बांग्लादेश के रेस्त्रां में ‘नो बीफ’, हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान

भारत-बांग्लादेश सीमा से करीब 20 किलोमीटर दूर बांग्लादेश के सतखिरा के रेस्त्रां पर लिखा दिखता है "नो बीफ". एक मुस्लिम बहुल आबादी देश में जहां बीफ खान-पान का हिस्सा है वहां ये थोड़ा हैरान करने वाली बात है.

भारत-बांग्लादेश सीमा से करीब 20 किलोमीटर दूर बांग्लादेश के सतखिरा के रेस्त्रां पर लिखा दिखता है “नो बीफ”. एक मुस्लिम बहुल आबादी देश में जहां बीफ खान-पान का हिस्सा है वहां ये थोड़ा हैरान करने वाली बात है. सोनारगा रेस्त्रां के मालिक अबुल कासिम बताते हैं कि सतखिरा में हिन्दू आबादी अच्छी संख्या में है और उनके ग्राहकों में बहुत सारे हिन्दू हैं. जो बीफ नहीं खाते. सतखिरा के अलावा बांग्लादेश के दूसरे इलाकों में भी कई जगह रेस्त्रां में बीफ नहीं मिलता. ढाका के वरिष्ठ पत्रकार और एटीएन बांग्ला नेटवर्क में न्यूज एडिटर मानस घोष कहते हैं, “इसे यहां की संस्कृति से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिये. विभाजन से पहले इन इलाकों में बड़ी संख्या में हिन्दू थे. अभी भी कोई 8-9% हिन्दू कई इलाकों में हैं. इसलिये आपको देश में अलग-अलग जगह ऐसे रेस्त्रां मिल जायेंगे जहां बीफ नहीं मिलता.”

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घोष बताते हैं कि ये मामला संस्कृति के साथ साथ व्यापार और राजनीति से भी जुड़ा है. इन होटलों में आने वाले कई ग्राहक हिन्दू होते हैं. लिहाजा होटल मालिक उनकी संवेदनशीलता का ख्याल रखते हैं. दूसरी ओर जो भी पार्टी सत्ता में हो वह भी अल्पसंख्यक संतुष्टिकरण के लिये कई बार बीफ को लेकर राजनीति करती है. लेकिन यह राजनीति बांग्लादेश में हिन्दुस्तान की तरह इतनी महत्वपूर्ण नहीं है.

सतखिरा से कुछ किलोमीटर दूर एक दूसरे होटल में हमें बताया गया कि बांग्लादेश में बीफ के लिये पश्चिम बंगाल सीमा से गायों की तस्करी भी होती रही है जो भारत में गोरक्षा मुहिम के बावजूद अब भी बदस्तूर जारी है. लेकिन जिन होटलों में ‘नो बीफ’ के साइन बोर्ड हैं वहां ज़ायका भी एक वजह है. अबुल कासिम कहते हैं, ‘उनके रेस्त्रां में आने वाले ग्राहकों के लिये चिकन और फिश करी के अलावा मटन सबसे अधिक पसंदीदा डिश है’. शायद इसलिये भी 350 टका किलो में मिलने वाले बीफ की जगह वो दोगुनी कीमत वाला मटन परोसना पसंद करते हैं. जिसे हिन्दू और मुस्लिम आबादी चाव से खाती है.

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