काशी में देव प्रतिमाओं के ध्वस्त करने के मुद्दे पर

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शासन और प्रशासन को दिया अल्टीमेटम

– खबरीलाल रिपोर्ट

रायपुर : काशी की धरोहर को बचाने के लिए चल रहे आंदोलन के क्रम में अब एक नया मोड़ आ गया है । ज्योतिष एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सरकार और प्रशासन को अल्टीमेटम दे दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार और प्रशासन बाज नहीं आते हैं तो वह काशीवासियों को बड़े आंदोलन के लिए प्रेरित करेंगे।

ज्ञात हो कि केंद्र व राज्य सरकार की गंगा पाथ वे और विश्वनाथ कॉरीडोर योजना के तहत श्री काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र के सैकड़ों मंदिरों और वर्षों से पूजित देव प्रतिमाओं को ध्वस्त किया जा रहा है। इस योजना के तहत कई प्राचीन भवन भी ध्वस्त कर दिए गए हैं। ऐसे में पहले क्षेत्रीय नागरिकों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी । बाद में उसमें राजनीतिक दलों का जुड़ाव हो गया। यहां तक कि जगद्गुरु  शंकाराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य व काशी स्थित श्रीविद्या मठ के प्रभारी दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी इस आंदोलन से जुड़े। उन्होंने बटुकों संग परिक्षेत्र का भ्रमण किया, फिर साधु-संतों संग बैठक कर आंदोलन की रणनीति तैयार की। लेकिन इस आंदोलन को बुधवरा को उस वक्त बड़ा धक्का लगा जब विश्व धरोहर दिवस पर पराड़कर स्मृति भवन में आयोजित विद्वत् गोष्ठी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उखड़ गए। उनका विरोध इस बात पर था कि वह विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में तोड़े जा रहे प्राचीन मंदिरों व वर्षों से पूजित देव विग्रहों के मुद्दे पर विचार विमर्श के लिए आए हैं।

उनका धरोहर से कोई सरोकार नहीं। अगर यह संगोष्ठी विश्व धरोहर दिवस के बाबत है तो वह जा रहे हैं। उन्होंने संगोष्ठी में आए सपा एमएलसी शतरुद्र प्रकाश के इस व्यक्तव्य का भी कड़ा विरोध किया जिसमें सपा नेता ने कहा कि छोटे-छोटे मुद्दों को छोड़ पहले श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को धरोहर घोषित करने के लिए सामूहिक संघर्ष किया जाए। सपा नेता का कहना था कि अगर मंदिर धरोहर घोषित हो जाएगा तो परिक्षेत्र खुद ही उसमें समाहित हो कर संरक्षित हो जाएगा। लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि विश्वनाथ मंदिर धरोहर नहीं, वह जीवंत मंदिर है। इसके धरोहर घोषित कर मंदिर के अस्तित्व को नष्ट करने की साजिश नहीं होनी चाहिए।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जब तेज आवाज में अपना प्रतिरोध जताना शुरू किया तो सपा नेता संग उनके समर्थकों ने भी इस पर विरोध जताया। सपा नेता ने बताया कि विचार गोष्ठी में उन्हें जो कहना था अपनी बारी आने पर वह सयंमित भाषा में अपना तर्क रखते। तेज आवाज में किसी को अपमानित करने जैसा कृत्य उचित नहीं था। इस विवाद के बाद सारा माहौल ही बिगड़ गया। शतरुद्र प्रकाश और उनके समर्थकों के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी अपने अनुयायियों संग निकल गए।

बुधवार की घटना के अगले ही दिन, धरोहर बचाओ समिति के अध्यक्ष विशालाक्षी मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी ने  शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का संदेश भेजा। इस संदेश में शंकराचार्य ने कहा है कि अविमुक्तेश्वरानंद से यह समाचार मिला है कि काशी में मणिकर्णिका खंड के अंतर्गत काशी विश्वनाथ मंदिर के आस पास पुराण-प्रोक्त अत्यंत प्राचीन देवालयों को तोड़ा जा रहा है। यह बहुत ही अनुचित है। सर्वदेवमय काशी का यह वैशिष्ट्य है कि यहां शास्त्रोक्त सभी देवताओं का स्थान कहीं न कहीं अवस्थित है।

उनका संरक्षण तथा पूजा-अर्चना होना चाहिए न कि विध्वंस। यह काशी के इतिहास में संभवतः अपूर्व घटना है। इस तरह देव प्रतिमाओं का विध्वंस किया जा रहा है जो मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में भी नहीं हुआ।  प्राचीन काल से काशी मंदिरों का नगर कहा जाता है। काशी के इस स्वरूप का संरक्षण धर्मनिर्पेक्ष सरकार का दायित्व है। मंदिरों का सरकारीकरण कर उससे धन उगाहने वाली सरकार उस धन का विनियोग इन मंदिरों के संरक्षण में लगाए न कि उनका विध्वंस कर वहां से धन उगाहने का प्रकल्प चलाए।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि पुराणवर्णित एवं प्राण प्रतिष्ठित इन देव विग्रहों के अपमान से देवताओं के काशी छोड़ने का खतरा है। इससे काशी की समृद्धि, श्री, यश आदि समाप्त हो जाएगा। अतः हमरा मानना है कि तोड़े गए मंदिरं का पुनर्निर्माण हो एवं देवताओं के स्थानों को ना छेड़ा जाए वरना हम काशीवासियों को आंदोलन के लिए प्रेरित करेंगे।

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