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31 जुलाई को ही दुनिया को अलविदा कहा गए थे रफी

हिंदी फिल्मों में गायकी को एक ऊंचा मुकाम देने वाले मोहम्मद रफी ने आज के ही दिन 31 जुलाई को दुनिया को अलविदा कहा था। 1980 में हुई मृत्यु से पहले रफी साहब हम सुनने वालों के लिए जो आवाज छोड़ गए, उसी के जरिए हमेशा हम उन्हें याद करते रहेंगे।

 

रफी का होना

1970 का साल। मोहम्मद रफी की बुलंदियों का दौर। ‘पगला कहीं का’ नाम की फिल्म में आवाज दी थी (तुम मुझे यूं भुला न पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे)। ऐसा विनम्र आत्मविश्वास रफी में ही हो सकता था।

मानो मजे-मजे में अपने सुनने वालों से चुहल की हो और फिर झेंप गए हों, लेकिन बाद के दौर ने इसे साबित कर दिया, रफी भुलाए नहीं, लगातार गुनगुनाए गए और वह जब याद आए, बहुत याद आए। एक ऐसे दौर में तो और शिद्दत से जब गायकी के नाम पर इतनी गलेबाजी, इतना हल्ला है, लेकिन दिल के साज पर आवाज है कि आज चढ़ी, कल उतर गई। रफी की आवाज दिलों पर बरसों से काबिज है।

अपनी एक कविता में कवि मंगलेश डबराल ने कहा है कि वह एक जगह है। अगर आवाज भी एक जगह है तो मोहम्मद रफी की आवाज उन मुकम्मल जगहों में से है, जहां प्यार का साज… सुनने लोग बरसों से जा रहे हैं। वे जिन्होंने अपने समय में उन्हें गाते सुना-देखा और वे भी जो रफी से रिश्ता उनकी आवाज के जरिए ही बना रहे हैं। रफी ने इस तरह पीढ़ियों को प्यार करना सिखाया है और यह रफी के जरिए संगीत का इंसानियत पर बहुत बड़ा अहसान है।

आवाज की खूबी

हिंदी फिल्म संगीत की कोई देह होती तो रफी की आवाज बेशक उसकी रूह बनती, क्योंकि सिर्फ रूह ही हमारी जिंदगी के उन अहसासों को महसूस कर पाती है, जिसे रफी आवाज दे गए। इस मामले में वह किशोर कुमार और मुकेश से कहीं आगे थे। मुकेश ने दर्द भरे नगमों को आवाज दी। कहा जा सकता है कि उनकी आवाज ने जगह कम ली लेकिन उसके भीतर मुकेश इतनी गहराई ला सके जिसे सुनने वाले बंध जाएं।

किशोर कुमार ने रूमानी अहसास के गाने गाए और बहुत शोहरत पाई। हालांकि उन्होंने रफी जैसा गाने की भी कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। मिसाल के तौर पर फिल्म रागिनी का गीत ‘मन मोरा बावरा’ …और फिल्म शरारत का गीत ‘अजब है दास्तान तेरी ये जिंदगी…’ दो ऐसे गीत हैं जिसे कई रीटेक के बावजूद किशोर नहीं गा पाए और आखिरकार रफी साहब की आवाज में वे गाए गए और मशहूर हुए। यह रफी की 36 साल की गायकी में (1944 से 80 तक) बारम्बार साबित हुआ कि उनकी आवाज अनूठी है, उसका कोई विकल्प नहीं।

 

अनेक मूड्स

रफी की आवाज संगीत के लफ्जों में कहें तो टेक्स्चर्ड (बनावटी) नहीं हैं, इसीलिए उस आवाज में बड़ा रेंज हासिल करने और अपने को वर्सेटाइल सिंगर बनाने में रफी कामयाब रहे। मूड्स और जेस्चर के मुताबिक, रफी अपनी आवाज बदल सकते थे। इसका सबसे सुंदर नमूना फिल्म जंगली का गीत ‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे…’ है, जिसमें अभिनेता शम्मी कपूर की भाव-मुद्राओं को रफी की आवाज ने और भी असरदार बना दिया। नोट करने वाली बात यह है कि रफी जहां रवानगी से ऐसे गीत गा सकते थे,

 

वहीं राग मालकोश में ‘सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फना होंगे…’ जैसा मद्धम मास्टरपीस भी। सोलो गाते हुए जहां उनकी आवाज सबसे ऊंचे सप्तक (तार सप्तक) तक बिना लड़खड़ाए जा सकती थी (ओ दूर के मुसाफिर, हमको भी साथ ले ले…), वहीं ड्युएट में अपने साथ वाली आवाज की शांत संगत करना भी उसे आती थी (इशारों इशारों में दिल लेने वाले…)।

 

क्लासिकल ऊंचाई

मोहम्मद रफी उन बिरले गायकों में थे जिन्हें संगीत की बहुत गहरी समझ थी। हालांकि यह समझ उनके पहले और साथ गा रहे दूसरे गायकों में भी थी और क्लासिकल म्यूजिक को फिल्मी संगीत में बहुत अच्छी तरह मिला कर के. एल. सहगल ने पेश भी किया, लेकिन जो बात रफी को सहगल से अलग करती है, वह यह है कि ऐसा करते हुए सहगल जितना क्लासिकल म्यूजिक की शुद्धता की तरफ झुके, वहीं रफी ने क्लासिकल म्यूजिक का पॉप्युलर फिल्मी म्यूजिक से बहुत सहज और आत्मीय रिश्ता जोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि तमाम रागों पर आधारित होने और शास्त्रीय संगीत का ध्यान रखने के बावजूद रफी उसे बहुत लोकप्रिय बना गए।

 

रफी को जो बात लेजंड बनाती है वह यह कि उन्होंने 36 साल की अपनी गायकी में फिल्मी म्यूजिक जैसे पॉप्युलर जेनर में क्लासिकल सरीखा एक पैमाना बनाया जिसकी उनसे पहले कल्पना करना मुमकिन नहीं था। सहगल या हेमंत कुमार उस फिल्मी क्लासिकल ऊंचाई के इर्द-गिर्द दिखाई देते हैं, जबकि रफी उसके शिखर पर आसीन।

 

मोहब्बत जिंदाबाद

जिंदगी की निगाह से देखें तो 55 की उम्र में मौत लगभग जवान मौत है। रफी इतना ही जी सके। माना जाता है कि इतने कम वक्त में भी रफी ने हिंदी पंजाबी और दूसरी भाषाओं के करीब 50 हजार गाने गाए।

यह अपने आप में एक रेकॉर्ड है। रफी को गायकी में योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया, उन्हें बेस्ट प्ले बैक सिंगिंग के लिए एक बार नैशनल अवॉर्ड और छह बार फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया।

 

याद रखना चाहिए कि रफी ने ये अवॉर्ड तब जीते, जब प्ले बैक सिंगिंग में आज की तरह मेल/ फीमेल की कैटिगरी अलग नहीं थी, लेकिन इन सब सबसे बड़ा सम्मान रफी को उनके सुनने वालों ने दिया। मौत के 31 बरस बाद भी रफी सुनने वालों के बीच मोहब्बत के अहसास की तरह जिंदा हैं। उनसे सीखने और उनकी नकल करने वालों की जितनी लंबी फेहरिस्त है उतनी किसी गायक की नहीं। हालांकि यह भी सच है कि उनकी तरह गाकर कोई उन-सा न हुआ, न हो सकेगा।

ये हैं रफी के टॉप 10 गानें, जिन्हें आप कभी भूल नहीं सकते

– चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे… (दोस्ती )

– दिल एक मंदिर है…(दिल एक मंदिर)

– वो जब याद आए… (पारसमणि)

– चौदहवीं का चांद हो… (चौदहवीं का चांद)

– बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है… (सूरज)

– क्या हुआ तेरा वादा… (हम किसी से कम नहीं)

– तुम मुझे यूं भुला न पाओगे… (पगला कहीं का)

– दिल का सूना साज तराना ढूंढेगा… (एक नारी दो रूप)

– ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले… (गम के आंसू)

– ये दुनिया, ये महफिल… (हीर-रांझा )

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