प्राचीन संस्कृति एवं विरासतों को याद रखने की जरूरत : चंद्राकर

रायपुर : पंचायत एवं ग्रामीणस विकास मंत्री श्री अजय चंद्राकर ने आज कुरूद के खेल मैदान में आयोजित भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला का शुभारंभ किया। श्री चंद्राकर ने शुभारंभ अवसर पर कहा कि क्षेत्रीय असंतुलन से तो आगे बढ़ गए हैं। अब समय आ गया है कि युवा पीढ़ी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर आगे बढ़े। समाज के पारम्परिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि धर्म और समाज एक दूसरे के पर्याय हैं। हमने जब-जब भारत की प्राचीन गौरवशाली और सनातन संस्कृति एवं विरासत को भूला, तब-तब देश और मानव मूल्यों का पतन हुआ है। उन्होंने उदारनीति के हवाले से कहा कि इससे इच्छाओं की प्रतिपूर्ति और विकास तो हुए, लेकिन वास्तविक रूप से भारतीय संस्कृति के अनुरूप मूल्यों का विकास नहंीं हो पाया। उन्होंने समाज के विकास में अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने की अपील युवाओं से की। उन्होंने कहा कि अपने जीवन के थोड़ा-थोड़ा योगदान समाज को दें, ताकि राष्ट्र निर्माण में भागीदारी बन सके और आने वाले पीढ़ी उज्जवल हो सके। श्री चंद्राकर ने कहा कि समाज सेवी क्रांति का विकास हो जाए यही हमारा वास्तविक मूल्य है।

प्रबोधन कार्यक्रम में प्रभुपाद गौर गोपालदास ने अपने उदबोधन में कहा कि कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं होता। जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने के लिए धैर्य और लगन के साथ निरंतर परिश्रम करना चाहिए। श्री गौर ने विभिन्न क्षेत्रों में सफलता अर्जित करने के लिए पांच मूलमंत्र से श्रोताओं को अवगत कराया। इस अवसर पर धमतरी जिला पंचायत अध्यक्ष श्री रघुनंदन साहू, जनपद पंचायत कुरूद की अध्यक्ष श्रीमती पूर्णिमा साहू, नगर पंचायत कुरूद के अध्यक्ष श्री रविकांत चंद्राकर, प्रदेश के समाज कल्याण बोर्ड की सदस्य श्रीमती ज्योति चंद्राकर, धमतरी महापौर श्रीमती अर्चना चौबे, जनपद पंचायत धमतरी की अध्यक्ष श्रीमती रंजना साहू, कलेक्टर श्री सी.आर. प्रसन्ना, रायपुर जिला पंचायत के कार्यपालन अधिकारी श्री नीलेश क्षीरसागर, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के प्रबंध संचालक डॉ. सर्वेश्वर नरेन्द्र भूरे, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री गौरव सिंह सहित क्षेत्र के स्कूलों और कॉलेजों के छात्र-छात्राओं, जनप्रतिनिधिगण तथा प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

कुरूद की बोलबम सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित व्याख्यान सह प्रबोधन कार्यक्रम में श्री गौर गोपालदास ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि भारतीयों की पहचान तीन बातों से होती है। पहली, यहां के लोग पैसे कमाने में माहिर हैं, दूसरी, वस्तु की कीमत का आंकलन करना और तीसरी, यहां की संस्कृति, अध्यात्म और महान धर्म। भारत की संस्कृति और धर्म से अवगत होने विदेशों के लोग भी यहां आते हैं। उन्होंने सफलता के पांच मूल मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि अपने भीतर की एटीट्यूड पर काम करें, यानी आपके भीतर आने वाले अच्छे विचार ही आपको यशस्वी बनाएंगे। उन्होंने गुब्बारे का उदाहरण देते हुए कि वह अपने अंदर समाहित गैस के कारण उड़ान भरता है। उन्होंने सफलता का दूसरा मूलमंत्र बताया सतत् परिश्रम और धैर्य को। आलस्य और उतावला मनुष्य कभी सफलता के शिखर तक नहीं पहुंच सकता। अपने प्रेरक प्रबोधन में उन्होंने आगे कहा जीतता वही मनुष्य है, जो कभी पराजय से नहीं डरता, इसलिए अपनी पराजय से टूटो मत, उसे स्वीकार करके दुगने उत्साह के साथ कार्य करें। यही जीत का तीसरा मूलमंत्र है। श्री गोपालदास ने चौथे मूलमंत्र का वर्णन करते हुए कहा कि कभी अपनी तुलना अन्य व्यक्ति से नहीं करें। अगर तुलना करनी हो तो स्वयं से करें, क्योंकि दूसरे से तुलना कमजोर और ईर्ष्यालु बनाती है। उन्होंने पांचवें और अंतिम मूल मंत्र देते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन मूल्यवान् है, इसलिए इसे आइसक्रीम की तरह नहीं, मोमबत्ती की तरह बनाएं। मोमबत्ती स्वयं पिघलने से पहले दूसरों के लिए प्रकाश फैलाती है। मानव जीवन का सही मूल्य वही है जो दूसरों के काम आए।

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