राष्ट्रीय समस्या: बहुएँ आत्महत्या को मजबूर क्यों? इसका निदान कैसे संभव है? – हुलेश्वर जोशी

जागरूकता जरूरी है इसलिए इसे हर लड़की/महिलाओं को पढ़ना चाहिए। आपसे भी अनुरोध है कि इसे अधिकाधिक लोगों से शेयर कर समाज में जागरूकता लाने में अपना अहम भूमिका निभाते हुए महिलाओं में बढ़ती आत्महत्या के प्रवृत्ति को रोकने का काम करें। इस लेख के माध्यम से हम समाज के लिए सबसे अत्यधिक चिन्ताजनक परंतु महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं। चर्चा के पहले हमें तैयार रहना होगा कि हम बहुओं पर प्रतिबंध लगाने के मानसिकता को जीवित रखने के पहले अपनी बहन और बेटियों को भी बहु के पदीयदायित्यों पर बनाये रखते हुए उनकी स्थिति पर स्वच्छ चर्चा करें अर्थात कहूँ तो अपनी बहन या बेटी को बहु के पदीयदायित्वों के साथ आत्महत्या के लिए मजबूर होने से बचाने के लिए चर्चा कर लें तो हम बेहतर सकारात्मक परिणाम में पहुचेंगे कि बहुएँ आत्महत्या को मजबूर क्यों होती हैं:

गरिमामय जीवन के अधिकार का हनन।

आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत अधिकारों का हनन।

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध।

आत्मस्वाभिमान को ठेंस पहुँचाया जाना।

तनावपूर्ण जीवन की मजबूरी।

समाज का पुरुष प्रधान सामाजिक मानसिकता से ग्रसित होना।

बहु को गैर समझने की मानसिकता।

पति-पत्नी के मध्य कम्युनिकेशन गैप, सौतन मोबाइल और स्मार्टफोन का अधिकाधिक स्तेमाल।

केवल अपने गरिमा, सुविधाओं और आज़ादी को प्राथमिकता देना जबकि जीवनसाथी अथवा पारिवारिक सदस्यों के गरिमा, सुविधाओं और आज़ादी का उपेक्षा करना।

अशिक्षा अथवा/और जागरूकता का अभाव।

कार्य/जिम्मेदारियों की अधिकता।

समाज में महिलाओं को सेक्सुअल जरूरत पूरा करने, बच्चे पैदा करने और सेवा करने (नौकर) समझने की मानसिकता से ग्रसित होना।

पति द्वारा मद्यपान कर अथवा संदेह के आधार पर पत्नी की पिटाई करना।

इच्छा के ख़िलाफ़ अथवा क्रूरतापूर्ण फिजिकल रिलेशन को मजबूर करना।

माता पिता में सकारात्मक विचारधारा का अभाव।

आत्महत्या का उपचार:

“जैसे को तैसा का सिद्धांत” के अनुसार ही बहुओं के साथ व्यवहार करें; अर्थात बहु के ऊपर केवल उन्हीं अनुसाशन को थोपें जो आप अपनी बहन और बेटियों के साथ स्वीकार कर सकते हैं।

महिलाओं/लड़कियों को (बाल्यकाल से ही) को अपने मूल अधिकारों और मानव अधिकारों से भलीभांति परिचित होना होगा।

लड़कियों/महिलाओं को महिलाओं के सुरक्षार्थ (घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव और लैंगिक शोषण से संरक्षण संबंधी) क़ानूनी प्रावधानों और अधिकार से भलीभांति परिचित होना चाहिये तथा उन्हें सहजतापूर्ण क़ानूनी सहयोग प्राप्त के तरीक़ों की भी जानकारी प्रदान करें।

बेटियों में रूढ़िवादी परम्पराओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की साहस पैदा करें।

लड़कियाँ/महिलाएँ डिप्रेशन से निज़ात पाने के तरीक़ों से स्किल्ड हों। न सिर्फ़ लड़कियों और महिलाओं को वरन पुरुषों को भी तनावमुक्त जीवनशैली का चुनाव करना चाहिए।

बहुएँ ही नहीं वरन परिवार के सभी सदस्यों के स्वाभिमान और इच्छाओं का सम्मान हो।

लड़के और लड़कियों के मध्य भेदभाव ही आत्महत्या और हत्या का कारक है।

न सिर्फ़ जीवनसाथी वरन परिवार के अन्य सदस्यों को भी उनके द्वारा किये गये छोटी मोटी ग़लतियों के लिए माफ़ करना सीखें।

परिवार में बेटियों और बहु के लिए बराबर की आज़ादी का प्रावधान रखें; यदि आपका परिवार रूढ़िवाद से ग्रसित हो तो रूढ़िवाद का त्याग कर महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा और सम्मान देना शुरू करें।

“पति परमेश्वर है, ईश्वर और भगवान हैं इनके त्याग के बाद जीवन दुभर हो जाता है इसलिए पति के इच्छाओं की पूर्ति के लिए जीवन समर्पित रखें।” ऐसी मानसिकता न केवल झूठा और भ्रामक है बल्कि यह दूषित, अमानवीय और अधार्मिक भी है।

अपने जीवन से श्रेष्ठ, उत्तम और अनिवार्य कुछ नहीं; इसलिए आत्महत्या का विकल्प बिल्कुल ही नाजायज, व्यर्थ और बक़वास है।

आत्महत्या के बजाय किसी भी प्रकार से शोषण, प्रताड़ना और अधिकारों के हनन होने की स्थिति में पति और उनके परिवार के ख़िलाफ़ क़ानूनी सहायता के लिए न्यायालय और पुलिस की शरण में जाना अच्छा क़दम है।

वैवाहिक जीवन को आपसी तालमेल से सफ़ल और सुखमय बनाया जा सकता है यदि ऐसा संभव न हो तो तलाक़ लेना एक बेहतर निर्णय होता है।

महिलाएँ अपने लिए, अपने आध्यात्मिक और व्यक्तिगत उन्नति के लिए कुछ समय निकालें, रोज पसंदीदा संगीत सुनें। कभी कभी अपने पसंदीदा स्थानों में टूर पर जाएँ; परिवार के शुभचिंतक लोगों और अच्छे तथा विश्वसनीय दोस्तों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय व्यतीत करें।

किसी भी स्थिति में आपके अधिकारों, आत्मस्वाभिमान को ठेस पहुचाने वाले, प्रताड़ना, हिंसा और बल का प्रयोग करने वालों को बर्दाश्त न करें। वरन पुलिस थाना के माध्यम से उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही कराएँ, यदि पुलिस कार्यवाही न कर रहा हो तो महिला आयोग अथवा न्यायालय की शरण लें।

महिलाएँ ख़ुद की काबिलियत में निरंतर वृद्धि करते रहें, समय के अनुसार स्किल डेवलपमेंट करते रहें ताकि तलाक़ की स्थिति में भी बेहतर जीवन जी सकें; वैसे पिता और पति से भरण पोषण के लिए रुपये लेने और उनके प्रॉपर्टी से बटवारा लेने का अधिकार है।

लड़कियाँ अपने से कम क़ाबिल और कम उम्र वाले लड़कों से विवाह करें।

लड़कियाँ/महिलाएँ आत्मनिर्भर बनें।

यदि आपके जीवनसाथी आपके साथ बेवज़ह मारपीट करे तो आप भी आत्मरक्षा के सारे क़दम उठा सकती हैं। “ख़्याल रखें पति का नाम लेने या उनके मारपीट का विरोध कर आत्मरक्षा करने वाली औरतें नर्क नहीं जाती।”

लेखक “अँगूठाछाप लेखक” (अबोध विचारक के बईसुरहा दर्शन) के लेखक हैं।

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