चीनी पटाखे-लड़ियों का ‘राष्ट्रवादी’ बहिष्कार

दीपावली नजदीक है और इसके साथ ही पूरे देश में एक बार फिर से चीन विरोधी सुर अलापा जाने लगा है. दीपावली से पहले मेड इन चाइना सामान पर सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं से भरा हुआ है और बीते वर्ष की तरह जल्द ही मेनस्ट्रीम मीडिया पर भी इसे लेकर बहस दिखाई दे सकती है. लेकिन आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो बीते तीन वर्षों के दौरान चीन को चुनौती देने के लिए भी हमारी मजबूरी भारत-चीन आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करने की है. लिहाजा मोदी सरकार ने बीते तीन वर्षों के दौरान चीन से आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

भारत-चीन व्यापार के आंकड़ों को देखें तो साफ है कि चीन की भारत में पैठ पटाखों से कहीं ज्यादा गहरी है. चीन से पटाखों का आयात 10 लाख डॉलर का भी नहीं होगा. विदेश व्यापार के आंकड़ों के मुताबिक, चीन से भारत का सबसे बड़ा आयात इलेक्ट्रॉनिक्स (20 अरब डॉलर), न्यूक्लियर रिएक्टर और मशीनरी (10.5 अरब डॉलर), केमिकल्स (6 अरब डॉलर), फर्टिलाइजर्स (3.2 अरब डॉलर), स्टील (2.3 अरब डॉलर) का है.

लेकिन भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर होने के बावजूद भारत-चीन व्यापार देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है. दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात पूरी तरह चीन के पक्ष में है. 72 अरब डॉलर का आयात करने के साथ ही पिछले साल चीन को हमने महज 21 अरब डॉलर का निर्यात किया था. लिहाजा दोनों देशों के बीच कारोबार से भारतीय खजाने को लगभग 51 अरब डॉलर का व्यापार घाटा देखने को मिला है.

मौजूदा समय में भारत लगभग प्रतिवर्ष 70 हजार करोड़ रुपये की मोबाइल फोन सामग्री का चीन से आयात कर रहा है. इस आयात में चीन की प्रमुख कंपनियां हुवाई और जेडटीई शामिल हैं. इसके चलते समूचे भारतीय टेलीकॉम सेक्टर पर चीन की कंपनियों का दबदबा कायम है. भारत में मोबाइल हैंडसेट मार्केट का लगभग 51 फीसदी कारोबार चीन की कंपनियों के पक्ष में है और भारतीय बाजार में जियोमी, ओप्पो, वीवो और वनप्लस का बोलबाला है.

साफ है कि चीन से आ रहे पटाखे-बिजली की लड़ियों का ‘राष्ट्रवादी’ बहिष्कार कोई असर नहीं दिखाने वाला. भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चीन के बहिष्कार से जरूरी चीनी कंपनियों का सत्कार है ताकि मेक इन इंडिया को सफल बनाया जा सके. चीन की कंपनियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक को अपनाकर भारत भी मैन्युफैक्चरिंग हब बन सके और विदेश से निर्यात में कमी लाकर आयात में इजाफा किया जा सके. तभी दोनों देशों के बीच के व्यापार घाटे को पाटा जा सकेगा और सही मायने में अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन आएंगे.

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