लाल गलियारे में देशी एम्बुलेंस का सफर, बीमार महिला को कावड़ में ढोकर ले जाने की मजबूरी

दंतेवाड़ा।

नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में निवासरत आदिवासी सड़क जैसी मूलभूत सुविधा के लिए तरस रहे हैं, जिसकी वजह से उनका जीवन दूभर हो गया है. ऐसे में परिवार का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार हो जाए तो परिवार के सभी सदस्यों के लिए मुसीबत आन पड़ती है. ऐसा ही मुसीबत नस्कली प्रभावित बुरगुम गांव में निवासरत परिवार को उठानी पड़ी, जिन्हें परिवार की बीमार महिला सदस्य को इलाज के लिए 7 किमी कावड़ में ढोकर ले जाना पड़ा.

बुरगुम गांव बेहद ही संवेदनशील नक्सल प्रभावित इलाका है. दन्तेवाड़ा के इस गांव तक कोई सड़क मार्ग ऐसा नहीं है जिस पर चलकर गाड़ी पहुँच सके. बुधवार को इस गांव की एक महिला तबीयत बिगड़ने की वजह से अचेत हो गई. आनन-फानन में ग्रामीणों ने 108 संजीवनी की मदद ली, मगर संजीवनी एक्सप्रेस इस गांव तक सड़क मार्ग नहीं होने की वजह से पहुँच नहीं सकता था,

लिहाजा परिजनों ने खाट को उलटा कर उस पर महिला को लेटाकर लगभग 7 किलोमीटर का सफर बर्रेम से होते हुए जंगलों के रास्ते से तय कर वे महिला को लेकर वे मुख्यमार्ग तक पहुँचे. इधर सड़क पर इंतज़ार कर संजीवनी कर्मी बीमार महिला के पहुंचते ही उसे सीधे दन्तेवाड़ा जिला अस्पताल ले गए, जहां महिला का इलाज जारी है.

सड़क नहीं होने से गाड़ी चलना मुश्किल

अस्पताल से मिली जानकारी के मुताबिक, अब महिला की स्थिति पर सुधार भी आ रहा है. बुरगुम गांव अरनपुर थानाक्षेत्र में आता है, जहाँ नक्सलियो की जबरदस्त पैठ मानी जाती है. अभी हाल में ही विधानसभा चुनाव के ठीक पहले इसी इलाके में नक्सलियो ने जवानों को एम्बुस में फंसाकर शहीद कर दिया था. जिस हमले में डीडी न्यूज के कैमरामैन अच्च्युतानन्द साहू की भी जान चली गयी थी. इन क्षेत्रों में सड़क नहीं होने की वजह खुलकर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुँच पा रही है, जिसके चलते अक्सर आदिवासी ग्रामीणों को कावड़ के सहारे जिंदगी की जंग जीतने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है.

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