मातृभाषा छत्तीसगढ़ी भाषा संस्कृति बचाने के लिए पदयात्रा कल

मनमोहन पात्रे

बिलासपुर।

भाषा संस्कृति की प्राण वायु है। किसी देश की भाषा उसकी संस्कृति की वाहिका होती है। वैज्ञानिक शोधों व अनुसंधानों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है कि बालक की शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए। संसार के समस्त शिक्षाविदों एवं शिक्षा आयोगों के एकमत निष्कर्ष निकाला है कि प्राथमिक शिक्षा मातृ भाषा में दिए जाने से बच्चों का समग्र विकास होता है। भ्मातृभाषा छत्तीसगढ़ी सहित सभी मातृभाषाओं के प्रति जन चेतना जगाने के लिए 25 अक्टूबर को न्याय के लिए पद यात्रा निकाली जाएगी।

यह बातें छत्तीसगढि़यां महिला क्रांति सेना की प्रदेशाध्यक्ष लता राठौर ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए मंगलवार को कही। छत्तीसगढि़या महिला क्रांति सेना छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच की ओर से 25 अक्टूबर को न्याय के लिए पद यात्रा का आयोजन किया जाएगा। इसके लिए मंच के लोगों ने पत्रकार वार्ता करते हुए कार्यक्रम की जानकारी दी। लता राठौर ने बताया कि सरकण्डा महामाया चौक से न्याय के मंदिर उच्च न्यायालय तक पद यात्रा निकाली जाएगी।

सुबह दस बजे से पद यात्रा शुरू होगी। जो राजीव गांधी चौक, तिफरा काली मंदिर, परसदा होते हुए उच्च न्यायालय तक पहुंचेगी। प्रांतीय संयोजक छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच नंदकिशोर शुक्ला ने बताया कि छत्तीसगढ़ की राजभाषा छत्तीसगढ़ी में न तो सरकारी कामकाज हो रहा है और न ही पढ़ाई-लिखाई। इसलिए छत्तीसगढ़वासियों में अपनी अस्मिता, अपने मातृभ्भाषा छत्तीसगढ़ी सहित छत्तीसगढ़ की सभी मातृभ्भाषाएं हलबी, गोंड़ी, कुडुख, भतरी, सरगुजही में पढ़ाई-लिखाई प्राथमिक स्तर पर करने के लिए आयोजन हो रहा है.

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