कृषि मेला के चौथे दिन भी रही पूरी गहमागहमी

रायपुर: राजधानी रायपुर में राष्ट्रीय समृद्धि कृषि मेला 2018 के चौथे दिन शनिवार को भी किसानों की भीड़ रही। आज आने वाले किसानों में सबसे अधिक तादाद युवा कृषकों की रही। वहीं सबसे अधिक जागरूकता मेले में प्रदर्शित विश्वस्तरीय कृषि उपकरणों और कृषि तकनीकों के पंडाल में देखी गई। पिछले तीन दिनों से कृषि पाठशालाओं में कृषि उपकरणों और तकनीकों के उपयोग से कम लागत दर पर अधिक उत्पादन करने संबंधी योजनाओं की जानकारी लाइव दी जा रही है। यही कारण है कि आज कृषि उपकरणों और तकनीकों के स्टॉल पर किसानों की भारी भीड़ उमड़ी। 

कृषि पाठशाला युवा किसानों के लिए बन रहा आकर्षण का केंद्र : 

मेले में कृषि पाठशाला युवा किसानों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र है। यहां फल, सब्जी सहित हर तरह के फसलों की खेती और उसके भंडारण की विधि, पशु-पक्षियों और मछली आदि के पालन संबंधित जानकारी के अलावा फूड प्रोसेसिंग की ओर से इसके उत्पाद का संवर्धन और विदेशी बाजार के अनुकूल बनाए जाने की तकनीकों की चर्चा मुख्य रूप से की गई। 

वहीं कृषि पाठशाला में आज कृषि के वैकल्पिक तरीकों की चर्चा हुई, जो परंपरागत खेती के अतिरिक्त अन्य उत्पादों की खेती से संबंधित है। जिसका बाजार मूल्य धान, गेंहू जैसे फसलों से बहुत अधिक है। इसके साथ ही यहां शहद, मशरूम, रेशम पालन आदि के तरीकों पर भी चर्चा की गई। 

इजराइल के वैज्ञानिक ने बताए शहद निकलने के तरीके :

इजराइल से आए द हैब्रथू यूनिवर्सिटी के खाद्य और पर्यावरण और कृषि संकाय के प्रोफेसर शरोनी शाफीर ने मधुमक्खी पालन के उन्नत तकनीक पर चर्चा की। मधुमक्खी पालन से अधिक मात्रा में शहद निकालने के लिए मधुमक्खी के आस-पास के वातावरण की भी चर्चा हुई। इससे मधुमक्खी आसानी से अपना आहार प्राप्त कर सकेंगे। यह बेहद जरुरी पहलू था क्योंकि उनके आहार का सीधा सम्बन्ध शहद के उत्पादन दर से होता है। 

कृषि शाला में फसलों और पौधों को क्षति पहुंचाने वाले संभावित कीट और रोग के प्रबंधन पर भी वैज्ञानिक चर्चा हुई जो युवा किसानों के प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहा। दलहन, तिलहन, धान, गेहूं, फलों, सब्जियों आदि के फसल उत्पादन में सिंचाई में आने वाली कठिनाइयों के समानांतर ही कीट और रोग से पैदा होने वाली चुनौतियां होती है जिसके निदान और इससे संबंधित राज्य सरकार की नीतियों की चर्चा की गई। 

इस मेले में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित समकेतिक कृषि मॉडल किसानों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बना रहा। जहां एक साथ कई तरीकों की कृषि करने के आसान और सस्ते उपायों को प्रदर्शित किया गया है। प्रत्येक खेती को एक-दूसरे का पूरक बना कर कृषि लागत दर को कम करने की सफल कोशिश की गई है। इस मॉडल के माध्यम से समझाया गया है कि एक किसान पशुपालन, मछलीपालन और मधुमक्खीपालन साथ-साथ कर सकता है। इसके अलावा ड्रिप सिंचाई पद्धति से धान, गेंहू, फल, सब्जी की खेती कर लागत मूल्य को कम कर सकता है। 

अपनी थोड़ी सी जमीन में ही जैविक खाद उत्पादित कर सकता है। बाद में उसी खाद का उपयोग कर खेती करने के लिए रासायनिक उर्वरकों पर अपनी निर्भरता को खत्म कर सकता है। सिंचाई और पशु-पक्षियों के पालन में सोलर से उत्पन्न बिजली के उपयोग को भी प्रदर्शित किया गया है। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य किसान के एकल परिवार के विविध तरीकों से खेती करने संबंधी क्षमता का विकास करना है। साथ ही खेती में लागत दर को कम कर उत्पादन दर को बढ़ाना है। हालांकि इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय की ओर से प्रदर्शित समकेतिक कृषि मॉडल से सामुदायिक या सामूहिक खेती करने पर कम संसाधनों के उपयोग में ही अधिक आय होने की बात बताई जा रही है। 

फल, सब्जी और अन्य फसलों के बीज की खरीदारी बढ़ी 

कृषि मेले में फल, सब्जी और अन्य फसलों के जैविक बीज की खरीदारी बढ़ रही है। इससे संबंधित स्टालों पर किसानों की भारी भीड़ देखी जा रही है। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ सरकार जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है और इस खेती से रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में होने वाले खर्चों को बचाया भी जा सकता है।

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