छत्तीसगढ़

कारणों को नहीं, केवल समस्याओं को छूने वाला बजट: माकपा

भाजपा-राज की उन नीतियों से अलग होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं है, जो आम जनता और प्रदेश की बर्बादी का कारण बने हैं

राय़पुर।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने छत्तीसगढ़ में आज कांग्रेस सरकार द्वारा पेश बजट को ” कारणों को नहीं, समस्याओं को छूने वाला बजट ” करार दिया है.

पार्टी ने कहा है कि बजट में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आम जनता को राहत के कुछ छींटे मारने की कोशिश जरूर की गई है, जो स्वागतयोग्य है, लेकिन भाजपा-राज की उन नीतियों से अलग होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं है, जो आम जनता और प्रदेश की बर्बादी का कारण बने हैं.

जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि प्रदेश के किसान स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फार्मूले के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य और संपूर्ण कर्ज़मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसके अभाव में वे आत्महत्या करने को विवश हैं.

आदिवासी और किसान उन जमीनों की वापसी चाहते हैं, जो तत्कालीन भाजपा सरकार ने कॉर्पोरेट हितों को पूरा करने के लिए उनसे छीन लिया है.

वनाधिकारों पर अमल की घोषणा के बावजूद सच्चाई यही है कि दावेदारों को न पावती दी गई थी और न ही प्रशासन के पास निरस्त दावों की वास्तविक सूची है और कानून के विपरीत, आदिवासियों के वनाधिकार-दावों के आवेदनों को वह स्वीकार नहीं कर रहा है.

लेकिन इस दिशा में कोई नीतिगत घोषणा नहीं की गई है.माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने कहा कि मनरेगा में केवल 1500 करोड़ रुपयों का आबंटन रखा गया है, जो कि पिछली बजट की तुलना में केवल 100 करोड़ रुपये ज्यादा है.

300 करोड़ रुपयों से ज्यादा की बकाया मजदूरी और महंगाई बढ़ने के कारण बढ़ी हुई मजदूरी को गणना में लेने के बाद मजदूरों के लिए उपलब्ध काम के दिन कम होंगे.

अनुसूचित जाति-जनजाति उपयोजना में भी पिछले वर्ष के बराबर ही, और उनकी सम्मिलित प्रतिशत आबादी की तुलना में कम, आबंटन रखा गया है, जो कि इस प्रदेश की आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा कमजोर और पिछड़े हिस्से को विकास की रोशनी से दूर ही रखेगा.

उन्होंने कहा कि यह बजट असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, संविदा कर्मचारियों, मध्यमवर्गीय कर्मचारियों और शिक्षाकर्मियों की समस्याओं के हल होने के बारे में भी कोई भरोसा नहीं जगाता.

रसोईया मजदूरों की मजदूरी में केवल 300 रुपये महीने की वृद्धि करना और 6 घंटे काम के लिए 50 रुपये रोजी देना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि उन्हें ‘बंधुआ मजदूर’ की श्रेणी में ही बनाये रखना है.

गरीब परिवारों को राशन प्रणाली से दूर रखने की कसरत

इसी तरह, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को “सार्वभौमिक” बनाने के बजाए सरकारी गरीबी रेखा तक सीमित रखने से प्रदेश में व्याप्त कुपोषण की समस्या से निपटना संभव नहीं है, क्योंकि लाखों गरीब परिवारों को आज भी विभिन्न नाजायज कारणों से राशन प्रणाली से दूर रखने की कसरत की जा रही है.

आम जनता को लामबंद कर नीतियों को बदलने की लड़ाई रखेगी जारी

माकपा ने कहा है कि जब तक नवगठित कांग्रेस सरकार भाजपा-राज की जनविरोधी नीतियों और उदारीकरण के रास्ते से अपने को अलग नहीं करती, तब तक केवल राहत के छींटों से आम जनता की समस्याएं हल होने वाली नहीं है.

माकपा जल, जंगल, जमीन, खनिज, रोटी और रोजगार के मुद्दों पर आम जनता को लामबंद कर, जनसंघर्षों के जरिये नीतियों को बदलने की लड़ाई को जारी रखेगी.

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