इसी नारे और थीम के साथ क्षेत्र के गांव-गांव और गली गली नाप रहे है। रामकिशन पटेल 2008 में भी नेपानगर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके है। हालांकि उस समय उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।

उसके बाद से ही लगातार सक्रीय रहे रामकिशन पटेल 12 साल बाद फिर चुनावी मैदान में है। उनका दावा है कि उन्हें पार्टी संगठन और जनता का सपोर्ट मिल रहा है। रामकिशन लगातार बीजेपी प्रत्याशी सुमित्रा देवी कास्डेकर पर जनता से धोखा करने का आरोप लगा रहे है। उनका दावा है कि जनता बीजेपी को चुनाव में सबक सिखाएगी। और कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत होगी।

फिलहाल अपने अपने आरोप प्रत्यारोप और दावों-वादों के साथ दोनों ही प्रत्याशी धुआंधार प्रचार में जुटे है। अब जनता किस पर यकीन करती है। ये तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे।

नेपानगर विधानसभा क्षेत्र में वैसे मुद्दों की भरमार है। लेकिन औद्योगिक नगरी के रूप में पहचान होने के बावजूद बेरोजगारी और उसकी वजह से पलायन यहां बड़ा मुद्दा बना हुआ है। जिसे लेकर लोगों में नाराजगी है। इसके अलावा नेपानगर की जनता अच्छी सड़कें, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की राह तक रही है। लेकिन चुनावी शोर में इन मुद्दों की बात नहीं हो रही है।

नेपानगर की पहचान औद्योगिक नगरी के रूप में भी रही है। यहां अखबारी कागज बनाने का बड़ा कारखाना है। इसके अलावा भी छोटे मोटे कई उद्योग है। लेकिन इनकी हालत खस्ता हो चली है. क्षेत्र में बेरोजगारी बड़ी समस्या है। कागज कारखाना यानी नेपा मील बंद पड़ी है। जिसके चलते क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए हैं।

और इसी वजह से उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा रहा है। काम की तलाश में लोग बुरहानपुर, खरगोन और इंदौर के साथ ही अन्य शहरों की ओर रूख कर रहे है..जिसे लेकर जनता में आक्रोश है। रोजगार और पलायन की समस्या के बीच होने जा रहे उपचुनाव में जनता को सियासी दलों से क्या उम्मीद है। जनता क्या चाहती है। आइए सुनते है परेशानियों की कहानी। खुद जनता की जुबानीष

नेपानगर में किसान भी संकट में घिरा दिखाई देता है। कहने को तो केले की बंपर पैदावार होती है। लेकिन हालत ये है कि किसान लागत मूल्य तक के लिए तरस जाता है। क्षेत्र में अवैध खनन और शराब की अवैध बिक्री भी बड़ा मुद्दा है। इसके अलावा क्षेत्र की जनता आज भी अच्छी सड़कों की राह देख रही है। क्षेत्र में बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। जल संकट की समस्या से भी क्षेत्र की जनता परेशान है। पर्यटन की अपार संभावना के बावजूद पर्यटन के नक्शे पर नेपानगर की तस्वीर धुंधली नजर आती है

नेपानगर की असल मांग नेपा मील को शुरू करना है.. जो पिछले 5 साल से बंद पड़ी है। बीजेपी शासन काल में भी मांग उठी थी और कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भी लोग इसे शुरू करने की मांग करते रहे। लेकिन दोनों ही सरकारों के ओर से इस पर कोई कड़ा फैसला नहीं लिया गया। जनता चाहती है कि स्थानीय मुद्दों पर काम हो। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिले और यहां की समस्या का समाधान हो।

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