सुख के सब साथी दुख में न कोय, यह बात बस्तरवासियों पर लागू नहीं होती

बड़े आरापुर के समुंदसाय कच्छ ने बताया कि जिस व्यक्ति की मौत हुई है और जिसके नाम पर मृत्यु भोज आयोजित किया जाता है। उसके नाम पर आधी रात को गांव के किसी तिराहे पर हाट लगाने की परंपरा

जगदलपुर।

बस्तरवासियों से यहाँ कुछ सिखा जाना चाहिए, यहां मृत्युकर्म निपटाने पूरा गांव करता है मदद चूंकि किसी ग्रामीण के घर परिजनों की मौत होती है तो पूरा गांव

और रिस्तेदार चावल-दल से लेकर दोना-पत्तल और नगद राशि का सहयोग करने तत्पर रहते हैं। यहां के सैक़ड़ों गांवों में यह परंपरा सौ साल से ज्यादा समय से जारी है। हां समयानुसार चावल और नगद राशि देने की मात्रा में परिवर्तन जरूर हुआ है।

बस्तर का ग्राम परिवेश और उसकी पुरानी परंपराएं आज भी अनुकरणीय तथा प्रेरक हैं। इसके चलते ही यहां ग्रामीणों का ग्राम्य संगठन मजबूत है। यहां के गांवों में सुख और दुख की घड़ी में ग्रामीण एक दूसरे की मदद के लिए सामाजिक मान्यता के चलते बंधे हुए हैं।

समयानुसार मृत्युभोज की छूट
गांव में किसी ग्रामीण के घर किसी परिजन की मौत होती है तो पूरा गांव और रिस्तेदार शामिल होते हैं और तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाता, जब तक बुलवाया गया पारिवारिक सदस्य न आ जाए। इसके चलते कभी-कभी अंतिम संस्कार दो-तीन दिनों बाद भी किया जाता है। मृतक का परिवार मृत्यु भोज ग्यारहवें दिन ही करे, यह जरूरी नहीं है। इसके लिए बाकायदा समाज के लोगों की बैठक होती है और दुखी परिवार से पूछा जाता है कि वह अपनी परिस्थिति के अनुसार कब मृत्युभोज कराएगा? उसके बताए तारीख के अनुसार ही भोज कार्यक्रम तय होता है।

अन्न-धन देने की परंपरा
बस्तर के हर गांव में दुखी परिवार को अन्न और धन देने की परंपरा है। घाट कवाली के पदमनाथ कश्यप बताते हैं कि 20 साल पहले तक प्रत्येक घर से दुखी परिवार को एक सोली (एक पाव) चावल और एक रुपया देने की परंपरा रही है लेकिन परिवार और महंगाई बढ़ने से सहयोग सामग्री की मात्रा भी सर्व सम्मति से बढ़ा दी गई है। अब प्रत्येक घर से एक पायली (एक किग्रा) चावल और 10 रुपये नगद राशि देने की परंपरा चल रही है। इसके अलावा घर घर से पांच नग दोना- पत्तल भी लाया जाता है।

कुम्हड़ा के साथ मंद भी
सारगुड़ के नरसिंह कश्यप, मांझीगुड़ा के सुखदेव मांझी बताते हैं कि आदिवासी समाज के विभिन्न अनुष्ठानों में मंद तर्पण के अलावा भोज में शराब परोसने की परंपरा है। विवाहोत्सव हो या मृत्यु भोज में काफी मात्रा में शराब की आवश्यकता होती है, इसलिए परिजन अपने घर से महुए की शराब बना कर लाते हैं। इसके अलावा सामूहिक भोज के लिए कुम्ह़़ड़ा लाने की परंपरा है। बस्तर में कुम्ह़ड़ा को सामाजिक सब्जी माना जाता है, चूंकि एक कुम्हड़ा से 30-40 लोगों के लिए सब्जी बन जाती है।

भंडारी रखता है हिसाब
रायकोट के मसीदास बताते हैं कि जिस घर में शोककर्म चलता है। वहां के लिए एक भंडारी की नियुक्ति की जाती है। गांव वाले या दूसरे गांव में रहने वाले रिस्तेदार जो भी सामान लाते हैं, वह भंडारी को ही दिया जाता है। वही जन सहयोग से मिले सामान का हिसाब- किताब रखता है और पकाने के लिए निर्धारित मात्रा में राशन निकाल कर देता है। वहीं प्राप्त राशि से ही तेल, दाल से लेकर सब्जी, मसाला आदि की खरीदी करवाता है।

मृत्मात्मा के लिए हाट
बड़े आरापुर के समुंदसाय कच्छ ने बताया कि जिस व्यक्ति की मौत हुई है और जिसके नाम पर मृत्यु भोज आयोजित किया जाता है। उसके नाम पर आधी रात को गांव के किसी तिराहे पर हाट लगाने की परंपरा है। आदिवासी समाज में भी मान्यता है कि आत्मा अमर होती है और वह नाहनी (दशकर्म) के दिन लगने वाले हाट में किसी भी रूप में आकर अपनी पसंद का सामान खरीद सकता है, इसलिए आधी रात को सांकेतिक हाट लगाया जाता है, लेकिन चना -लाई से लेकर मंद की बिक्री रुपये के बदले पत्थर के कुछ टुक़ड़ों से प्रतीकात्मक की जाती है।

भोजन पकाने में भी मदद
पोड़ागुड़ा की सावित्री ठाकुर बताती हैं कि जिस घर में शोक कर्म चलता है, वहां गांव के विभिन्न घरों की महिलाएं भोजन पकाने स्वेच्छा से आती हैं वहीं समयानुसार दोना-पत्तल की सिलाई भी करती हैं। भोजन पकाने से लेकर परोसने तक का काम महिलाओं के जिम्मे होता है। यही महिलाएं शोकग्रस्त परिवार के घर की लिपाई-पुताई में भी मदद करती हैं। यह सामाजिक सहभागिता का अनुकरणीय प्रसंग होता है।

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