नारायणी साहित्य अकादमी एवं अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन का संयुक्त आयोजन

बेहतरी के लिए बदलाव : विषय पर पढ़ी गई कविताएं

“बेहतरी के लिए बदलाव” विषय पर पुरानी बस्ती स्थित नवीन सरस्वती नगर निगम उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला में आयोजित हुए एक संयुक्त कार्यक्रम में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के शोध अधिकारी श्री सुरेश साहू ने फाउंडेशन की गतिविधियों की जानकारी देते हुए उपस्थित साहित्यकारों से विभिन्न परियोजनाओं में सहयोग की अपील की। नारायणी साहित्य अकादमी की प्रांतीय अध्यक्ष डॉ श्रीमती मृणालिका ओझा ने घीसी पीटी मान्यताओं को तजते हुए समाज में सकारात्मक उर्जा भरने एवं युवाओं एवं विद्यार्थियों को वैज्ञानिक विचारों से लैस करने की बात कही।

कार्यक्रम में “नये पुराने शाप सजे हैं चुनावी बाज़ार में” कहते हुए कुमार जगदलवी ने राजनिती पर व्यंग्य किया तो संजीव ठाकुर ने “मशवरा है तेरे शहर की महफ़िल बदले” गज़ल के द्वारा सोद्देश्य परिवर्तन की बात की। “जो चलकर मैं थकी नहीं, हर डगर पर मेरे साथी है” गीत में श्रीमती पूर्णेश डडसेना ने हार न मानने की बात कही तो शिवानी मैत्रा ने “भूल -भूलैया रूपी जिंदगी को बेहतर बनाने हेतु जीवन में उपजे सवालों के सही जवाब तलाशने” पर जोर दिया। मीसम हैदरी ने ज्ञान के महत्व को “जलाओ ज्ञान के दीपक अगर जलाना है” मे बयां किया वहीं जावेद नदीम ने “जाने कैसे बादल बरसे, जाने निकली कैसी धूप, अंदर अंदर अंधियारा है, बाहर बाहर फैली धूप” के द्वारा वाह वाही बटोरी।

आलीम नकवी ने सच को इस तरह बयां किया “हौसला सबमें है लेकिन आजमाता कौन है, आईना बातिल को अब सच का दिखाता कौन है” तो “औरों के गम का गरल पी कर ज़रा सा देखिये” कहते हुए तेजपाल सोनी ने दुख बांटने की बात कही। श्रीमती वृंदा पंचभाई ने जीवन में नित नए बदलाव की बात रखी तो निर्मला मोहन ने “मै हूँ एक साधक, तुम्हारी उपासक” कहते हुए अपने श्रद्धा भाव समर्पित किये। “बेहतरी के लिए बदलाव चाहिए लोहे के जंगल में पीपल की छांव चाहिए” के द्वारा योगेश शर्मा योगी ने तो वहीं हरजीत जुनेजा ने “कोई यहाँ काम किसी के यूँ ही कभी आता नहीं, लेना तो है सबको मगर देना कभी आता नहीं” के द्वारा आज की परिस्थितियों पर व्यंग्य किया।

डॉ मीता अग्रवाल ने “मोम सा दिल पत्थरों सा हो गया” के द्वारा चिंता व्यक्त की तो उर्मिला देवी उर्मि ने “मन में स्नेह और सद्भाव लाना चाहिए” के द्वारा उम्मीद जगाई। यशवंत यदु ने “बदलापुर नहीं बदलाव होना चाहिए” और जे के डागर ने “एक ज़िल्द में बांधेंगे हम गीता और कुरान को” के द्वारा असीम आशा की बात कही। प्रेम चंद अग्रवाल ने जीवन और प्रकृति से लगाव रखने की बात बताई तो श्रीमती नीता झा ने स्त्री के शक्ति वान होने पर जोर दिया।

गोपाल सोलंकी ,अभिनव झा एवं श्रीमती लतिका भावे ने देश और समाज की बेहतरी के लिए विचारों में सकारात्मक बदलाव को जरूरी बताया तो दामुजी जगन मोहन ने उस बदलाव की शुरुआत स्वयं अपने कर्मों से करने पर जोर दिया। चेतन भारती एवं ज्ञानेश झा ने अपनी छत्तीसगढ़ी रचनाओं के द्वारा “बदलाव के लिए सबका साथ” आवश्यक बताया। कार्यक्रम में उपस्थित अन्य साहित्यकारों ने विषय को समयानुरूप बताते हुए अपनी अपनी तरफ़ से विभिन्न प्रकार की पहल करने की इच्छा जताई। कार्यक्रम का संचालन करते हुए राजेंद्र ओझा ने सूरज सा तेज और उष्मा मय होने की बात कही तो कमला बाजपेयी ने उपस्थित समस्त साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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