चीन ही नहीं चीनी से भी परहेज, कोरोना के असर से 6 लाख कुंतल कम हुई शक्कर की खपत

यह बदलाव महज पांच महीने में आया है।

कोरोना ने केवल मुंह को मास्क से ढकने के लिए मजबूर नहीं किया है बल्कि चीनी से भी दूरी बना दी है। पहली बार कोरोना के कारण चीनी की खपत शहर में आधी रह गई है। यह बदलाव महज पांच महीने में आया है।

यूपी में शक्कर की सबसे बड़ी मंडी कलक्टरगंज शक्करपट्टी है। यहां करीब 500 व्यापारी हैं जो सीधे चीनी मिलों से माल खरीदते है और सप्लाई करते हैं। कानपुर शुगर मर्चेन्ट एसोसिएशन के मुताबिक मार्च के बाद शहरी रोज पांच हजार कुंतल शक्कर खा रहे हैं जबकि पिछले साल इसी अवधि में शक्कर की खपत 9 हजार कुंतल प्रतिदिन थी। थोक व्यापारी महेश अग्रवाल ने बताया कि लॉकडाउन के कारण देश और विश्व में चीनी की मांग और आपूर्ति का सारा गणित बिगड़ गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी की कीमतें तेजी से गिर रही हैं।

निकट भविष्य में भी चीनी की कीमतों के बढ़ने की कोई संभावना नहीं है। चीनी की 35 प्रतिशत खपत घरेलू उपयोग में होती है। 65 प्रतिशत खपत व्यावसायिक उत्पादों- मिठाइयों, चॉकलेट, आइसक्रीम, पेय पदार्थों आदि को बनाने में या संस्थानों, भोजनालयों, होटलों, कार्यालयों में होती है। इन तमाम संस्थाओं और दुकानों के बंद होने के कारण खपत तेजी से गिरी है। लॉकडाउन के कारण शादी, समारोह, पार्टियां आदि भी स्थगित हो गए हैं, जिससे चीनी की मांग और घट गई है।

गर्मियों में भाव बढ़ते हैं, इस बार गिर गए

शुगर एसोसिएशन के मुताबिक गर्मियों में चीनी की मांग तेज होती है और दाम बढ़ते हैं लेकिन इस बार नजारा उलट है। इस सीजन में चीनी 35 रुपए किलो थोक में बिक रही है जबकि पिछले साल थोक भाव 37-38 रुपए किलो था। इलायचीदाना, बताशा और पाउडर की मांग 70 फीसदी गिर गई है। कानपुर इन चीजों का गढ़ है। आइसक्रीम और मिठाई से तौबा ने भी मांग की है।

गोपाल महेश्वरी, अध्यक्ष, कानपुर शुगर मर्चेन्ट एसोसिएशन बताते हैं कि शक्कर को लेकर पिछले दस साल में बहुत बदलाव आया है। चीनी की खपत काफी घट गई है। कोरोना में तो चीनी खाने वाले बहुत कम रह गए। इसका बड़ा कारण बाहर खानपान कम होना और लोगों द्वारा मीठी चीजों से दूरी बनाए रखना भी है।

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