दो टूक (श्याम वेताल) : यशवंत सिनहा का राष्ट्रीय मंच उपेक्षितों का जमावड़ा

Vetal Sir
श्याम वेताल

चुनाव… चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का, राजनीति का कीड़ा कुलबुलाने लगता है. यह कीड़ा खासतौर पर उन नेताओं को सोते से जगा देता है जो सालों से अपने दडबे में दुबके रहते हैं. ऐसा नहीं है कि यह कीड़ा सिर्फ सोते नेताओं में ही दम भरता हो, किसी न किसी वजह से खबरों में बने रहने वाले नेताओं को भी यह एनर्जी टॉनिक दे जाता है. जिस कारण ऐसे नेता कुछ लोगों को साथ लेकर कोई पार्टी, कोई मंच या कोई मोर्चा बना लेते हैं और मीडिया का सहारा लेकर सड़कों पर उतरते हैं. मीडिया उन नेताओं को कुछ कवरेज भी दे देते हैं जो पहले कभी राजनीति के अर्श पर रहे हो और आज घर की फर्श पर कमर सीधी कर रहे हों.

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खैर, यह तो समय समय की बात है, राजनीति में अर्श पर पहुंचाने वाला राहू 18 साल तक तो चमत्कार दिखाता है फिर कुंडली के अन्य ग्रह ठीक न हो तो 18 साल बाद राहू की नहीं, उन ग्रहों की ही चलती है.

बहरहाल, आई ए एस से राजनीति में आए यशवंत सिनहा कभी आसमान की बुलंदियों पर थे और अटल बिहारी बाजपेई की सरकार में देश के वित्त मंत्री भी रहे लेकिन अटल जी की सरकार जाने के बाद राजनीति उनसे रूठ गयी और वे झारखंड तक सीमित हो गए. वर्ष 2004 से 2014 तक केंद्र में यू पी ए की सरकार के दौरान यशवंत सिनहा के पास करने को कुछ नही था परंतु 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आयी तो उन्हें लगा कि उनका उद्धार हो जाएगा. मोदी सरकार ने उनके बेटे जयंत सिनहा को केंद्रीय मंत्रिमण्डल में वित्त राज्य मंत्री का ओहदा देकर संतुष्ट करने की कोशिश की लेकिन सिनहा जी को संतोष नहीं हुआ. वे अपने लिए भी कुछ ऐसा चाहते थे जो भले मलाईदार न हो लेकिन इज्जतदार तो हो. वे बेनामी के अंधेरे में गुम होते जा रहे थे, जो उन्हें मंजूर नहीं था. मोदी सरकार ने यशवंत सिनहा को शांत रखने की एक और कोशिश की क्योंकि वे भाजपा नेतृत्व के खिलाफ ज्यादा मुखर हो रहे थे. उन्हें कश्मीर के लिए गठित की गयी एक समिति का मुखिया बना कर भेजा गया लेकिन सिनहा जी की कुंठा और क्रोध का शमन न हो सका. नतीजा यह हुआ कि सिनहा जी को अकेला छोड़ दिया गया.

अब, जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ गया तो यशवंत सिनहा फिर सक्रिय हो गए हैं और उन्होंने एक ऐसा मंच गठित किया है जो किसानों के मुद्दे को लेकर आगे बढ़ेगा. बताते चलें, कि कुछ महीने पूर्व भी यशवंत सिनहा ने विदर्भ के किसानों की पीड़ा को हाईलाइट करने के लिए उस क्षेत्र में जाकर धरना, प्रदर्शन और आंदोलन किया था.

बहरहाल यशवंत सिनहा ने अब जिस राष्ट्रीय मंच का गठन किया है उसमें उनके छोटे भाई समान शत्रुघ्न सिनहा भी शामिल है. सभी को मालूम है कि शत्रु भी उपेक्षा की पीड़ा से ग्रस्त हैं. बार-बार कहते हैं कि मैं पार्टी के खिलाफ कुछ नहीं कर रहा हूं और न बोल रहा हूं लेकिन यह भी कहते हैं कि अगर आम आदमी की पीड़ा और किसानों के दर्द को व्यक्त करना बगावत है तो मैं बागी हूं. अब वे भी यशवंत सिनहा के कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हो गए हैं. उधर, तृण मूल कांग्रेस में उपेक्षित दिनेश त्रिवेदी भी इस राष्ट्रीय मंच के साथ दिखाई दे रहे हैं. कांग्रेस की रेणुका चौधरी का भी समर्थन इस मंच को प्राप्त है.

अब देखना है कि सिनहा-द्वय का यह राष्ट्रीय मंच किसानों की पीड़ा दूर करने में सहायक होता है या मोदी सरकार को पीड़ा देने में मददगार साबित होता है. चुनाव से कुछ महीने पहले बने इस मंच को देश के कई राज्यों में जाना होगा तभी किसानों का समर्थन प्राप्त हो सकेगा.

बहरहाल, सवाल यह उठता है कि यशवंत सिनहा के इस कदम से उनकी भाजपा से दूरी बढ़ेगी या कम होगी? कम होने का तो सवाल ही नहीं उठता, दूरियां बढ़ेगी और चुनाव के बाद सिनहा-द्वय को फिर तनहाई में जाना होगा.

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